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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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५१० नाट्यशास्त्र
उदय भी होगा। स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गों के कारण
नहीं होता है। यहाँ 'वर्जितं काव्यदोषैः' पदों से यह भी दिखलाया कि पूर्व
अध्याय के विवरण से इस अध्याय के अर्थ की संगति है।
७६. इस कारिका से-संस्कृत भाषा के लिये दिखलाये गये काकुविधान
का प्रकृत अध्याय के पूर्व प्रतिपादित प्राकृत भाषा में भी अतिदेश है—यह
दिखलाया गया है।
७७. प्रकृत अध्याय के अर्थ का उपसंहार करते हुए यहाँ अग्रिम अध्याय के
अर्थ का सूत्रपात—'दशरूप' इत्यादि से किया गया है। वक्ष्यमाण या अग्रिम
अध्याय में जिनका विवरण दिया जा रहा है उन दशरूपकों के विधान में
जो उपयुक्त पाठ्य ( कहने योग्य या संवाद ) है उसकी योजना इन्हीं ( प्रकृत
अध्याय में दर्शित ) प्रकारों से की जाए।
७८. यहाँ 'तु' शब्द से व्युत्क्रम की सूचना दी गयी है। इस प्रकार
प्रसङ्ग या क्रमप्राप्त जो काकुविधान नहीं था उसे भी अपेक्षावश बतला दिया
गया है। 'अनुपूर्वशः' का आशय है कि अब जो क्रमप्राप्त दशरूपकों का
विधान विवरण है उसको विभागादि विवरणों के सहित पूर्णतः अगले अध्याय
में कहूँगा ॥ शिवम् ॥
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र के श्री बाबूलाल शुक्ल, शास्त्रि प्रणीत
प्रदीप हिन्दी व्याख्यान की अतिरिक्त टिप्पणियों का
द्वितीय-भाग सम्पूर्ण ॥ शिवम् ॥