नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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है। इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना
देने में या अंकुरगत अर्थ (मूलभूत अर्थ) को कहने में उपचार में अल्पाक्षर
वाले पद की काव्य में (या पद्य में) स्थिति रहनी चाहिये। काव्य अनेक
विध सूचाभिनय तथा अंकुर के प्रकारों से युक्त होता है यदि यही स्वल्पाक्षर
वाले असमस्त पद वाला भी हो तो। क्योंकि अनेक या बहुअक्षर वाले पदों के
बीच सूचा तथा अंकुर की उपपत्ति नहीं होती है।
६१. विराम के होने पर (ही) अभिनयस्थ पदार्थ को विषयानुरूप प्रयोग
में दिखलाया जा सकता है, वह पदार्थ विराम से अवगत होता है तथा कार्य
की अवधि या समाप्ति में विराम रखना होता है। तब समापनीय पदार्थ का
स्वरूप उसकी विरामावस्था में प्रतीत हो जाता है इसीलिये कहा गया है कि
विराम होने पर अभिनय अर्थ को दर्शाता है तथा विराम के अभाव में यही
असमञ्जस हो सकता है या यही कि अभिनय के अर्थ का वहन विराम ही
करता है।
६२-६६. इसी तथ्य को बतलाते हैं—‘यत्र व्यग्रा’ इत्यादि से भी। इस
प्रकार इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पर्य से बतलायी थी अब
यहाँ दृष्टि समन्वित हस्तों की प्रधानता से बतलाने से पुनरुक्ति नहीं होती
है। इसी की व्यापकता को दिखलाई है ‘प्रायः वीर, रौद्र आदि में करना
चाहिये’ इत्यादि कथनों से। कुञ्चितौ = संकोच युक्त। अलङ्कार यहाँ उच्च,
दीप्त इत्यादि होंगे जिन्हें वृत्त के विराम स्थल में रखना चाहिए। जैसे—
‘यो यः शस्त्रं बिभर्त्ति (वे० सं० ३।) में है भी।
उच्च दीप्त ‘काकु’ को पद के अन्त में नहीं रखा जाए। वीर तथा रौद्र
रस में भी स्रग्धरा प्रभृति लम्बे वृत्तों में अर्ध या आदि में विराम नहीं रखना
चाहिए किन्तु पद के अन्त में ही। जैसा कि कहा भी है—‘प्राणवशेन वा’।
अर्थात् आरम्भ में आधे में प्रायः प्राण वायु का संवेग नहीं होता। आशय यही
कि पद के अन्त में ही विच्छेद किया जाए। अथवा ‘प्राणवशेन में’ प्राणशब्द का
अर्थ है रस भावादि। अतः रस एवं भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद किया
जा सकता है तथा यह विच्छेद पाद का आरम्भक या आदि में भी हो सकता
है। इससे यह भी दिखलाया गया है कि अनुबन्ध (आरम्भ) भी विच्छेद
में उपयोगी होता है। ‘शेषम्’ इत्यादि। जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं
हो किन्तु विभावादि की हो तो वहाँ अर्थ के अनुरोध पर विराम रखे जाते
हैं। क्लृप्ताक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर। कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार