नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें४९२ नाट्यशास्त्र
भूमिः कण्टकिनी पुरो विटपिनः प्रायो बहूपद्रवाः
भूयश्चैव दिवाकरो मृगयते सन्ध्याङ्गनासङ्गमम् ।
तद्विश्रम्य जनोऽयमत्र सदने ग्राम्योचितां सेवतां
प्रातः पान्थ विचार्य चेतसि चिरं स्थातासि गन्तासि वा ॥
[ यह भूमि कांटों से युक्त है, सामने वाले वृक्षों में उपद्रव भरा है तथा
इधर यह सूर्य भी अपनी सन्ध्यावधू के साथ मिलन को खोज रहा है । इसी
कारण इस समय घर में विश्राम लेकर ग्राम्योचित क्रिया का उपभोग करना
उचित है और प्रातः होने पर विचार करना कि आगे जाना ही है या
ठहरना है । ]
( इसे ही अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' माना है तथा इसका जो अन्य लक्षण
भी मिलता है उसे यथा स्थान देखना चाहिए )
२३. प्रतिषेध :—अब प्रतिषेध का निरूपण करते हैं—‘कार्येषु’ इत्यादि
से । जैसे अमरूक के इस पद्य में :--
लग्ना नांशुकपल्लवे भुजलता न द्वारदेशेऽर्पिता
नो वा पादयुगे तथा निपतितं तिष्ठेति नोक्तं वचः ।
काले केवलमम्बुदालिमलिने गन्तुं प्रवृत्तः शठः
तन्व्या बाष्पजलोपकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥
[ वह पुरुष जब अम्बुराशि से मलिन मेघों वाले समय में दूर देश जाने
को उद्यत हुआ तो उसे रोकने के लिये उस बाला ने न तो कपडे को पकड़ा,
न द्वार देश पर अर्गला सी भुजलता को फैलायी, न उसके चरणों में गिरी
और न ठहरने के लिये शब्द ही कहे किन्तु वह विरह में रोने लगी तो उसके
आँसुओं की नदी बहने से वह शठ उसके प्रवाह से मार्ग अवरुद्ध हो जाने से
आगे नहीं जा सका । ]
इस पद्य के तृतीयपाद से नायक के विपरीत कार्य की प्रवृत्ति दिखलाई
गयी है और पश्चार्ध से नायिका की । यद्यपि कर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति यहाँ
ही सामने आती है परन्तु अन्तिम कार्य से उसने प्रिय की यात्रा का निवारण
कर ही डाला । यह बात चतुर्थपादगत कविचातुर्य से दिखलाई गयी अतः
यहाँ 'प्रतिषेध' है ।
२४. पृच्छा :—अब पृच्छा का निरूपण करते हैं—'यत्राकारोद्भवैः'
इत्यादि से । जैसे वेणीसंहार में—
किं भीमाद् गुरुदक्षिणां गुरुगदाद् भीमप्रियः प्राप्तवान् ( वे० सं० ६। )
[ क्या उन ने भयंकर गदाधारी तथा प्रिय भीम से गुरुदक्षिणा
प्राप्त की ? ]