सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 598

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८७
[ वीरजन के लिये उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने अपने
उद्बोधन से सत्यपथ पर पहुँचा दिया वह पहुँचाने वाला तो कृष्ण ( काला )
और पहुँचने वाला अर्जुन (शुक्ल) है ऐसी यह सभी प्रसिद्धि वितथ ( मिथ्या )
ही समझना चाहिए । ]
यहाँ कृष्ण तथा अर्जुन के नामों से परस्पर अन्यत्र स्थल में सत्यता तथा
अपने विषय में उनमें असत्यता है। यहाँ अर्थश्लेष नहीं हो सकता क्योंकि
वह तुल्यसंख्या के पदार्थ में रहता है जब कि यहाँ एक का दूसरे में संकेत
किया गया है। अर्थात् जो मूढ़ हो उसे कृष्ण ( या काला ) होना चाहिए
किन्तु यहाँ वह अर्जुन है तथा जिसने सत्पथ पर पहुँचाया उसे अर्जुन होना
चाहिए किन्तु वह कृष्ण है। इस प्रकार एक ही में दोनों का व्यवहार हो रहा
है ( यह तथ्य और अतथ्यभूत 'निरुक्त' है ) ।
१३. गुणानुवाद :—गुणों का अनुवाद अर्थात् अनुकथन करना । परिमित
या परिच्छिन्न वस्तु की आपादित या कल्पित उत्कृष्ट गुण से उपमा के द्वारा
जो गुणों का उत्सेक हो वही 'गुणानुवाद' । जैसे:—
'पालिता द्यौरिवेन्द्रेण त्वया राजन् वसुन्धरा ।'
[ हे राजन्, जैसे इन्द्र ने स्वर्ग का पालन किया था वैसा ही आपने
इस पृथ्वी का पालन किया ] यहाँ एक पृथ्वी पर स्थित मनुष्य राजा की
इन्द्र से तुलना कर उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया गया है ।
अतिशय :—उत्तम अर्थ अर्थात् कहे गये अर्थ से जो विशेष अर्थ है । जैसे
भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
यावन्त्येव पदान्यलीकपिशुनैरालीजनेः शिक्षिता
तावन्त्येव कृतागसो दुततरं व्याहृत्य पत्युः पुरः ।
प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा वर्तितुं
प्रेम्णो मौग्ध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः ॥
[ उस मुग्धा को झूठी चुगली लगाने नाली उसकी सखियों ने जितने अक्षर
( या वाक्य ) सिखलाये उतने ही अक्षरों को उसने ( अविवेकवश ) अपने
अपराधी पति के सम्मुख वैसे ही कह दिया तथा फिर काम की भावना के
अनुरूप रति भी की । यह तो भोलेपन से अधिक सुन्दर बन पड़ने वाले प्रेम
का एक विलक्षण एवं सहज सुन्दर ( एवं अतिरिक्त ) प्रक्रम हो गया । ]
यहाँ पर प्रेम में ईर्ष्यात्मा अर्थ जो हो सकता है उससे विशेष बात कही
गयी है तथा प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भी सुन्दरता से देखने योग्य