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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 668 में से

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पृष्ठ 600

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८९
है अतः यहाँ 'सारूप्य' लक्षण है। यहाँ उपमालङ्कार नहीं है क्योंकि उपमेय
शब्दोपात्त नहीं है पर पूर्वार्ध से उपमेय को सूचित किया जाना अवश्य
मिलता है।
१६. मिथ्याध्यवसाय :-अब मिथ्याध्यवसाय को कहते हैं- अभूतपूर्वैः
इत्यादि से। वास्तविकता से रहित अर्थों के द्वारा तत्तुल्य अवस्तुभूत अर्थान्तर
का वक्ता के व्यापार या बोलने पर निश्चय होना 'मिथ्याध्यवसाय' है। जैसा
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :-
यो दुर्जनाद्वाञ्छितसिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम् ।
जुह्वज्ज्वलाग्नौ विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत् ॥
[ जो दुर्जन से वाञ्छित अर्थ की सिद्धि चाहता है वह अवश्य ही
उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और जलती अग्नि में हवन करते
हुए हठात् ही अर्थ या प्रयोजन रूप षष्ठ विषय को सिद्ध करने का उद्योग
करता है। ]
यहाँ छठी इन्द्रिय के अभाव में उसके विषय की जैसे कोई स्थिति नहीं
उसी प्रकार दुर्जन से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती। यह काव्यलक्षण
है ऐसा कहने का आशय यही है कि काव्य में लोक का विपर्यास थोड़ा या
अधिक होता ( ही ) है। इसे अन्य पाठ में 'विपर्यय' बतलाया गया है।
१७. सिद्धि :- अब सिद्धि बतलाते हैं- 'बहूनाम्' इत्यादि से। अनेक
प्रसिद्ध पदार्थों में से किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं। यह उस अप्रसिद्ध
की असाधारण सम्पत्ति के लिये कहा जाता है। अतएव उसमें जिसका निवेश
कर वैसा कहते है यह सिद्धि का हेतु होने से 'सिद्धि' कहा गया है।
जैसे :-
भद्रेश्वरः सुरसरित् स भवानहञ्च त्रैलोक्यसारमिह सम्प्रति जीवलोके ।
भद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्थिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु ॥
यहाँ आप और मैं-इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के बीच में उपादान-
असाधारण्य को दिखला कर 'सिद्धि' का विधान करता है।
१८. पदोच्चय :-अब पदोच्चय को 'गुणैर्बहुभि.' से कहते हैं। एक
तात्पर्य के विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक शब्दों के वाच्यरूप में स्वीकृत जो
धर्म हैं उनका उपलक्षण कर जो वस्तु का प्रसंशन है वह पदोच्चय। क्योंकि
अर्थों की उपलब्धि काव्य में स्थित पदों से ही होती है। अतः इन पदों का
उच्चय अर्थात् बाहुल्य जहाँ हो वह 'पदोच्चय' है।