नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९७
जैसे :—लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डाः ॥
[ यह कोई अन्य ही लावण्य सरिता है जहाँ चन्द्र के साथ कमल भी तैर
रहे हैं, जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदलकाण्ड
तथा मृणालदण्ड भी बह रहे हैं । ]
यहाँ स्पृहणीय उत्कृष्ट नेत्र, मुख आदि का परस्पर शोभात्मक तथा आनु-
कूल्य से उपलक्षित समवाय हैं उससे उपपन्न सरिता रूप अपूर्व अर्थ को सिद्ध
करने वाली अर्थ योजना के कारण यह 'युक्ति' है ।
३७. कार्य :—अब कार्य को बतलाते हैं—'यत्रापसारयन्' इत्यादि से ।
दोष को दूर कर गुण का तत्काल वाच्छनीय अर्थ में नियोजन करें या गुण
को हटा कर दोषों की किसी प्रकृत अर्थनीय पदार्थ में योजना करें तो 'कार्य'
होता है । इसका प्रथम स्थिति में यह उदाहरण है :—
'तावत् स्वात्मनि संश्रितद्रुमलताश्लेषोऽध्वगैर्वर्जनम्' इत्यादि ।
[ पथिकजन मार्गस्थित द्रुम के साथ लता के संश्लेष को भी कामोत्तेजक
होने से देखने की इच्छा छोड़ कर त्याग देते हैं, क्योंकि वैसा वे अपने लिये
ठीक नहीं मानते । ] इत्यादि ।
द्वितीय का उदाहरण है अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
विश्वप्रभो वितरतां कमलां किमन्यत् भूयात् स कोऽपि घटितो भवतोपकारः ।
दूराध्वगेषु पुनरम्बु तथा विकीर्णमन्ते यथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते ॥'
[ हे विश्व के नियन्ता, कमला को हमें प्रदान कीजिये, अन्य बात से हमें
क्या प्रयोजन ! कमला के देने से आपके द्वारा हमारा महान् उपकार हो
जाएगा । दूरस्थ पथिकों के लिये ऐसा जल प्रदान दीजिये जिससे त्रिभुवन में
आपका यश फैल जाए क्योंकि यही अन्तिम कार्य है जो करने योग्य है । ]
यहाँ आपने इसका महान् उपकार किया तथा पथिकों के लिये अतिशय
जल को तृष्णा निवारणार्थ प्रदान किया परन्तु इसके साथ विश्वप्रभो इस अर्थ
की पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जाती है ।
३८. अनुनीति :—अब अनुनीति का लक्षण बतलाते हैं—'अपूर्व' इत्यादि
के द्वारा । अपूर्व अर्थात् अतिशय तीव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिये जो
अपराध हो उसे दूर करना 'अनुनीति । जैसे रत्नावली में 'प्रसीदेति
ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते' ( र० २ । १६ ) [ आप प्रसन्न हों ऐसा यदि
कहता हूँ तो यह कथन आपके क्रोध के बिना बनता नहीं है ( इत्यादि )
३२ ना० शा० द्वि०