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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 668 में से

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पृष्ठ 604

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९३
यहाँ आकार एवं अभिप्राय सूचक काक्वादि से उद्धृत शक्ति के द्योतक
वाक्य के कारण 'पृच्छा' है ।
२५. दृष्टान्त :—अब 'दृष्टान्त' कहते हैं—'विद्वान्' इत्यादि से । जैसे
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :—
हा हालाहल लेहने हतमतिः सोऽयं समुत्कण्ठितो
गाढाङ्गारगरिम्णि चैष जडधीर्देहं निविक्षेप्स्यसि ।
ग्राम्योऽप्याजगवीं गुहं गलगुहां मोहादयं धावति
व्याधूयेतरसङ्गतानि यदयं सार्धं खलैः खेलति ॥
[ अरे यह कैसा दुर्बुद्धि है जो अति भीषण विष को चाटने के लिये
उत्कण्ठित हो रहा है, यह धधकते अंगारों वाली अग्नि में अपने शरीर को
पटकना चाहता है, यह गँवार पुरुष मोहवश अजगर की गले रूपी गुहा में
घुसने के लिये दौड़ लगा रहा है, क्योंकि यह उत्कृष्ट संगति को छोड़ कर
दुष्टों के साथ खेलना चाहता है । ]
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