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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८५
७. अभिमान :—'धार्यमाणस्तु' इत्यादि से 'अभिमान' बतलाते हैं ।
जैसे :—शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं
सम्प्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससन्धुक्षिताः ।
किं प्राणान् न हरन्त्युत प्रियतमा-संजल्पमन्त्राक्षरैः
वार्यन्ते किमु यद्विमोहविवशात् सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥
[ यदि चन्द्र की किरणें अमृतमयी हैं तो फिर ये मेरे मन को अतिशय
क्यों सन्तप्त कर रही हैं। यदि कहें कि ये किरणें कालकूट विष के साथ वास
करने से विषाक्त हो गयी है तो फिर ये प्राणों का हरण क्यों नहीं करतीं । ये
प्राणों को हर लेती पर प्रिया के संभाषण रूप मन्त्राक्षरों से इस विष के प्रभाव
को निवारण कर दिया गया है और जब ऐसा हो तो फिर से विष के प्रभाव
से जन्य मोह के कारण सन्तापमयी स्थिति क्यों बना रहीं हैं । ]
यहाँ एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ की योजना ( घटना ) इस प्रकार रखी
गई है जिसमें फल की योजनाओं से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में
अवस्थित नहीं हो पाता है वहीं पर बँध जाता है । इस प्रकार अर्थ अलौकिक
होने से विलक्षण एवं उपेय है । अतः यह अभिभान नामक लक्षण है ।
६. गुणकीर्तन :—अब गुणकीर्तन का स्वरूप—'कीर्त्यमानै' इत्यादि से
दिखलाते हैं । जैसे:—
पृथुरसि गुणैः मूर्त्या रामो नलो भरतो भवान्
महति समरे शत्रुघ्नस्त्वं तथा जनकः स्थितौ ।
इति सुचरितैर्मूत्तिं बिभ्रच्चिरन्तनभूपतां
कथमसि न मान्धाता देवस्त्रिलोकविजय्यपि ॥
[ हे राजन् , आप गुणों से पृथु या विशाल गुणशाली हैं, मूर्ति या आकार
से आप श्रीराम, नल तथा भरत हैं, युद्ध में शत्रुओं के संहर्ता शत्रुघ्न हैं तथा
पालन करने में आप जनक हैं । इस प्रकार उत्तम चरित्रों में चिरन्तन राजगण
के स्वरूप को धारण करते हुए भी आप त्रिलोकजयी मान्धाता क्यों नहीं
( अर्थात् मुझे पालित करने वाले ) हो रहे हैं । ( अवश्य होंगें ) ]
यहाँ गुणों के उल्लेख द्वारा प्रकृत की चारुता से 'गुणकीर्तन' नामक
लक्षण है । यहाँ यद्यपि श्लेष भी अनुग्राहक के रूप में उपस्थित है परन्तु
लक्षण अलङ्कारों में भी वैचित्र्याधायक होता है ( अतः प्रमुख यहाँ लक्षण
( ही ) है । )
१०. प्रोत्साहन :—अब 'प्रोत्साहन' को—'उत्साहजननै' इत्यादि से

४८६ नाट्यशास्त्र
बतलाते हैं। औपम्य का अर्थात् उपमा का जहाँ संश्रय अर्थात् यत्नपूर्वक
अन्वेषण हो ऐसे। जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
हरवृषभ तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसूतिरेका।
निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ॥
[ हे नन्दीश्वर, संसार में एक मात्र असदृश एवं तुम्हारे सदृश जन को
प्रसव करनेवाली तुम्हारे जैसी ही माता की जय हो। जिसका अन्वेषण कर
परमेश शिव भी अपने पुत्रों एवं गणों को साथ लेकर अपनी सहधर्मिणी के
साथ प्रसन्नता से निवास कर रहे हैं । ]
यद्यपि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी है तथापि वैचित्र्य यहाँ लक्षण
का ही है। इसे ही अन्यत्र पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति कहा गया है।
११. उदाहरण :—अब उदाहरण को—‘यत्रैकस्यापि’ इत्यादि से
कहते हैं।
जैसे :—वल्मीकात् किमुतोद्धृतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं
त्रैलोक्यं तपसा जितं यदि सखे दोष्णा किमेतावता ।
सवं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत्
त्वद्दन्ताङ्कितवालि-कक्षरुधिरक्लिन्नाग्रपुङ्खं शरम् ॥
[ यह वल्मीक से उखाड़ा हुआ पर्वत है यह बात किस के मन को स्पर्श
करेगी अर्थात् इसे कौन स्वीकार कर सकेगा। परन्तु हे मित्र, तुमने तप के
द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर त्रैलोक्य को जीता तो इससे क्या हो गया।
हाँ, ये सभी तभी साधु या ठीक होगी जब तुम विरह से क्षीणगात्र वाले
श्रीराम के उस शर को सह सको जिसके पुंख का अग्रभाग तुम्हारे दांतों
के घाव से अङ्कित बालि की कोख के रुधिर से आर्द्र हो गया है । ]
यहाँ बालि के कक्ष के रावण के द्वारा काटने पर उसकी प्रतीकार करने
की असमर्थता को दिखला कर फिर भी घमण्ड रखने की उसी की स्वकीय
प्रकृति का ध्वनन होता है। यहाँ तुम्हारे दांतों से इस रूप में उसके धिक्कार
का कथन करने से ‘उदाहरण’ है।
१२. निरुक्त :—निरुक्त दो प्रकार का होता है। एक सिद्धि अर्थात् जिसे
लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाए वह तथ्य तथा जो लक्षण से सिद्ध
न हो वह अतथ्य। इसका उदाहरण अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
वीरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत् सत्यपथं कथञ्चित् ।
स चार्जुनः सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा ॥

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८७
[ वीरजन के लिये उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने अपने
उद्बोधन से सत्यपथ पर पहुँचा दिया वह पहुँचाने वाला तो कृष्ण ( काला )
और पहुँचने वाला अर्जुन (शुक्ल) है ऐसी यह सभी प्रसिद्धि वितथ ( मिथ्या )
ही समझना चाहिए । ]
यहाँ कृष्ण तथा अर्जुन के नामों से परस्पर अन्यत्र स्थल में सत्यता तथा
अपने विषय में उनमें असत्यता है। यहाँ अर्थश्लेष नहीं हो सकता क्योंकि
वह तुल्यसंख्या के पदार्थ में रहता है जब कि यहाँ एक का दूसरे में संकेत
किया गया है। अर्थात् जो मूढ़ हो उसे कृष्ण ( या काला ) होना चाहिए
किन्तु यहाँ वह अर्जुन है तथा जिसने सत्पथ पर पहुँचाया उसे अर्जुन होना
चाहिए किन्तु वह कृष्ण है। इस प्रकार एक ही में दोनों का व्यवहार हो रहा
है ( यह तथ्य और अतथ्यभूत 'निरुक्त' है ) ।
१३. गुणानुवाद :—गुणों का अनुवाद अर्थात् अनुकथन करना । परिमित
या परिच्छिन्न वस्तु की आपादित या कल्पित उत्कृष्ट गुण से उपमा के द्वारा
जो गुणों का उत्सेक हो वही 'गुणानुवाद' । जैसे:—
'पालिता द्यौरिवेन्द्रेण त्वया राजन् वसुन्धरा ।'
[ हे राजन्, जैसे इन्द्र ने स्वर्ग का पालन किया था वैसा ही आपने
इस पृथ्वी का पालन किया ] यहाँ एक पृथ्वी पर स्थित मनुष्य राजा की
इन्द्र से तुलना कर उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया गया है ।
अतिशय :—उत्तम अर्थ अर्थात् कहे गये अर्थ से जो विशेष अर्थ है । जैसे
भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
यावन्त्येव पदान्यलीकपिशुनैरालीजनेः शिक्षिता
तावन्त्येव कृतागसो दुततरं व्याहृत्य पत्युः पुरः ।
प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा वर्तितुं
प्रेम्णो मौग्ध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः ॥
[ उस मुग्धा को झूठी चुगली लगाने नाली उसकी सखियों ने जितने अक्षर
( या वाक्य ) सिखलाये उतने ही अक्षरों को उसने ( अविवेकवश ) अपने
अपराधी पति के सम्मुख वैसे ही कह दिया तथा फिर काम की भावना के
अनुरूप रति भी की । यह तो भोलेपन से अधिक सुन्दर बन पड़ने वाले प्रेम
का एक विलक्षण एवं सहज सुन्दर ( एवं अतिरिक्त ) प्रक्रम हो गया । ]
यहाँ पर प्रेम में ईर्ष्यात्मा अर्थ जो हो सकता है उससे विशेष बात कही
गयी है तथा प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भी सुन्दरता से देखने योग्य

