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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 602, कुल 668 में से

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पृष्ठ 602

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९१
में सीधे न कह कर अरोचक एवं रोचक सुख के उपन्यास से दोनों प्रकार के
तत्त्वों को बतलाते हुए निशाकर के वृत्तान्त की समानता से अपने अभिप्राय
को प्रकट करती है अतः 'आक्रन्द' है। यहाँ प्रथमार्ध से पर सादृश्य तथा
उत्तरार्ध द्वारा अप्रत्यक्ष भाव की ज्ञापना या संकेत भी दिया गया है।
२०. मनोरथ :—अव मनोरथ को 'हृदयस्थस्य' इत्यादि से कहते हैं ।
जैसे :—णिग्गंध-दुरारोहिं पुत्तअ मा पाडलिं समारूढ ।
आरूढणिपडिआ के इमिए ण कआ इह ग्गामे ॥
[ निर्गन्धदुरारोहां पुत्रक पाटलिं मा समारोह ।
आरूढनिपतिताः के नया न कृता इह ग्रामे ॥—छाया ]
[ नासमझ बेटे, गन्धशून्य एवं कण्टकाकीर्ण रहने से आरोहण के अनुप-
युक्त इस पाटली पर तुम आरोहण मत करो, क्योंकि इस ग्राम में इसने किसे
ऊपर नहीं उठाया और फिर नीचे गिराया है । ]
यहाँ वृक्ष पर आरोहण करने के व्याज से किसी पुंश्चली के इच्छुक व्यक्ति
को कोई वृद्धा अपने अभिप्राय को दिखला कर समझा रही है। यह अन्य को
कह कर उसके अन्तर्गत ( अर्थात् अन्यापदेश में रहने से ) प्रस्तुत ही है
अतः यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा है ही, परन्तु यह लक्षणीय रहने से 'लक्षण' ही हैं;
क्योंकि अलङ्कार में अलङ्कार्यत्व असत् है यह कोई युक्ति नहीं हो सकती ।
२१. आख्यान :—अब आख्यान को—'अपृष्टै' इत्यादि से कहते हैं ।
जहाँ प्रश्नों के द्वारा अनेक पदार्थों का निश्चय होता है। जैसे—'बाले नाथ
विमुञ्च मानिनि रुषं' इत्यादि ( अम० शत० ) पद्य की उक्ति प्रत्युक्तियों
में। या फिर बिना ही प्रश्न किये प्रश्न जैसे वाक्यों से शक्य या अशक्य
वस्तुओं के कथन से जहाँ निश्चय हो ऐसे प्रदेश में जैसे 'रामोऽसौ भुवनेषु
विक्रमगुणैः' इत्यादि पद्य में है। यह नाटकाश्रय लक्षण होता है अतः बार-
वार प्रयोग के योग्य होता है, यह दिखलाया गया है ।
२२. याच्ञा :—अव याच्ञा को 'आदौ यत्' इत्यादि से कहते है । इसमें
प्रथमार्ध से हित या इष्ट को दिखलाया ( गया ) है, जिससे यह आशय
प्रकट होता है कि प्रथम अर्थात् आपाततः वह परुष होता है किन्तु परिणाम
में वही वस्तु सम्यक् फल वाली हो जाती है, अतः प्रिय है तथा हितावह होने
से भी प्रिय है ऐसी समझाने की बुद्धि से याच्ञा करना ही 'याच्ञा' है। जैसे
आचार्य अभिनवगुप्त के निम्न पद्य में :—