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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 668 में से

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पृष्ठ 610

अष्टादश अध्याय
( भाषा-विधान )
१. शास्त्रों में प्रसिद्ध संस्कृत भाषा के विपरीत प्राकृत भाषा के प्रसंग से
संस्कृत से जिनका रूप विपरीत है तथा जिनका विधान नहीं किया गया है
ऐसे शब्दों के भाग रूप का निरूपण तथा नाट्य के अनुरूप व्यवहार में आने
वाले मारिष आदि नामीसमूह के पठनधर्म क्या प्राकृत में भी संस्कृत जैसे ही
होना चाहिए या अन्यथा, इस विचार या आशंका के कारण प्रसंगतः
कर्तव्य दशरूपकों के स्वरूप का भी निरूपण प्रभावित होता है। इसी प्रकार
पूर्व अध्याय के अन्त में पाठ्य का उपसंहार करने से सम्प्रति 'प्राकृत-पाठ्य'
का विवरण आवश्यक है।
२. अपभ्रंश के विषय में विधान को दर्शाने के लिये—'नाना' इत्यादि
से कहा गया है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है—नाना अर्थात् भिन्न-भिन्न
जो अवस्थाएँ देश विशेष से हैं उनमें आत्मा अर्थात् नियतस्वभाव जिसमे
हो; अर्थात् प्रसिद्धि के कारण जो देशविशेष में नियत की गई हो ऐसी
भाषाएँ। इससे यह भी प्राप्त हुआ कि संस्कृत भाषा के शब्द ही वाचक हैं
अन्य अर्थात् प्राकृत भाषा के जो शब्द हैं वे अनुमानतः वाचक होंगे। इसीलिये
कहा गया है कि अन्यत्वेन प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न-अवस्था शब्द का
यहाँ देशविशेष अर्थ कैसे हुआ। उत्तर—क्योंकि जिसमें लोक निवास करते
हैं अतः देश विशेष अवस्था ही है और फिर देशविशेष में ही लोक निवास भी
होता है।
३. संस्कृत तथा प्राकृत भाषा में प्रातिपदिक शब्द समान होने पर
भी विभक्ति में स्वर के कारण विपर्यास होना आवश्यक रहता है। देशी पद
का भी प्रयोगदशा में स्वरगत सम्बन्ध से ही यहाँ उपयोग किया जाता है अतः
वह भी प्राकृत ही है। अन्य आचार्य के मत में प्राकृत वह है जिसमें व्युत्पन्न
नहीं की गई प्रकृति से प्राप्त तथा अव्युत्पन्न जन से जो शब्द प्रयोज्य है तो
वही प्राकृत। इसके तीन प्रभेद यहाँ उद्देश्य क्रम में दिखलाये हैं।
४-५ जो शब्द संस्कृत तथा प्राकृत में समान है उन्हें दिखलाते हैं—
'कमलामल' इत्यादि से। प्राकृत में विभक्तियों में लिङ्गगत स्वातन्त्र होता है
अतः संस्कृत प्राकृत में ( परस्पर ) भेद रहना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा
कि—'संस्कृतेष्वपि' अर्थात् संस्कृत भाषा भी योग को प्राप्त करती है।