४८८ नाट्यशास्त्र
रखा गया है अतः यहाँ 'अतिशय' है, क्योंकि यहाँ अर्थ सम्भाव्यमान है अतः
यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार नहीं है ।
१४. हेतु :—अब हेतु या सहेतु को बतलाते हैं—'बहूनाम्' इत्यादि
के द्वारा । अनेक बोलने वालों का अनादर कर किसी एक असाधारण अर्थ
के निर्णय का कर्तव्य रूप में अवलम्बन कर सिद्ध प्रमाणभूत उपमान का
प्रक्षेप या कथन हो (अर्थात् मुझे ऐसा प्रतिभात होता है )—तो उसे 'हेतु'
समझना चाहिए । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
एके वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं
केचित् पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेऽह्नि चन्द्राचिषाम् ।
मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि प्रत्यक्षतीव्रातपो
मन्येऽहं पुनरध्वनीन-रमणीचेतोऽधिशेते रविः ॥
[ दिन के क्षीण होने पर कुछ कहते हैं कि चन्द्र की किरणों का जलनिधि
में प्रवेश हो जाता है, अन्य कहते हैं कि इसका अग्नि ( में प्रवेश या )
योग होता है किन्तु हे सखि, ये सभी बाते मिथ्या हैं, क्योंकि इनका साक्षी
कोई नहीं है । परन्तु प्रत्यक्ष में जो इसका तीव्र आतप अनुभव किया जा रहा
है उससे मैं तो यह मानती हूँ कि यह पथिक विरहियों के विरह से जलने
वाली विरहिणियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है, चन्द्र नहीं ] ।
यहाँ असाधारण अर्थ का कथन होने से 'हेतु' है ।
१५. सारूप्य :—अनुकरण से उत्पन्न होने से अपदेश जहाँ परोक्ष है तो
'सारूप्य' ।
इसका उदाहरण आचार्य अभिनवगुप्त पाद का यह पद्यः—
सैन्दूरीकृतसान्द्रकुङ्कुमरसप्रच्छायमालोच्यते
यत् प्राच्यां दिशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्द्वन्द्वलेह्यं महः ।
तत्तेजो जरठांशुतां कलयता भाविप्रवासावधि
सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कीर्णो नखाग्राङ्कुरः ॥
[ जो पूर्व दिशा में टेढ़ा तथा दोनों नेत्रों से देखने योग्य सिन्दूर से गाढ़े
कुङ्कुम रस सदृश यह दिखलाई दे रहा है । यह उस तेज की जरठांशुता को
प्रवास की भावी अवधि की सूचना देनेवाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू
के कपोल पर अङ्कित अभिनव नखाग्राङ्कुर है । ]
यहाँ यत् पद से निर्देश्य जो वस्तु है वह परोक्ष है क्योंकि यहाँ तत्त्व का
पूर्ण परिज्ञान नहीं है । आलोच्यते से उसकी छाया मात्र अपदेश्य है । यहाँ
सैन्दूरीकृत इत्यादि से जिसकी दर्शन क्रिया बतलाई वह प्रमाण सहित वस्तु

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८९
है अतः यहाँ 'सारूप्य' लक्षण है। यहाँ उपमालङ्कार नहीं है क्योंकि उपमेय
शब्दोपात्त नहीं है पर पूर्वार्ध से उपमेय को सूचित किया जाना अवश्य
मिलता है।
१६. मिथ्याध्यवसाय :-अब मिथ्याध्यवसाय को कहते हैं- अभूतपूर्वैः
इत्यादि से। वास्तविकता से रहित अर्थों के द्वारा तत्तुल्य अवस्तुभूत अर्थान्तर
का वक्ता के व्यापार या बोलने पर निश्चय होना 'मिथ्याध्यवसाय' है। जैसा
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :-
यो दुर्जनाद्वाञ्छितसिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम् ।
जुह्वज्ज्वलाग्नौ विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत् ॥
[ जो दुर्जन से वाञ्छित अर्थ की सिद्धि चाहता है वह अवश्य ही
उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और जलती अग्नि में हवन करते
हुए हठात् ही अर्थ या प्रयोजन रूप षष्ठ विषय को सिद्ध करने का उद्योग
करता है। ]
यहाँ छठी इन्द्रिय के अभाव में उसके विषय की जैसे कोई स्थिति नहीं
उसी प्रकार दुर्जन से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती। यह काव्यलक्षण
है ऐसा कहने का आशय यही है कि काव्य में लोक का विपर्यास थोड़ा या
अधिक होता ( ही ) है। इसे अन्य पाठ में 'विपर्यय' बतलाया गया है।
१७. सिद्धि :- अब सिद्धि बतलाते हैं- 'बहूनाम्' इत्यादि से। अनेक
प्रसिद्ध पदार्थों में से किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं। यह उस अप्रसिद्ध
की असाधारण सम्पत्ति के लिये कहा जाता है। अतएव उसमें जिसका निवेश
कर वैसा कहते है यह सिद्धि का हेतु होने से 'सिद्धि' कहा गया है।
जैसे :-
भद्रेश्वरः सुरसरित् स भवानहञ्च त्रैलोक्यसारमिह सम्प्रति जीवलोके ।
भद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्थिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु ॥
यहाँ आप और मैं-इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के बीच में उपादान-
असाधारण्य को दिखला कर 'सिद्धि' का विधान करता है।
१८. पदोच्चय :-अब पदोच्चय को 'गुणैर्बहुभि.' से कहते हैं। एक
तात्पर्य के विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक शब्दों के वाच्यरूप में स्वीकृत जो
धर्म हैं उनका उपलक्षण कर जो वस्तु का प्रसंशन है वह पदोच्चय। क्योंकि
अर्थों की उपलब्धि काव्य में स्थित पदों से ही होती है। अतः इन पदों का
उच्चय अर्थात् बाहुल्य जहाँ हो वह 'पदोच्चय' है।

