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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४८६ नाट्यशास्त्र
बतलाते हैं। औपम्य का अर्थात् उपमा का जहाँ संश्रय अर्थात् यत्नपूर्वक
अन्वेषण हो ऐसे। जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
हरवृषभ तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसूतिरेका।
निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ॥
[ हे नन्दीश्वर, संसार में एक मात्र असदृश एवं तुम्हारे सदृश जन को
प्रसव करनेवाली तुम्हारे जैसी ही माता की जय हो। जिसका अन्वेषण कर
परमेश शिव भी अपने पुत्रों एवं गणों को साथ लेकर अपनी सहधर्मिणी के
साथ प्रसन्नता से निवास कर रहे हैं । ]
यद्यपि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी है तथापि वैचित्र्य यहाँ लक्षण
का ही है। इसे ही अन्यत्र पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति कहा गया है।
११. उदाहरण :—अब उदाहरण को—‘यत्रैकस्यापि’ इत्यादि से
कहते हैं।
जैसे :—वल्मीकात् किमुतोद्धृतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं
त्रैलोक्यं तपसा जितं यदि सखे दोष्णा किमेतावता ।
सवं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत्
त्वद्दन्ताङ्कितवालि-कक्षरुधिरक्लिन्नाग्रपुङ्खं शरम् ॥
[ यह वल्मीक से उखाड़ा हुआ पर्वत है यह बात किस के मन को स्पर्श
करेगी अर्थात् इसे कौन स्वीकार कर सकेगा। परन्तु हे मित्र, तुमने तप के
द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर त्रैलोक्य को जीता तो इससे क्या हो गया।
हाँ, ये सभी तभी साधु या ठीक होगी जब तुम विरह से क्षीणगात्र वाले
श्रीराम के उस शर को सह सको जिसके पुंख का अग्रभाग तुम्हारे दांतों
के घाव से अङ्कित बालि की कोख के रुधिर से आर्द्र हो गया है । ]
यहाँ बालि के कक्ष के रावण के द्वारा काटने पर उसकी प्रतीकार करने
की असमर्थता को दिखला कर फिर भी घमण्ड रखने की उसी की स्वकीय
प्रकृति का ध्वनन होता है। यहाँ तुम्हारे दांतों से इस रूप में उसके धिक्कार
का कथन करने से ‘उदाहरण’ है।
१२. निरुक्त :—निरुक्त दो प्रकार का होता है। एक सिद्धि अर्थात् जिसे
लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाए वह तथ्य तथा जो लक्षण से सिद्ध
न हो वह अतथ्य। इसका उदाहरण अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
वीरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत् सत्यपथं कथञ्चित् ।
स चार्जुनः सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा ॥