सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 612

एकोनविंश अध्याय
( सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जन )
१. वाक्यविधानं तु—यहाँ 'वाक्यविधानं' पद से भाषा को लिया
जाता है क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है तथा वाक्य का प्रयोग किसी
संवाद के ही लिये नाट्य में किया जाता है। इस प्रकार वाक्य तथा भाषा में
अन्योन्य-रूपता का आनयन किया जाता है तथा इसी आशय से वाक्यग्रहण
पद विधान भी हो जाता है।
३. देवानां देवाः—अर्थात् जो देवताओं से स्तुत्य हैं या उनके भी आदर-
पात्र हैं। तथा-पद से यदि स्त्री हो तो उन्हें 'भगवती' पद से सम्बोधित करना
चाहिए।
४-६. नानाश्रुतधराः अर्थात् जो बहुश्रुत हैं। क्षाम्यम् = इस कथन को
स्वीकार किया जाए।
७-८. सचिव = मन्त्री, राजा का सहायक एवं परामर्शदाता। सपरि-
वारम् = आशय यही है कि हीन पात्र जब राजा को सम्बोधित करें तो
अपना नाम लेकर करें तथा उत्तमपात्र सम्बोध्य का भी नाम लेवे।
१३. कर्म अर्थात् कार्य जैसे पाकादि का विज्ञाता या व्यवसायी। विद्या =
त्रयी आदि वेदविद्या। जाति = गोत्र अथवा देश।
१५. शाक्य = बौद्धभिक्षु। निर्ग्रन्थ = क्षपणक। पाषण्ड = पाशुपत सम्प्रदाय
के साधु। स्वसमय = जैसे पाशुपतों के अपने आचारानुसार भासर्वज्ञ इत्यादि
पद से किये गये सम्बोधन।
१६. यौवन में पति को स्त्रियाँ आर्यपुत्र कह कर सम्भाषण करें परन्तु
यौवन से भिन्न दशा में श्वसुर के वंश या उसमें अपत्यप्रत्यय के साथ ही
शब्दप्रयोग किया जाए। जैसे—हे महाराज। यहाँ यौवनपद का आशय है कि
शृङ्गार के उपयुक्त स्थिति में ही।
२२. स्थानीया = पूज्य तथा अवस्था में जो थोड़ी भी बड़ी हों, ऐसी
पारिवारिक स्त्रियाँ।
२६. पत्नी को भार्या शब्द से सम्बोधित करे। इसी कारण नाट्यवेद के
महासत्र में दीक्षित सूत्रधार अपनी नटी पत्नी को 'आर्ये' कह कर बुलाता