४९० नाट्यशास्त्र
जैसे—असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं
निरालोकं लोकं जननयननिर्माणमफलम् ।
अदर्पं कन्दर्पं मरणशरणं बान्धवजनं
जगज्जीर्णारण्यं कथमसि विधातुं व्यवसितः । ( मालतीमाधवे । )
[ संसार को असार, त्रैलोक्य को रत्नरहित, संसार को प्रकाश हीन,
लोकनेत्रों के निर्माणभूत सौंदर्य को निष्फल, काम को दर्प से विकल,
बान्धवों को मरण की शरण लेने वाले तथा जगत् को जीर्ण अरण्य बनाने के
लिये ऐसा व्यवसाय क्यों कर रहे हो ( कि तुम मालती को मेरे ही सम्मुख
समाप्त करना चाहते हो ) ]
यहाँ अवन्तर अर्थों के बोधक अवान्तर वाक्य रूप पदों का तात्पर्य एक ही
है, किन्तु उन पदों का अपना वाच्यार्थ भिन्न-भिन्न है । यहाँ पदोच्चय पद में
पद का अर्थ है पाद या भाग । अन्य आचार्यों के मत में पूर्व से या आरम्भ
से जो अर्थ चलता हो उसी अर्थ का अन्त तक चलना एकार्थ तात्पर्यक होता है
अतः 'पदोच्चय' है ।
१६. आक्रन्द :—अब आक्रन्द को 'आत्मभावम्' इत्यादि से कहते हैं ।
यहाँ एक अर्थ कटु या कठोर रहने से साक्षात् या सीधे नहीं कहा जाता है
इसीलिये ऐसे अर्थ को सादृश्य के द्वारा आरम्भ में रख कर आगे स्फुट कर
प्रतिपाद्य भाव को प्रधानता से रखते हैं, अतः यह 'आक्रन्द' है । जैसे आचार्य
अभिनवगुप्त का यह पद्य :—
किं पान्थ त्वरसे विलोकय निशां या ह्युन्मुखी पाण्डुरा
चन्द्रं चुम्बितुमीहते प्रकटयन्त्यग्रे सरागां स्थितिम् ।
यद्वा नागर-भोगदुर्ललितकैन्र्यंस्तापि न ज्ञायते
ग्रामेऽग्राम्यजनोपभोगसुभगं निर्व्याज रम्यं सुखम् ॥
[—अरे पथिक, तुम क्यों इतनी शीघ्रता कर रहे हो, जरा इस रात्रि
को तो देखो जो उन्मुखी अर्थात् अपने प्रिय की प्रतीक्षा में ऊपर मुंह किये हुए
तथा विरह से पाण्डुर (पीली) हो गयी है तथा जो आरम्भ में ही अपनी राग-
मयी ऐसी स्थिति को दिखला रही है या फिर नागरिक पदार्थों के भोग
दुलारों से उपेक्षित कर दी गयी है जिसे वह नहीं जानती परन्तु यह समझ
रखिये कि इस ग्राम में भी नागरजन के उपभोग की सुभग, निश्छल एवं
रमणीय सुख की स्थिति बन सकती है । ]
यहाँ उत्तरार्ध में संकेतित ग्रामीण भोग को नायिका स्वाभिप्राय के रूप

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९१
में सीधे न कह कर अरोचक एवं रोचक सुख के उपन्यास से दोनों प्रकार के
तत्त्वों को बतलाते हुए निशाकर के वृत्तान्त की समानता से अपने अभिप्राय
को प्रकट करती है अतः 'आक्रन्द' है। यहाँ प्रथमार्ध से पर सादृश्य तथा
उत्तरार्ध द्वारा अप्रत्यक्ष भाव की ज्ञापना या संकेत भी दिया गया है।
२०. मनोरथ :—अव मनोरथ को 'हृदयस्थस्य' इत्यादि से कहते हैं ।
जैसे :—णिग्गंध-दुरारोहिं पुत्तअ मा पाडलिं समारूढ ।
आरूढणिपडिआ के इमिए ण कआ इह ग्गामे ॥
[ निर्गन्धदुरारोहां पुत्रक पाटलिं मा समारोह ।
आरूढनिपतिताः के नया न कृता इह ग्रामे ॥—छाया ]
[ नासमझ बेटे, गन्धशून्य एवं कण्टकाकीर्ण रहने से आरोहण के अनुप-
युक्त इस पाटली पर तुम आरोहण मत करो, क्योंकि इस ग्राम में इसने किसे
ऊपर नहीं उठाया और फिर नीचे गिराया है । ]
यहाँ वृक्ष पर आरोहण करने के व्याज से किसी पुंश्चली के इच्छुक व्यक्ति
को कोई वृद्धा अपने अभिप्राय को दिखला कर समझा रही है। यह अन्य को
कह कर उसके अन्तर्गत ( अर्थात् अन्यापदेश में रहने से ) प्रस्तुत ही है
अतः यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा है ही, परन्तु यह लक्षणीय रहने से 'लक्षण' ही हैं;
क्योंकि अलङ्कार में अलङ्कार्यत्व असत् है यह कोई युक्ति नहीं हो सकती ।
२१. आख्यान :—अब आख्यान को—'अपृष्टै' इत्यादि से कहते हैं ।
जहाँ प्रश्नों के द्वारा अनेक पदार्थों का निश्चय होता है। जैसे—'बाले नाथ
विमुञ्च मानिनि रुषं' इत्यादि ( अम० शत० ) पद्य की उक्ति प्रत्युक्तियों
में। या फिर बिना ही प्रश्न किये प्रश्न जैसे वाक्यों से शक्य या अशक्य
वस्तुओं के कथन से जहाँ निश्चय हो ऐसे प्रदेश में जैसे 'रामोऽसौ भुवनेषु
विक्रमगुणैः' इत्यादि पद्य में है। यह नाटकाश्रय लक्षण होता है अतः बार-
वार प्रयोग के योग्य होता है, यह दिखलाया गया है ।
२२. याच्ञा :—अव याच्ञा को 'आदौ यत्' इत्यादि से कहते है । इसमें
प्रथमार्ध से हित या इष्ट को दिखलाया ( गया ) है, जिससे यह आशय
प्रकट होता है कि प्रथम अर्थात् आपाततः वह परुष होता है किन्तु परिणाम
में वही वस्तु सम्यक् फल वाली हो जाती है, अतः प्रिय है तथा हितावह होने
से भी प्रिय है ऐसी समझाने की बुद्धि से याच्ञा करना ही 'याच्ञा' है। जैसे
आचार्य अभिनवगुप्त के निम्न पद्य में :—

