नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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जैसे—असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं
निरालोकं लोकं जननयननिर्माणमफलम् ।
अदर्पं कन्दर्पं मरणशरणं बान्धवजनं
जगज्जीर्णारण्यं कथमसि विधातुं व्यवसितः । ( मालतीमाधवे । )
[ संसार को असार, त्रैलोक्य को रत्नरहित, संसार को प्रकाश हीन,
लोकनेत्रों के निर्माणभूत सौंदर्य को निष्फल, काम को दर्प से विकल,
बान्धवों को मरण की शरण लेने वाले तथा जगत् को जीर्ण अरण्य बनाने के
लिये ऐसा व्यवसाय क्यों कर रहे हो ( कि तुम मालती को मेरे ही सम्मुख
समाप्त करना चाहते हो ) ]
यहाँ अवन्तर अर्थों के बोधक अवान्तर वाक्य रूप पदों का तात्पर्य एक ही
है, किन्तु उन पदों का अपना वाच्यार्थ भिन्न-भिन्न है । यहाँ पदोच्चय पद में
पद का अर्थ है पाद या भाग । अन्य आचार्यों के मत में पूर्व से या आरम्भ
से जो अर्थ चलता हो उसी अर्थ का अन्त तक चलना एकार्थ तात्पर्यक होता है
अतः 'पदोच्चय' है ।
१६. आक्रन्द :—अब आक्रन्द को 'आत्मभावम्' इत्यादि से कहते हैं ।
यहाँ एक अर्थ कटु या कठोर रहने से साक्षात् या सीधे नहीं कहा जाता है
इसीलिये ऐसे अर्थ को सादृश्य के द्वारा आरम्भ में रख कर आगे स्फुट कर
प्रतिपाद्य भाव को प्रधानता से रखते हैं, अतः यह 'आक्रन्द' है । जैसे आचार्य
अभिनवगुप्त का यह पद्य :—
किं पान्थ त्वरसे विलोकय निशां या ह्युन्मुखी पाण्डुरा
चन्द्रं चुम्बितुमीहते प्रकटयन्त्यग्रे सरागां स्थितिम् ।
यद्वा नागर-भोगदुर्ललितकैन्र्यंस्तापि न ज्ञायते
ग्रामेऽग्राम्यजनोपभोगसुभगं निर्व्याज रम्यं सुखम् ॥
[—अरे पथिक, तुम क्यों इतनी शीघ्रता कर रहे हो, जरा इस रात्रि
को तो देखो जो उन्मुखी अर्थात् अपने प्रिय की प्रतीक्षा में ऊपर मुंह किये हुए
तथा विरह से पाण्डुर (पीली) हो गयी है तथा जो आरम्भ में ही अपनी राग-
मयी ऐसी स्थिति को दिखला रही है या फिर नागरिक पदार्थों के भोग
दुलारों से उपेक्षित कर दी गयी है जिसे वह नहीं जानती परन्तु यह समझ
रखिये कि इस ग्राम में भी नागरजन के उपभोग की सुभग, निश्छल एवं
रमणीय सुख की स्थिति बन सकती है । ]
यहाँ उत्तरार्ध में संकेतित ग्रामीण भोग को नायिका स्वाभिप्राय के रूप