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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४८८ नाट्यशास्त्र
रखा गया है अतः यहाँ 'अतिशय' है, क्योंकि यहाँ अर्थ सम्भाव्यमान है अतः
यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार नहीं है ।
१४. हेतु :—अब हेतु या सहेतु को बतलाते हैं—'बहूनाम्' इत्यादि
के द्वारा । अनेक बोलने वालों का अनादर कर किसी एक असाधारण अर्थ
के निर्णय का कर्तव्य रूप में अवलम्बन कर सिद्ध प्रमाणभूत उपमान का
प्रक्षेप या कथन हो (अर्थात् मुझे ऐसा प्रतिभात होता है )—तो उसे 'हेतु'
समझना चाहिए । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
एके वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं
केचित् पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेऽह्नि चन्द्राचिषाम् ।
मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि प्रत्यक्षतीव्रातपो
मन्येऽहं पुनरध्वनीन-रमणीचेतोऽधिशेते रविः ॥
[ दिन के क्षीण होने पर कुछ कहते हैं कि चन्द्र की किरणों का जलनिधि
में प्रवेश हो जाता है, अन्य कहते हैं कि इसका अग्नि ( में प्रवेश या )
योग होता है किन्तु हे सखि, ये सभी बाते मिथ्या हैं, क्योंकि इनका साक्षी
कोई नहीं है । परन्तु प्रत्यक्ष में जो इसका तीव्र आतप अनुभव किया जा रहा
है उससे मैं तो यह मानती हूँ कि यह पथिक विरहियों के विरह से जलने
वाली विरहिणियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है, चन्द्र नहीं ] ।
यहाँ असाधारण अर्थ का कथन होने से 'हेतु' है ।
१५. सारूप्य :—अनुकरण से उत्पन्न होने से अपदेश जहाँ परोक्ष है तो
'सारूप्य' ।
इसका उदाहरण आचार्य अभिनवगुप्त पाद का यह पद्यः—
सैन्दूरीकृतसान्द्रकुङ्कुमरसप्रच्छायमालोच्यते
यत् प्राच्यां दिशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्द्वन्द्वलेह्यं महः ।
तत्तेजो जरठांशुतां कलयता भाविप्रवासावधि
सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कीर्णो नखाग्राङ्कुरः ॥
[ जो पूर्व दिशा में टेढ़ा तथा दोनों नेत्रों से देखने योग्य सिन्दूर से गाढ़े
कुङ्कुम रस सदृश यह दिखलाई दे रहा है । यह उस तेज की जरठांशुता को
प्रवास की भावी अवधि की सूचना देनेवाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू
के कपोल पर अङ्कित अभिनव नखाग्राङ्कुर है । ]
यहाँ यत् पद से निर्देश्य जो वस्तु है वह परोक्ष है क्योंकि यहाँ तत्त्व का
पूर्ण परिज्ञान नहीं है । आलोच्यते से उसकी छाया मात्र अपदेश्य है । यहाँ
सैन्दूरीकृत इत्यादि से जिसकी दर्शन क्रिया बतलाई वह प्रमाण सहित वस्तु