नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८५
७. अभिमान :—'धार्यमाणस्तु' इत्यादि से 'अभिमान' बतलाते हैं ।
जैसे :—शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं
सम्प्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससन्धुक्षिताः ।
किं प्राणान् न हरन्त्युत प्रियतमा-संजल्पमन्त्राक्षरैः
वार्यन्ते किमु यद्विमोहविवशात् सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥
[ यदि चन्द्र की किरणें अमृतमयी हैं तो फिर ये मेरे मन को अतिशय
क्यों सन्तप्त कर रही हैं। यदि कहें कि ये किरणें कालकूट विष के साथ वास
करने से विषाक्त हो गयी है तो फिर ये प्राणों का हरण क्यों नहीं करतीं । ये
प्राणों को हर लेती पर प्रिया के संभाषण रूप मन्त्राक्षरों से इस विष के प्रभाव
को निवारण कर दिया गया है और जब ऐसा हो तो फिर से विष के प्रभाव
से जन्य मोह के कारण सन्तापमयी स्थिति क्यों बना रहीं हैं । ]
यहाँ एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ की योजना ( घटना ) इस प्रकार रखी
गई है जिसमें फल की योजनाओं से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में
अवस्थित नहीं हो पाता है वहीं पर बँध जाता है । इस प्रकार अर्थ अलौकिक
होने से विलक्षण एवं उपेय है । अतः यह अभिभान नामक लक्षण है ।
६. गुणकीर्तन :—अब गुणकीर्तन का स्वरूप—'कीर्त्यमानै' इत्यादि से
दिखलाते हैं । जैसे:—
पृथुरसि गुणैः मूर्त्या रामो नलो भरतो भवान्
महति समरे शत्रुघ्नस्त्वं तथा जनकः स्थितौ ।
इति सुचरितैर्मूत्तिं बिभ्रच्चिरन्तनभूपतां
कथमसि न मान्धाता देवस्त्रिलोकविजय्यपि ॥
[ हे राजन् , आप गुणों से पृथु या विशाल गुणशाली हैं, मूर्ति या आकार
से आप श्रीराम, नल तथा भरत हैं, युद्ध में शत्रुओं के संहर्ता शत्रुघ्न हैं तथा
पालन करने में आप जनक हैं । इस प्रकार उत्तम चरित्रों में चिरन्तन राजगण
के स्वरूप को धारण करते हुए भी आप त्रिलोकजयी मान्धाता क्यों नहीं
( अर्थात् मुझे पालित करने वाले ) हो रहे हैं । ( अवश्य होंगें ) ]
यहाँ गुणों के उल्लेख द्वारा प्रकृत की चारुता से 'गुणकीर्तन' नामक
लक्षण है । यहाँ यद्यपि श्लेष भी अनुग्राहक के रूप में उपस्थित है परन्तु
लक्षण अलङ्कारों में भी वैचित्र्याधायक होता है ( अतः प्रमुख यहाँ लक्षण
( ही ) है । )
१०. प्रोत्साहन :—अब 'प्रोत्साहन' को—'उत्साहजननै' इत्यादि से