४९२ नाट्यशास्त्र
भूमिः कण्टकिनी पुरो विटपिनः प्रायो बहूपद्रवाः
भूयश्चैव दिवाकरो मृगयते सन्ध्याङ्गनासङ्गमम् ।
तद्विश्रम्य जनोऽयमत्र सदने ग्राम्योचितां सेवतां
प्रातः पान्थ विचार्य चेतसि चिरं स्थातासि गन्तासि वा ॥
[ यह भूमि कांटों से युक्त है, सामने वाले वृक्षों में उपद्रव भरा है तथा
इधर यह सूर्य भी अपनी सन्ध्यावधू के साथ मिलन को खोज रहा है । इसी
कारण इस समय घर में विश्राम लेकर ग्राम्योचित क्रिया का उपभोग करना
उचित है और प्रातः होने पर विचार करना कि आगे जाना ही है या
ठहरना है । ]
( इसे ही अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' माना है तथा इसका जो अन्य लक्षण
भी मिलता है उसे यथा स्थान देखना चाहिए )
२३. प्रतिषेध :—अब प्रतिषेध का निरूपण करते हैं—‘कार्येषु’ इत्यादि
से । जैसे अमरूक के इस पद्य में :--
लग्ना नांशुकपल्लवे भुजलता न द्वारदेशेऽर्पिता
नो वा पादयुगे तथा निपतितं तिष्ठेति नोक्तं वचः ।
काले केवलमम्बुदालिमलिने गन्तुं प्रवृत्तः शठः
तन्व्या बाष्पजलोपकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥
[ वह पुरुष जब अम्बुराशि से मलिन मेघों वाले समय में दूर देश जाने
को उद्यत हुआ तो उसे रोकने के लिये उस बाला ने न तो कपडे को पकड़ा,
न द्वार देश पर अर्गला सी भुजलता को फैलायी, न उसके चरणों में गिरी
और न ठहरने के लिये शब्द ही कहे किन्तु वह विरह में रोने लगी तो उसके
आँसुओं की नदी बहने से वह शठ उसके प्रवाह से मार्ग अवरुद्ध हो जाने से
आगे नहीं जा सका । ]
इस पद्य के तृतीयपाद से नायक के विपरीत कार्य की प्रवृत्ति दिखलाई
गयी है और पश्चार्ध से नायिका की । यद्यपि कर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति यहाँ
ही सामने आती है परन्तु अन्तिम कार्य से उसने प्रिय की यात्रा का निवारण
कर ही डाला । यह बात चतुर्थपादगत कविचातुर्य से दिखलाई गयी अतः
यहाँ 'प्रतिषेध' है ।
२४. पृच्छा :—अब पृच्छा का निरूपण करते हैं—'यत्राकारोद्भवैः'
इत्यादि से । जैसे वेणीसंहार में—
किं भीमाद् गुरुदक्षिणां गुरुगदाद् भीमप्रियः प्राप्तवान् ( वे० सं० ६। )
[ क्या उन ने भयंकर गदाधारी तथा प्रिय भीम से गुरुदक्षिणा
प्राप्त की ? ]

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९३
यहाँ आकार एवं अभिप्राय सूचक काक्वादि से उद्धृत शक्ति के द्योतक
वाक्य के कारण 'पृच्छा' है ।
२५. दृष्टान्त :—अब 'दृष्टान्त' कहते हैं—'विद्वान्' इत्यादि से । जैसे
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :—
हा हालाहल लेहने हतमतिः सोऽयं समुत्कण्ठितो
गाढाङ्गारगरिम्णि चैष जडधीर्देहं निविक्षेप्स्यसि ।
ग्राम्योऽप्याजगवीं गुहं गलगुहां मोहादयं धावति
व्याधूयेतरसङ्गतानि यदयं सार्धं खलैः खेलति ॥
[ अरे यह कैसा दुर्बुद्धि है जो अति भीषण विष को चाटने के लिये
उत्कण्ठित हो रहा है, यह धधकते अंगारों वाली अग्नि में अपने शरीर को
पटकना चाहता है, यह गँवार पुरुष मोहवश अजगर की गले रूपी गुहा में
घुसने के लिये दौड़ लगा रहा है, क्योंकि यह उत्कृष्ट संगति को छोड़ कर
दुष्टों के साथ खेलना चाहता है । ]
यहाँ

४९४ नाट्यशास्त्र
उड़ा ले गया हो । नहीं—मेरे सामने साधारण शत्रु तो क्या देवशत्रु राक्षस
भी उसे हरण नहीं कर सकते हैं। वह फिर भी आँखो से वह कैसे एकदम
ओझल हो गयी, यह कैसा व्यवहार है । ]
यहाँ आद्यभाग संशय का उदाहरण है तथा शेष भाग उपपत्ति का है ।
२८. आशी : —अब आशी: को बतलाते हैं—'यथा शास्त्रार्थ' इत्यादि
से । जैसे रत्नावली में—'पादाग्रस्थितया' ( १।१ ) इत्यादि । प्रश्न—यह
आशी: अलंकार लक्षण कैसे हो गया । उत्तर—क्योंकि यहाँ वर्णनीय
स्तुति ही है ।
२९. प्रियवचन : —अब प्रियवचन को बतलाते हैं—'आदौ यत्'
इत्यादि से । जैसे :—
किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थः
तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः ।
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्यां
उन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥
[ दूसरों के घर की बात से हमें क्या वास्ता किन्तु मैं चुप रहने में समर्थ
नहीं हूँ, क्योंकि दाक्षिणात्यों का स्वभाव ही है कि वे स्वभाव से ही वाचाल
होते हैं । अच्छा, वह दूसरों के घर की बात क्या है, तो कहता हूँ कि आपकी
वल्लभा कीर्ति घरों, बाजारों, चौराहों और मद्यशाला तक में उन्मत्त हुई सी
घूम रही है । ( अर्थात् आपकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो रही है । ]
यहाँ आपकी वल्लभा घूम रही है यह कथन आरम्भ में क्रोध का जनक
होकर भी 'हन्त कीर्तिः' कहने पर हर्ष का भी उत्पादक है, अतः 'प्रियवचन'
है । यहाँ व्याजस्तुति नहीं है क्योंकि जहाँ निन्दा का अंश है वहाँ स्तुति नहीं
है और पूरी तरह से नहीं निन्दा है ।
३०. कपटसङ्घात : —अब कपट-संघात को बतलाते हैं—'छलयुक्त्या'
इत्यादि से । यहाँ छल के प्रयोग या बहाने से वञ्चना करने वाला कथन या
अर्थ को अन्यथा ग्रहण करना कपट है तथा उसका संघात 'लक्षण' बनता है ।
यह कपट वस्तुक्रम से या दैव से या शत्रु के प्रयोग से उद्भूत होता है । इनमें
वस्तुक्रम से उद्भूत जैसे-मालतीमाधव में मकरन्द का मालतीवेषधारण करना ।
दैवोद्भूत जैसे—नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन का शंखचूड को छलना ।
शत्रु के प्रयोग से उद्भूत जैसे छलितराम नाटक में लवणासुर द्वारा प्रेषित
राक्षसों के द्वारा मन्थरा और कैकेयी का वेष धारण कर गर्भवती सीता को
निर्वासित करवाना । इसके अतिरिक्त अन्य भी हैं—जैसे कृत्यारावण के प्रथम

