नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०३
इनमें जो अनुरणनमय रक्ति या अनुरंजना की प्रक्रिया है उसे छोड़ देना चाहिए
( क्योंकि वह गीत में रहेगी ) । इसे छोड़ कर शेष जो केवल उच्च, नीच तथा
मध्यवर्ती स्थान का स्पर्श होता है वही पाठ्य में उपयोगी है। यदि पाठ्य में
स्वरगत रक्ति का प्रधानतः आश्रय लेगें तो फिर यह गानक्रिया होगी पाठ्य
नहीं। यहाँ गान क्रिया में उच्च आदि स्थानों का स्पर्श ही प्रधान है इसी
बात को प्रकृत में वर्णों का उपादान कर बतलाया गया है ।
॰ चित्तवृत्ति के समर्पण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभावरूपता के लाभ के
लिये रसों के भेद से काकुविधान रखा जाता है। इसी कारण काकुओं का
सर्वत्र अनुगत रूप होता है जिसका स्वर की अतिशयिता में उपयोग ( किया
जाता ) है। इसका आगे भी मुनि ने काकुशब्द के द्वारा उच्च, दीप्त आदि
अलङ्कारों में व्यवहार बतलाया है क्योंकि पूर्णता को प्राप्त अलङ्कार आदि
काकुओं के ही उपकारक या सम्पादक होंगे। क्योंकि काकु अर्थों में अभि-
नेयता लाता है अतः काकु ही प्रधान होता है। अन्यथा यदि काकु प्रधान
नहीं होता तो जिसका अंगों के मध्य पाठ किया गया उस मध्यगत अंग का
उपसंहार और अन्य अंगों का निरूपण आदि सभी असमञ्जस हो जाता । इस
कारण प्रकृत में पाठ्य में काकु ही प्रधान होता है यही सिद्धान्त मान्य है।
अब इन स्वरों के आश्रम को दिखलाते हैं—त्रीणि स्थानानि के द्वारा ।
यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्वर किसी स्थान विशेष से ही उद्भूत होते हैं अतः स्वर
ग्रहण से ही स्थान भेद प्राप्त हो जाएगा पुनः स्थान का ग्रहण क्यों किया गया ?
इसका उत्तर यही है कि यहाँ स्थानपद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों की
निवृत्ति करने के लिये है। ये छाछठ ( ६६ ) प्रकार किस प्रकार ?—उत्तर—
उरः प्रदेश में २२—जहाँ श्रुतियाँ तथा स्वर हैं। इसी प्रकार कण्ठ तथा मूर्धा
में होकर ये छाछठ ( २२ × ३ = ६६ ) हो जाते हैं। इन स्थानों के स्पर्श होने
पर गान ही होता है पाठ्य नहीं। इसीलिये पाठ्यगुणान् पद में पाठ्य को गुण
अर्थात् उपकरण वाचक मान कर व्याख्यान किया जाता है।
“शारीर्यामथ वीणायाम्” इत्यादि। वीणा दो प्रकार की होती है जिनमें
एक शरीर रूपी वीणा है जिसमें उरः, शिर तथा कण्ठ स्थान हैं। यह वीणा
बिम्ब स्थानीय होती है। दूसरी वीणा तुम्बी घटिता है। दण्डरूपा वीणा बाह्य
वीणा है तथा यह प्रतिबिम्ब स्थानीया है। इस बाह्य वीणा में काकु की सम्पत्ति
विद्यमान होती है जो रंजनात्मक स्वर स्वरूप है। शारीरी के साथ वीणा
शब्द के कहने का आशय यही है कि यह शरीर के मध्य में विवृत हृदयाकाश