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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 668 में से

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पृष्ठ 620

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०९
विलम्बित लय से पाठ करना चाहिए। इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है,
यह तथ्य दिखलाया गया।
७०-७१. शेषाणाम्—इत्यादि। यहाँ शेषाणाम् का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों
का। अर्थयोगेन पद से का आशय है कि जैसे अर्थ की स्फुट प्रतीति हो उसी
प्रकार विच्छेद करना चाहिये न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करे। इस
पर यहाँ प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना रहे ? तो इसके उत्तर में
यही समझना चाहिए कि विलम्बित एक, दो, तीन, चार तथा पाँच कलाओं
तक ( का ) रहता है। गुर्वक्षर अर्थात् कृप्याक्षर।
७२. अथवा में वा शब्द से अधिक के लिये भी सहमति या अनुज्ञा देने
का संकेत किया गया है। कारणोपेतम् में कारण का अर्थ है चिन्तन आदि से
दीर्घकाल तक स्मरण होना।
७३. वृत्तविराम से अर्थविराम प्राथमिकता पाता है यही बात 'ये
विरामाः' इत्यादि से दिखलाते है। तज्ज्ञैः में तत् पद का अर्थ है विरामात्मक
वृत्तगत पदार्थ। उत्क्रम्यापि का आशय है कि यद्यपि उपक्रम विशेष का
था किन्तु उपसंहार सामान्य में है। अतएव इस प्रकार विराम को पढ़ा जाए
कि जिससे विवक्षित अर्थ की प्रतीति हो सके।
७४-७५. भिन्नवृत्तम् इत्यादि। वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए।
ऐसा विच्छेद न करे कि जिससे प्रकृत में कोई दूसरा ही वृत्त प्रतीत होने लगे
जिससे भ्रान्ति उत्पन्न हो। अपशब्द एवं भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरुक्ति
नहीं समझना चाहिए क्योंकि वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के वश से
उसकी प्रतीति हो जाती है। इसीलिये यह कहा गया कि जहाँ विराम का
स्थल नहीं हो वहाँ विश्राम नहीं किया जाता है। विराम की इस प्रकार
व्यापकता बतलाकर न्यूना या दीप्ता को दिखलाने के लिए कहा कि—'दीन
स्थिति में काकु को दीप्त न करे'। इससे यहाँ बतलाया गया कि शोकादि में
मग्न चित्तवृत्ति को छोड़कर अन्य प्रसंगों में सर्वत्र काकु का दीपन शोभाधायक
होता है।
इस प्रकार स्वर, उसके तीन स्थान या आश्रय, उनके उपयोगी उदात्त
आदि वर्ण एवं उनके स्वरूप, स्वरूप के पूर्ति कारण अलङ्कार और इतिकर्तव्यता
रूप सभी अंगों को यहाँ कहा गया। (यह ध्यान रहे कि) स्वरभेद से काकु
का भेद होता है। स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और जब
उसी काकु की विवक्षा करेंगे तो रस, भाव आदि धर्मान्तरों की उत्पत्ति या