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९५
अंक में सीता के वेष को धारण करने वाली शूर्पणखा के द्वारा लक्ष्मण को
वञ्चित एवं तिरस्कृत करना । 'ता सव्वहा अण्ण एव्व दे अणिबद्धं अभिप्पाअं
लक्खेभि' [ तत् सर्वथा अन्यमेव तेऽनिर्बन्धमभिप्रायं लक्षयामि ] इत्यादि से ।
३१. क्षमा :—अब क्षमा को बतलाते है—'दुर्जनोदाहृतै' इत्यादि से ।
दुर्जन के क्रोध उत्पन्न करने वाले कथनों से सभी के समक्ष सभा में तिरस्कृत
होकर भी जो पुरुष क्रोध नहीं करता वह क्षमावान् है । ऐसे उस पुरुष
के वर्णन योग्य कवि व्यापार को 'क्षमा' लक्षण समझना चाहिए । इससे यह
भी सूचित होता है कि औचित्य के अनुरूप भिन्न वृत्तियों का विभावादि के
उपयुक्त सञ्चय काव्यलक्षण के रूप में संग्रह के योग्य होगा । इसका उदाहरण
जैसे आचार्य अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
श्रोत्राय दुष्टवचनं प्रति किं न कोपः क्षोभं करोति हृदये ननु कोप एव ।
मित्रं ममैष तु निजात्मनि योऽपकारं कृत्वा ममाशुभकलङ्क-विघातहेतुः ॥
[ क्या कानों को बुरे वचन सुन कर क्रोध नहीं होता परन्तु जो हृदय में
क्षोभ उत्पन्न करे वह तो कोप है ही परन्तु जो अपकार करके भी मेरे अशुभ
कलंक को दूर करने में कारण बनता हो वह तो मेरा मित्र ही होगा यह
निश्चय ही कहा जा सकता है । ]
३२. प्राप्ति :—अब प्राप्ति को दिखलाते है—'दृष्ट्वैवावयवं' इत्यादि से ।
जैसे शाकुन्तल में—
अभ्युन्नता पुरस्तादवगाढ़ा जघनगौरवात् पश्चात् ।
द्वारेऽस्य पाण्डुसिकते पदपङ्क्तिर्दृश्यतेऽभिनवा ॥ (अ० शा० ३।५)
[ पीली रेत से युक्त इस लतामंडप के द्वार पर आगे की ओर उठा हुआ
तथा कटि भार के कारण पीछे की ओर गहरा होने वाला यह नवीन
पदचिह्न दिखाई पड़ रहा है । ]
इस लक्षण ( पद पंक्ति रूप अंश ) को देख कर वह यहाँ होगी ऐसा
शकुन्तला के सद्भाव का उन्नयन 'प्राप्ति' है ।
३३. अब पश्चात्ताप को दिखलाते हैं—'अकार्यं सहसा' इत्यादि से ।
सहसा का अर्थ है बिना विचार के किसी न करने योग्य कार्य को करके ।
जैसे—'मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः ।
कथमप्युन्नमितं न चुम्बितन्तु ॥ ( शाकु० ३ । २२ )
[ उस मनोहरनेत्रों वाली का कन्धे की ओर मुड़ा हुआ मुंह किसी प्रकार
उठाया तो परन्तु मैं चूम न सका । ]

४९६ | नाट्यशास्त्र

३४. अनुवृत्तिः —अब अनुवृत्ति को बतलाते है—'प्रश्रयेणार्थ' इत्यादि
के द्वारा। जैसे भट्टेन्दुराज का पद्य है :—
राजा यद्यनुरुद्ध्यसे यदि भवेद्वाच्यं पुरा मादृशां
तत् सङ्क्रन्दनगोप किञ्चन मनाक् पृच्छत्यधीरो जनः ।
अग्रे रोहणचारिणां सरभसं सञ्चूर्यमाणश्रियं
कम्प्रत्याययितुं प्रयासरसिको यत्नेन रत्नायसे ॥
[ राजा यदि अनुरोध या आग्रह करें और वह भी यदि मेरे जैसे व्यक्ति
को कहने योग्य हो तो हे इन्द्रकीट, यह अधीरजन पूछता है कि रोहण पर्वत
पर सञ्चार करते समय सहसा आगे आने पर बलात् चूर-चूर किये जाने भी
प्रयास करने में रसिक तुम किसे विश्वास देकर समझाने के लिये अपने को
बड़े यत्न से अपने को रत्न के समान मान रहे हो, यह तो बतलाओ । ]
यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा के होने पर भी अप्रस्तुत का जो स्वरूप या शरीर-
गत वैचित्र्य है वह लक्षण के द्वारा ही हो रहा है, क्योंकि लक्षण शरीर भूत है
यह पहिले कहा जा चुका है ।
३५. उपपत्ति :—अब उपपत्ति बतलाते हैं—'प्राप्तानाम्' इत्यादि से ।
यहाँ 'प्राप्तानाम्' में वीप्सागर्भ निर्देश है अर्थात् जो जो प्राप्त होते हों ।
दोषाणाम् अर्थात् अवस्तुभूत क्योंकि उन अर्थों में उपपत्ति का कोई योग या
सम्बन्ध नहीं दिखलाई देता है । जैसे विक्र० के पद्य 'तिष्ठेत् कोपवशात्' इत्यादि
में । ( इसे सम्पूर्ण दिखाया जा चुका है, पृ० ४६३ पर ) । अथवा
जैसे :—क्वाकार्यं शशलक्ष्मण, क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ (विक्र०)
[ अप्सरः कन्या में आसक्ति रूप अकार्य कहाँ और कहाँ चन्द्र का उन्नत
वंश । यह कार्य कुलमर्यादा के विपरीत है । क्या वह फिर कभी दिखाई
पड़ेगी । अरे ! दोषों की शान्ति के लिये हमारा शास्त्र ज्ञान होता है । अरे ।
कोप में भी उसका मुख नितना मनोहर है । निष्पाप एवं पूज्यजन क्या कहेंगे ऐसे
सदाचार के परित्याग करने पर । पर अब तो वह स्वप्न में भी मिलना दुर्लभ
है । अरे मेरे मन, तुम धैर्य एवं स्वस्थता रखो । कौन युवक धन्य होकर उसके
अधर का आस्वादन करेगा । ]
३६. युक्ति :—अब युक्ति का लक्षण करते हैं—'साध्यते' इत्यादि से ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९७
जैसे :—लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डाः ॥
[ यह कोई अन्य ही लावण्य सरिता है जहाँ चन्द्र के साथ कमल भी तैर
रहे हैं, जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदलकाण्ड
तथा मृणालदण्ड भी बह रहे हैं । ]
यहाँ स्पृहणीय उत्कृष्ट नेत्र, मुख आदि का परस्पर शोभात्मक तथा आनु-
कूल्य से उपलक्षित समवाय हैं उससे उपपन्न सरिता रूप अपूर्व अर्थ को सिद्ध
करने वाली अर्थ योजना के कारण यह 'युक्ति' है ।
३७. कार्य :—अब कार्य को बतलाते हैं—'यत्रापसारयन्' इत्यादि से ।
दोष को दूर कर गुण का तत्काल वाच्छनीय अर्थ में नियोजन करें या गुण
को हटा कर दोषों की किसी प्रकृत अर्थनीय पदार्थ में योजना करें तो 'कार्य'
होता है । इसका प्रथम स्थिति में यह उदाहरण है :—
'तावत् स्वात्मनि संश्रितद्रुमलताश्लेषोऽध्वगैर्वर्जनम्' इत्यादि ।
[ पथिकजन मार्गस्थित द्रुम के साथ लता के संश्लेष को भी कामोत्तेजक
होने से देखने की इच्छा छोड़ कर त्याग देते हैं, क्योंकि वैसा वे अपने लिये
ठीक नहीं मानते । ] इत्यादि ।
द्वितीय का उदाहरण है अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
विश्वप्रभो वितरतां कमलां किमन्यत् भूयात् स कोऽपि घटितो भवतोपकारः ।
दूराध्वगेषु पुनरम्बु तथा विकीर्णमन्ते यथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते ॥'
[ हे विश्व के नियन्ता, कमला को हमें प्रदान कीजिये, अन्य बात से हमें
क्या प्रयोजन ! कमला के देने से आपके द्वारा हमारा महान् उपकार हो
जाएगा । दूरस्थ पथिकों के लिये ऐसा जल प्रदान दीजिये जिससे त्रिभुवन में
आपका यश फैल जाए क्योंकि यही अन्तिम कार्य है जो करने योग्य है । ]
यहाँ आपने इसका महान् उपकार किया तथा पथिकों के लिये अतिशय
जल को तृष्णा निवारणार्थ प्रदान किया परन्तु इसके साथ विश्वप्रभो इस अर्थ
की पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जाती है ।
३८. अनुनीति :—अब अनुनीति का लक्षण बतलाते हैं—'अपूर्व' इत्यादि
के द्वारा । अपूर्व अर्थात् अतिशय तीव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिये जो
अपराध हो उसे दूर करना 'अनुनीति । जैसे रत्नावली में 'प्रसीदेति
ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते' ( र० २ । १६ ) [ आप प्रसन्न हों ऐसा यदि
कहता हूँ तो यह कथन आपके क्रोध के बिना बनता नहीं है ( इत्यादि )
३२ ना० शा० द्वि०

