नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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भाषा-श्लेष तथा पताका-स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं। यहाँ अपि
शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास होने पर
उन शब्दों में संस्कृत की समानता नहीं होती जैसे कमल, अमल, इन्द्र
इत्यादि में ।
६-७. अब विभ्रष्ट को—‘ये वर्णः’ इत्यादि से दिखलाते हैं तथा पुनः
इसी को आगे—‘एओआर’ इत्यादि कारिका से भी दिखलाते हैं ।
१७. अपरस्पर निष्पन्नाः = एक दूसरे से संश्लिष्ट नहीं होने वाले अर्थात्
असंयोग वाले या असंयोगरूप वर्ण । अब जहाँ वर्ण संयुक्त हैं उनके विषय में
( संयुक्तानाम् ) भी ।
१८. संयुक्त वर्णों के क्रमशः उदाहरण देते हैं—‘ऋप्सत्सथ्याः’ इत्यादि
से । ‘वच्छों’ में वत्स के त्स को छ हो जाता है ।
२२-२३. ब्रह्मा शब्द में म प्रथम और ह बाद में आ गया तथा ‘ब्र’ का
अन्तर्वर्ती रेफ का लोप हो गया है । इसी प्रकार रेफ का सर्वत्र लोप हो
जाता है वह चाहे ऊपर हो या नीचे—जैसे शक्र तथा अर्क में या कभी दोनों
में जैसे ‘निह्रदि’ शब्द में है ।
२५-२७. संस्कृत एवं प्राकृत भाषा ही वक्तृभेद से चार प्रकार की हो ,
जाती है—इसको दिखलाते हैं—‘भाषा’ इत्यादि से । संस्कृतभाषा ही संस्कृत
है । इसमें स्वरभेद आदि समस्त संस्कार प्राप्त होने से यह ‘संस्कृत’ कहलाती
है । भाषाओं के भेद में इसे बतलाने का आशय यही है कि यह भाषा वह है
जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है परन्तु जो आर्यभाषा से विलक्षण है । •
२८-२६. ‘म्लेच्छशब्दोपचारा’ में उपचार पद का अर्थ है व्यवहार ।
पशुपक्षी आदि के शब्दों को भी नाट्य में किसी प्रयोग के अवसर पर सुनाना
संभावित है । एतदर्थ कहते हैं—‘नाट्यधर्मी’ इत्यादि से ।
३२. कारणव्यपदेशेन = अर्थात् किसी कारण के बहाने से या अवस्था आदि
के वश होकर ।
३२. ऐश्वर्येण प्रमत्त पद के द्वारा यहाँ वेदशास्त्रादि के अध्ययन से हीन
हो जाने की स्थिति संकेतित की गयी है ।
५६-६०. गङ्गासागरमध्य—पद से पूर्व दिशा के देशों के निवासी जन
को दिखलाया गया है । विन्ध्यसागरपद से दक्षिण सौराष्ट्र का ग्रहण किया
गया है । सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु से पश्चिम सौराष्ट्र तथा वेत्रवती ( बेतवा )
नदी से उत्तरवर्त्ती प्रदेश में स्थित प्रदेश को यहाँ लिया जाता है ।