नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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३४. अनुवृत्तिः —अब अनुवृत्ति को बतलाते है—'प्रश्रयेणार्थ' इत्यादि
के द्वारा। जैसे भट्टेन्दुराज का पद्य है :—
राजा यद्यनुरुद्ध्यसे यदि भवेद्वाच्यं पुरा मादृशां
तत् सङ्क्रन्दनगोप किञ्चन मनाक् पृच्छत्यधीरो जनः ।
अग्रे रोहणचारिणां सरभसं सञ्चूर्यमाणश्रियं
कम्प्रत्याययितुं प्रयासरसिको यत्नेन रत्नायसे ॥
[ राजा यदि अनुरोध या आग्रह करें और वह भी यदि मेरे जैसे व्यक्ति
को कहने योग्य हो तो हे इन्द्रकीट, यह अधीरजन पूछता है कि रोहण पर्वत
पर सञ्चार करते समय सहसा आगे आने पर बलात् चूर-चूर किये जाने भी
प्रयास करने में रसिक तुम किसे विश्वास देकर समझाने के लिये अपने को
बड़े यत्न से अपने को रत्न के समान मान रहे हो, यह तो बतलाओ । ]
यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा के होने पर भी अप्रस्तुत का जो स्वरूप या शरीर-
गत वैचित्र्य है वह लक्षण के द्वारा ही हो रहा है, क्योंकि लक्षण शरीर भूत है
यह पहिले कहा जा चुका है ।
३५. उपपत्ति :—अब उपपत्ति बतलाते हैं—'प्राप्तानाम्' इत्यादि से ।
यहाँ 'प्राप्तानाम्' में वीप्सागर्भ निर्देश है अर्थात् जो जो प्राप्त होते हों ।
दोषाणाम् अर्थात् अवस्तुभूत क्योंकि उन अर्थों में उपपत्ति का कोई योग या
सम्बन्ध नहीं दिखलाई देता है । जैसे विक्र० के पद्य 'तिष्ठेत् कोपवशात्' इत्यादि
में । ( इसे सम्पूर्ण दिखाया जा चुका है, पृ० ४६३ पर ) । अथवा
जैसे :—क्वाकार्यं शशलक्ष्मण, क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ (विक्र०)
[ अप्सरः कन्या में आसक्ति रूप अकार्य कहाँ और कहाँ चन्द्र का उन्नत
वंश । यह कार्य कुलमर्यादा के विपरीत है । क्या वह फिर कभी दिखाई
पड़ेगी । अरे ! दोषों की शान्ति के लिये हमारा शास्त्र ज्ञान होता है । अरे ।
कोप में भी उसका मुख नितना मनोहर है । निष्पाप एवं पूज्यजन क्या कहेंगे ऐसे
सदाचार के परित्याग करने पर । पर अब तो वह स्वप्न में भी मिलना दुर्लभ
है । अरे मेरे मन, तुम धैर्य एवं स्वस्थता रखो । कौन युवक धन्य होकर उसके
अधर का आस्वादन करेगा । ]
३६. युक्ति :—अब युक्ति का लक्षण करते हैं—'साध्यते' इत्यादि से ।