४९८ नाट्यशास्त्र
अर्थात् यह तभी कहा जा सकता है । जब आप कुपित हों जब कि आपके
कुपित होने का कोई अंदेशा ही नहीं है ।
३६. परिदेवन :—अब परिदेवन का स्वरूप बतलाते हैं—‘दोषैर्यदन्य’
इत्यादि से । जैसे बालरामायण में दशरथ के नाम से जो राम को निर्वासन देने
आदि में दोष कहे गये थे उन प्रसिद्ध दोषों का राक्षसों के साथ सम्बन्ध जोड़ना
उचित है, दशरथ के साथ नहीं । ऐसे युक्तियुक्त वाक्यों का प्रयोग करना
‘परिदेवन’ समझना चाहिये । जैसे—नरेन्द्रे वृद्धे स्त्रीवशः यत्नमयशः’ ( राजा
ने बुढ़ापे में स्त्री के वश होकर अयश में अपने को डाल दिया ) इसके
अतिरिक्त किसी प्रयोजन से अन्य के नाम पर अभिहित जो अर्थ है
उनका प्रसिद्ध अर्थों ( दोषों ) के साथ सम्वाद अर्थात् अन्य के मन में स्थित
दोषों का सम्बन्ध बतला देना, जो वस्तुतः किसी अन्य के साथ होना उचित
हो तो ऐसे वाक्यों का कथन भी ‘परिदेवन’ होता है । जैसे इस पद्य में :—
एनां पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरो
गाण्डीवेन किरीटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः ।
इत्याकर्ण्य कथाऽद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापते—
र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोर्मण्डनम् ।।
[ इस सामने की तटी को तो देखो, यहाँ कीड़ा के बहाने से किरात
वेषधारी भगवान् शिव के चूडान्तर पर ( मस्तक पर ) अर्जुन ने गाण्डीव
धनुष का बड़े वेग से शक्तिशाली प्रहार किया था । ऐसी सुभद्रापति ( अर्जुन )
के शौर्य की अद्भुत कथा को सुन कर जिसने अपने भुजाओं को मन्द मन्द
मण्डलाकार किया या भुजाओं में मण्डन किया । ]
यहाँ तट के विलोकन के उद्देश्य से जो धनञ्जय का व्यापार बतलाया गया
उसने किसी राजा के मन में दोषों का सम्बन्ध उत्पन्न कर डाला अर्थात् उसे
ईर्ष्या हो गयी कि मेरे मनुष्य होने तथा अर्जुन के भी मनुष्य रहने पर मेरी
अर्जुन के सदृश पराक्रम करने की सामर्थ्य कहाँ ( अर्थात् उससे मैं न्यून हो रहा
हूँ ) । अतएव इस मण्डन से अधिकार स्थित लोगों को क्या मद होगा । इस
प्रकार उस विषय में परम औचित्य का ख्यापन रूप प्रयोजन ‘परिदेवन’ है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि कवि के व्यापार के बल से प्राप्त अर्थ जो लौकिक
एवं स्वाभाविक कारण जहाँ विद्यमान हो वहीं ‘लक्षण’ होता है । यह इन
उदाहरणेों से तथा लक्षणों से व्याख्यात हुआ ।

अष्टादश अध्याय
( भाषा-विधान )
१. शास्त्रों में प्रसिद्ध संस्कृत भाषा के विपरीत प्राकृत भाषा के प्रसंग से
संस्कृत से जिनका रूप विपरीत है तथा जिनका विधान नहीं किया गया है
ऐसे शब्दों के भाग रूप का निरूपण तथा नाट्य के अनुरूप व्यवहार में आने
वाले मारिष आदि नामीसमूह के पठनधर्म क्या प्राकृत में भी संस्कृत जैसे ही
होना चाहिए या अन्यथा, इस विचार या आशंका के कारण प्रसंगतः
कर्तव्य दशरूपकों के स्वरूप का भी निरूपण प्रभावित होता है। इसी प्रकार
पूर्व अध्याय के अन्त में पाठ्य का उपसंहार करने से सम्प्रति 'प्राकृत-पाठ्य'
का विवरण आवश्यक है।
२. अपभ्रंश के विषय में विधान को दर्शाने के लिये—'नाना' इत्यादि
से कहा गया है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है—नाना अर्थात् भिन्न-भिन्न
जो अवस्थाएँ देश विशेष से हैं उनमें आत्मा अर्थात् नियतस्वभाव जिसमे
हो; अर्थात् प्रसिद्धि के कारण जो देशविशेष में नियत की गई हो ऐसी
भाषाएँ। इससे यह भी प्राप्त हुआ कि संस्कृत भाषा के शब्द ही वाचक हैं
अन्य अर्थात् प्राकृत भाषा के जो शब्द हैं वे अनुमानतः वाचक होंगे। इसीलिये
कहा गया है कि अन्यत्वेन प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न-अवस्था शब्द का
यहाँ देशविशेष अर्थ कैसे हुआ। उत्तर—क्योंकि जिसमें लोक निवास करते
हैं अतः देश विशेष अवस्था ही है और फिर देशविशेष में ही लोक निवास भी
होता है।
३. संस्कृत तथा प्राकृत भाषा में प्रातिपदिक शब्द समान होने पर
भी विभक्ति में स्वर के कारण विपर्यास होना आवश्यक रहता है। देशी पद
का भी प्रयोगदशा में स्वरगत सम्बन्ध से ही यहाँ उपयोग किया जाता है अतः
वह भी प्राकृत ही है। अन्य आचार्य के मत में प्राकृत वह है जिसमें व्युत्पन्न
नहीं की गई प्रकृति से प्राप्त तथा अव्युत्पन्न जन से जो शब्द प्रयोज्य है तो
वही प्राकृत। इसके तीन प्रभेद यहाँ उद्देश्य क्रम में दिखलाये हैं।
४-५ जो शब्द संस्कृत तथा प्राकृत में समान है उन्हें दिखलाते हैं—
'कमलामल' इत्यादि से। प्राकृत में विभक्तियों में लिङ्गगत स्वातन्त्र होता है
अतः संस्कृत प्राकृत में ( परस्पर ) भेद रहना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा
कि—'संस्कृतेष्वपि' अर्थात् संस्कृत भाषा भी योग को प्राप्त करती है।

