नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०७
अङ्गानि इत्यादि के द्वारा काकु की ही प्रधानता है इसका उपसंहार
करते हैं—‘अथाङ्गानि’ इत्यादि गद्यभाग से । वाक्य का जो न्यास, त्यजन या
अनादरण है वह नाद का ही है । अतः भाव एवं अभाव, उपचय तथा अपचय
और आरोह तथा अवरोह इनके कारण नाद छः प्रकार हो जाता है । स्वर के
रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैस्वर्य है, वह ध्वनिगत
विसंवाद से होता है यह ( ऐसे स्थानों पर ) सर्वत्र समझना चाहिए ।
शृङ्गार में ( जो ) उदात्त एवं स्वरित को अर्पण एवं विच्छेद आदि अङ्गों
को तथा विलम्बित को अलङ्कार कहा गया वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण
में कर्तव्य है । शिरः स्थान में षड्ज या पञ्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर
के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार चार को मिला कर किया
जाता है । यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो फिर दूरस्थ के साथ आभाषण आदि
सभी कथन पुनरुक्त हो जाएगा । दीपन तथा प्रशमन के विषय में यह विधि है
कि मन्द्र करने के बाद तार नहीं किया जाता है, इसी प्रकार मन्द्रतार से तार
तर को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए ।
समग्रतः काल-तत्त्व की भावना अशक्य है अतः उद्देश्य ग्रन्थ से ही लय और
विराम कहे जाते हैं तथा जिनमें उद्देश्य कुछ भी नहीं होता । विच्छेद से लय
को स्वीकार किया गया है । विच्छेद का अर्थ है विराम । यह विराम कितने
समय वाला हो इसी प्रश्न से लय भी मान लिया जाएगा । इस प्रकार यह
विच्छेद की भी परीक्षा हो गयी ।
अर्थ की समाप्ति के लिये विराम किया जाता है । अर्थ = अवान्तर वाक्य
का अर्थ । केवल छन्द की अपेक्षा से विराम नहीं किया जाता क्योंकि कवि
प्रयोग के अधीन ( परतन्त्र ) रहता है और जब कवि ( ही ) परतन्त्र है
तो फिर उसे विराम वाले छन्दों में विराम के लिये प्रयत्न करना ( ही )
चाहिए । प्रयोग कवि के आधीन नहीं है इसीलिये कहा भी गया कि विराम
अर्थ की अपेक्षा या अधीनता के कारण किये जाते हैं । एक, दो या तीन आदि
संख्याओं का यहाँ जो निर्देश किया गया है वह ( इसी ) नियम का उपलक्षण
समझना चाहिये । जैसे :—‘किं गच्छ’ इत्यादि पद्य में है ।
प्रश्न—अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है तो फिर एक
वाक्यता न रखना ( या मीमांसाशास्त्र के अनुसार वाक्यभेद करना ) दूषण
होता है । उत्तर—कभी-कभी एकवाक्यताभाव दूषण नहीं भूषण भी हो जाता