५०० नाट्यशास्त्र
भाषा-श्लेष तथा पताका-स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं। यहाँ अपि
शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास होने पर
उन शब्दों में संस्कृत की समानता नहीं होती जैसे कमल, अमल, इन्द्र
इत्यादि में ।
६-७. अब विभ्रष्ट को—‘ये वर्णः’ इत्यादि से दिखलाते हैं तथा पुनः
इसी को आगे—‘एओआर’ इत्यादि कारिका से भी दिखलाते हैं ।
१७. अपरस्पर निष्पन्नाः = एक दूसरे से संश्लिष्ट नहीं होने वाले अर्थात्
असंयोग वाले या असंयोगरूप वर्ण । अब जहाँ वर्ण संयुक्त हैं उनके विषय में
( संयुक्तानाम् ) भी ।
१८. संयुक्त वर्णों के क्रमशः उदाहरण देते हैं—‘ऋप्सत्सथ्याः’ इत्यादि
से । ‘वच्छों’ में वत्स के त्स को छ हो जाता है ।
२२-२३. ब्रह्मा शब्द में म प्रथम और ह बाद में आ गया तथा ‘ब्र’ का
अन्तर्वर्ती रेफ का लोप हो गया है । इसी प्रकार रेफ का सर्वत्र लोप हो
जाता है वह चाहे ऊपर हो या नीचे—जैसे शक्र तथा अर्क में या कभी दोनों
में जैसे ‘निह्रदि’ शब्द में है ।
२५-२७. संस्कृत एवं प्राकृत भाषा ही वक्तृभेद से चार प्रकार की हो ,
जाती है—इसको दिखलाते हैं—‘भाषा’ इत्यादि से । संस्कृतभाषा ही संस्कृत
है । इसमें स्वरभेद आदि समस्त संस्कार प्राप्त होने से यह ‘संस्कृत’ कहलाती
है । भाषाओं के भेद में इसे बतलाने का आशय यही है कि यह भाषा वह है
जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है परन्तु जो आर्यभाषा से विलक्षण है । •
२८-२६. ‘म्लेच्छशब्दोपचारा’ में उपचार पद का अर्थ है व्यवहार ।
पशुपक्षी आदि के शब्दों को भी नाट्य में किसी प्रयोग के अवसर पर सुनाना
संभावित है । एतदर्थ कहते हैं—‘नाट्यधर्मी’ इत्यादि से ।
३२. कारणव्यपदेशेन = अर्थात् किसी कारण के बहाने से या अवस्था आदि
के वश होकर ।
३२. ऐश्वर्येण प्रमत्त पद के द्वारा यहाँ वेदशास्त्रादि के अध्ययन से हीन
हो जाने की स्थिति संकेतित की गयी है ।
५६-६०. गङ्गासागरमध्य—पद से पूर्व दिशा के देशों के निवासी जन
को दिखलाया गया है । विन्ध्यसागरपद से दक्षिण सौराष्ट्र का ग्रहण किया
गया है । सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु से पश्चिम सौराष्ट्र तथा वेत्रवती ( बेतवा )
नदी से उत्तरवर्त्ती प्रदेश में स्थित प्रदेश को यहाँ लिया जाता है ।

एकोनविंश अध्याय
( सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जन )
१. वाक्यविधानं तु—यहाँ 'वाक्यविधानं' पद से भाषा को लिया
जाता है क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है तथा वाक्य का प्रयोग किसी
संवाद के ही लिये नाट्य में किया जाता है। इस प्रकार वाक्य तथा भाषा में
अन्योन्य-रूपता का आनयन किया जाता है तथा इसी आशय से वाक्यग्रहण
पद विधान भी हो जाता है।
३. देवानां देवाः—अर्थात् जो देवताओं से स्तुत्य हैं या उनके भी आदर-
पात्र हैं। तथा-पद से यदि स्त्री हो तो उन्हें 'भगवती' पद से सम्बोधित करना
चाहिए।
४-६. नानाश्रुतधराः अर्थात् जो बहुश्रुत हैं। क्षाम्यम् = इस कथन को
स्वीकार किया जाए।
७-८. सचिव = मन्त्री, राजा का सहायक एवं परामर्शदाता। सपरि-
वारम् = आशय यही है कि हीन पात्र जब राजा को सम्बोधित करें तो
अपना नाम लेकर करें तथा उत्तमपात्र सम्बोध्य का भी नाम लेवे।
१३. कर्म अर्थात् कार्य जैसे पाकादि का विज्ञाता या व्यवसायी। विद्या =
त्रयी आदि वेदविद्या। जाति = गोत्र अथवा देश।
१५. शाक्य = बौद्धभिक्षु। निर्ग्रन्थ = क्षपणक। पाषण्ड = पाशुपत सम्प्रदाय
के साधु। स्वसमय = जैसे पाशुपतों के अपने आचारानुसार भासर्वज्ञ इत्यादि
पद से किये गये सम्बोधन।
१६. यौवन में पति को स्त्रियाँ आर्यपुत्र कह कर सम्भाषण करें परन्तु
यौवन से भिन्न दशा में श्वसुर के वंश या उसमें अपत्यप्रत्यय के साथ ही
शब्दप्रयोग किया जाए। जैसे—हे महाराज। यहाँ यौवनपद का आशय है कि
शृङ्गार के उपयुक्त स्थिति में ही।
२२. स्थानीया = पूज्य तथा अवस्था में जो थोड़ी भी बड़ी हों, ऐसी
पारिवारिक स्त्रियाँ।
२६. पत्नी को भार्या शब्द से सम्बोधित करे। इसी कारण नाट्यवेद के
महासत्र में दीक्षित सूत्रधार अपनी नटी पत्नी को 'आर्ये' कह कर बुलाता

५०२ नाट्यशास्त्र
भी है या पिता के नाम से भी—'जैसे 'हे माठरपुत्रि; इत्यादि, या पुत्र के
नाम से भी—जैसे—'हे सोमशर्मजननि इत्यादि ।
२६. पुरोहित आदि उत्तम पात्र भी राजा की तरह भार्या को 'आर्ये'
पद से सम्बोधित करें, परन्तु यौवनावस्था में ।
३०. औत्पत्तिकानि = स्वकल्पित अतएव जो अप्रख्यात है । तल्लिङ्गा-
र्थानि = प्रकृत अर्थ की सूचना करने वाले ।
३१. इसी को निदर्शन के द्वारा स्पष्ट करते हैं—'ब्रह्मक्षत्रस्य' इत्यादि से ।
प्रश्न—नाम तो संज्ञा मात्र होता है उसे जैसा चाहे रख सकते हैं । उत्तर—
नाम के अनुरूप कर्म होना चाहिए अतः नाम रखते समय कर्म का भी ध्यान
रखना चाहिए । नाम का अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र
के अनुसार अनुष्ठित कर्मादि के द्वारा होता है अतः जब पीड़ित हो जाते हैं
तो उनका इन्हीं से शान्तिक या पौष्टिक कर्म द्वारा उपचार भी किया जाता
है तथा पुरुष को फल प्राप्ति भी अपने नाम के अनुरूप ही होती है ।
३७. नट स्वयं कवि भी होता है तथा कवित्व युक्त भी । इसी अभिप्राय
को ध्यान में रख कर भाषाविधान को समझकर पाठ्य के प्रयोग का विधान
बतलाया गया है अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण हो तथा अवसर
आने पर पाठ्य का प्रयोग भी रहे । यदि अन्य कवि हो तो पाठ्य की संज्ञा
प्रयोग का मूलभूत तत्त्व हो जाता है। अतः तदनुसार ही प्रयोक्ताओं को
इसका व्यवहार समझ कर करना चाहिए । षडलङ्कार हैं—( १ ) स्वर,
( २ ) स्थान, ( ३ ) वर्ण, ( ४ ) काकु, ( ५ ) अलंकार तथा ( ६ ) अङ्ग ।
इनसे भूषित काव्य ही पाठ्य कहलाता है ।
पाठ्य स्वर आदि छः अलंकारों के अधीन होता है अतः पाठ्य के गुणों
को बतलाने की बात कही गयी है । गुण अर्थात् जो उपकारक है तथा जिनसे
काव्य उपकृत होकर पाठ्य होता है ।
अब गुणों का उद्देशक्रम से व्याख्यान करते हैं—'तत्र' इत्यादि से । इनमें
प्रथम स्वर है जिसके विषय में जो भी वक्तव्य है वह आगे गेयाधिकार प्रकरण
में ( ना० शा० अध्याय २८ में ) दिखलाया जाएगा । स्वर ही काकु में भी
उपयोगी होता है तथा स्थानादि उसके 'परिकर होते हैं। यहाँ स्थान शब्द
के द्वारा काकुओं के अपने रूप की निष्पत्ति हेतु आश्रय दिखलाया गया है ।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित नाम से शास्त्र में स्वर प्रसिद्ध हैं,

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०३
इनमें जो अनुरणनमय रक्ति या अनुरंजना की प्रक्रिया है उसे छोड़ देना चाहिए
( क्योंकि वह गीत में रहेगी ) । इसे छोड़ कर शेष जो केवल उच्च, नीच तथा
मध्यवर्ती स्थान का स्पर्श होता है वही पाठ्य में उपयोगी है। यदि पाठ्य में
स्वरगत रक्ति का प्रधानतः आश्रय लेगें तो फिर यह गानक्रिया होगी पाठ्य
नहीं। यहाँ गान क्रिया में उच्च आदि स्थानों का स्पर्श ही प्रधान है इसी
बात को प्रकृत में वर्णों का उपादान कर बतलाया गया है ।
॰ चित्तवृत्ति के समर्पण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभावरूपता के लाभ के
लिये रसों के भेद से काकुविधान रखा जाता है। इसी कारण काकुओं का
सर्वत्र अनुगत रूप होता है जिसका स्वर की अतिशयिता में उपयोग ( किया
जाता ) है। इसका आगे भी मुनि ने काकुशब्द के द्वारा उच्च, दीप्त आदि
अलङ्कारों में व्यवहार बतलाया है क्योंकि पूर्णता को प्राप्त अलङ्कार आदि
काकुओं के ही उपकारक या सम्पादक होंगे। क्योंकि काकु अर्थों में अभि-
नेयता लाता है अतः काकु ही प्रधान होता है। अन्यथा यदि काकु प्रधान
नहीं होता तो जिसका अंगों के मध्य पाठ किया गया उस मध्यगत अंग का
उपसंहार और अन्य अंगों का निरूपण आदि सभी असमञ्जस हो जाता । इस
कारण प्रकृत में पाठ्य में काकु ही प्रधान होता है यही सिद्धान्त मान्य है।
अब इन स्वरों के आश्रम को दिखलाते हैं—त्रीणि स्थानानि के द्वारा ।
यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्वर किसी स्थान विशेष से ही उद्भूत होते हैं अतः स्वर
ग्रहण से ही स्थान भेद प्राप्त हो जाएगा पुनः स्थान का ग्रहण क्यों किया गया ?
इसका उत्तर यही है कि यहाँ स्थानपद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों की
निवृत्ति करने के लिये है। ये छाछठ ( ६६ ) प्रकार किस प्रकार ?—उत्तर—
उरः प्रदेश में २२—जहाँ श्रुतियाँ तथा स्वर हैं। इसी प्रकार कण्ठ तथा मूर्धा
में होकर ये छाछठ ( २२ × ३ = ६६ ) हो जाते हैं। इन स्थानों के स्पर्श होने
पर गान ही होता है पाठ्य नहीं। इसीलिये पाठ्यगुणान् पद में पाठ्य को गुण
अर्थात् उपकरण वाचक मान कर व्याख्यान किया जाता है।
“शारीर्यामथ वीणायाम्” इत्यादि। वीणा दो प्रकार की होती है जिनमें
एक शरीर रूपी वीणा है जिसमें उरः, शिर तथा कण्ठ स्थान हैं। यह वीणा
बिम्ब स्थानीय होती है। दूसरी वीणा तुम्बी घटिता है। दण्डरूपा वीणा बाह्य
वीणा है तथा यह प्रतिबिम्ब स्थानीया है। इस बाह्य वीणा में काकु की सम्पत्ति
विद्यमान होती है जो रंजनात्मक स्वर स्वरूप है। शारीरी के साथ वीणा
शब्द के कहने का आशय यही है कि यह शरीर के मध्य में विवृत हृदयाकाश

के परिग्रहण हेतु है। क्योंकि बिना आकाश के शरीर मात्र में स्वर की निष्पत्ति
नहीं हो सकती, वह यदि होगी तो उस आकाश में ही होगी।
दूसरी जो दण्ड वीणा (तुम्बी घटिता) हैं, वह उत्तरोत्तर चिह्नित स्थान
से विशिष्ट रहकर बाह्य वीणा कहलाती है तथा इसमें भी स्वरों के निष्पत्ति
स्थान होते हैं। शारीरी वीणा में, उरः, कण्ठ तथा शिरः ये तीन स्थान (नियत)
हैं। इसी प्रकार बाह्य वीणा में भी तारों के स्थान बने हैं, वे इसमें सोपान
पंक्ति की तरह क्रमिक हैं। अतएव इनसे काकुस्वर लक्षित होता है तथा इसी
के आधार पर इसका लक्षण हुआ है। काकु जिह्वा के व्यापार से सम्पाद्य
होने से यह 'काकु' कहलाती है।
४१. इस प्रकार इन तीनों स्थानों के रूपों का विभाग कर उनका विषयभेद
दिखलाने के लिये बतलाते हैं—'आभाषणञ्च' इत्यादि के द्वारा। शिरसा =
शिरो निष्पन्न तार से। इसका उपयोग दूरस्थ संभाषण में किया जाता है।
कण्ठेन = मध्यनाद से। इसका उपयोग नातिदूर स्थल के सम्भाषण में होता
है। उरसा = मन्द्र नाद से। इसका उपयोग समीप के सम्भाषण में किया
जाता है।
४२-४३. इस प्रकार इन तीन स्थानों का पृथक् २ उपयोग दिखला कर
अब इन्हीं का एक साथ उपयोग भी दिखलाते हैं—'उरसोदाहृतम्' इत्यादि के
द्वारा। इसका आशय यही है कि पाठ्य का आरम्भ मन्द्र स्वर से करते हुए उसे
तार स्वर तक ले जाकर फिर मन्द्र पर समाप्त कर देना चाहिए। जब न तो
दीप्त रूप क्रोधादि भाव से और न मन्द्र शोकादि से हृदय आविष्ट रहे तो
वक्तव्य वस्तु के विषय गत उत्साह के विस्फारण (व्यक्ति) से स्वर को तार
तक ले जाकर उपसंहार के समय मध्य में विश्राम करे, यही सामान्यतः पाठ्य
का धर्म या विधान होता है।
४३. स्थान भेद को दिखला कर अब वर्णों के स्वरूप को दिखलाते हैं—
'उदात्तश्च' इत्यादि से। उच्च, नीच तथा मध्यम एवं उच्च, नीच रूप अवलम्बन
से स्वरों के चार धर्म हो जाते हैं। पाठ विशेष की क्रिया का विस्तार करने
वाले वर्ण 'गुण' होते हैं अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले
वर्ण 'गुण' हैं। यहाँ तपोधनाः (कहने) सम्बोधन का आशय यह है कि आप
सूक्ष्मवेदी है अतः इस विषय के विचार के अधिकारी हैं।
अब गद्य भाग द्वारा वर्णों के विषय दिखलाते हैं—'हास्यशृङ्गारयोः'
इत्यादि से। हास्य तथा शृङ्गाररस में मध्यम तथा पञ्चम इत्यादि रूप में जिस