नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
४७८ नाट्यशास्त्र
५६-५७ दीपक :-अब 'नानाधिकरणानाम्' इत्यादि से 'दीपक'
अलङ्कार बतलाते हैं। नाना जो वाक्यरूप या पदरूप भिन्न-भिन्न शब्द हैं
उनके अधिकरण में अर्थात् जिनकी वे साकांक्ष शब्द तथा उनका सम्यक् जो
दीपक है अर्थात् आकांक्षापूरक गुण या जात्यादि जहाँ हो वह दीपक है।
क्योंकि एक अवान्तर वाक्य के द्वारा असंयुक्त वाक्य भी संयुक्त की
तरह कर दिया जाता है अतः देहली में जलाया हुआ दीपक जैसे बाहर
और अन्दर प्रकाश करता है वैसा ही दीपक प्रकृति होने से यह 'दीपक'
अलङ्कार है।
५८. रूपक- अब रूपक अलङ्कार को बतलाते हैं 'स्वविकल्पेन' इत्यादि
से। अपने विकल्प अर्थात् विशिष्ट कल्पना से वदन को चन्द्र रूप में रूपित करना
अर्थात् दूसरे को अपने रूप से युक्त करना ही 'रूपक' है। यह दो प्रकार से
होता है। एक वह—जहाँ तुल्य अवयव वाले अवयवियों को अन्य के रूप से
युक्त करना तथा दूसरा किञ्चित् सादृश्य से युक्त रूप वाले बनाना। यहाँ
कुछ एक दूसरे के रूप के सदृश रूप से युक्त अर्थात् रूपान्तर के द्वारा रूपित
करना होता है तथा ऐसे स्थल पर एकदेशविवर्ति नामक द्रव्यादि रूपक
हो जाता है यह प्रसिद्ध है।
अन्य 'नानाद्रव्यादि' के अनुसार रूपक का पाठ लेते हैं। तदनुसार यह
रूपक शब्द के अनुगत अर्थत्व का आख्यान करता है। इसमें औपम्य का गुण
(गौण) रूप से अर्थात् अप्रधान रूप से संश्रयण करता है। इसके कारण
रूप की जो किसी अन्य के रूप से निश्चय पूर्वक वर्णना है वही 'रूपक' है।
५६. यहाँ (पद्माननस्ताः में) "हंसकुलैः" में अरूपित भी नर्मसचिवत्व
व्यक्त होता है। इतना अंश 'यदि वा किञ्चिद्' के अनुसार द्वितीय भेद का
उदाहरण है। यहाँ 'अन्योन्यमिव' पाठ ठीक नहीं है क्योंकि इव घटित
पाठ में उपमा या उत्प्रेक्षा की आशंका होगी अतः 'अन्योन्यमिह' ऐसा पाठ
उपयुक्त है।
६०. यमक :—यहाँ शब्दाभ्यास में शब्द पद से वाक्य, पद, पदैकदेश
तथा वर्ण सभी का ग्रहण होता है। फलतः लाटानुप्रास आदि का भी इसी
से ग्रहण समझ लिया जाना चाहिए। 'यम' उसे कहते हैं जहाँ दो बालक
एक साथ (एक जैसे भी) उत्पन्न हों अतः तत्प्रकृतिक या उसी स्वभाव के
कारण इसे 'यमक' कहा जाता है। यह वाक्य, पद एवं वर्ण के सदृश सान्तर
या निरन्तर (रूप) में प्रयुक्त हुआ द्वितीय वाक्य, पद एवं वर्ण शोभा का
आधायक हो जाने से अलङ्कार बन जाता है। पादादि में विकल्प कहने से
मध्य एवं अन्त में स्थापन का नियम नहीं है अर्थात् इस विकल्प से लाटानुप्रास
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७९
का भी संग्रह कर लिया गया है । विशेष दर्शन का अर्थ है उद्देश्य एवं लक्षणों
का दर्शन ।
६१-६३. अक्षर पद से एक अक्षर तथा अनेक अक्षरों को लिया जाता है ।
६५. संहृत :- संहृत है रश्मियों का मण्डल अर्थात् समुदाय या ओघ
जिसका । तपनीयमण्डल पद का अर्थ है सौवर्णचक्र ।
६७. जनीनाम् = युवतियों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली । रामा पद सभी
स्त्रियों का वाचक है । 'यामं यामं' यहाँ वीप्सा से सभी प्रहरों का ग्रहण किया
गया है । पुष्प खिल रहे हैं और भौंरे उन पर मंडरा रहे हैं जिन्हें देखकर
ये हँसती हैं तथा पुष्पों के खिलने पर भी जब भौंरे नहीं आकर मंडराते तो
विस्मय करती हैं ।
६६. प्रवरक अर्थात् श्रेष्ठ है आनन जिसका ऐसा हाथी । इसी प्रकार
केतकी के पुष्प ही पीले दाँत जिसके हैं ऐसे हस्ति से युक्त प्रवर = श्रेष्ठ कानन
= अरण्य शोभित हो रहा है ।
७१. द्विशृंग = जिसके दो शिखर हों या दो उन्नत दाँतों की विशिष्टता
से युक्त या दाँतों की विकलता या राहित्य से युक्त जिसके शिखर हैं ।
७४. सञ्चिताः = युद्ध में एकत्र हो गये हैं । अनुपुङ्गैः - पुङ्ख तक मग्न
होने वाले । चित = व्याप्त । अन्य प्रकार से अर्थ में जैसे निहतास्तलैः को
यदि निहतों के अस्त मरण को ला प्रदान करते हैं ऐसा हो तो यह क्लिष्ट
कल्पना है ।
८२. यह शरद् ऋतु वारण पुष्पों के विकास का समय है । इसी प्रकार
वारण = हाथियों के अनामय अर्थात् स्वस्थ रहने का यही समय है । वारणों=
शत्रुओं का यह काल = मृत्यु होता है । रणों = युद्धों का कालक्षेप अर्थात्
समय का बिताना या चिन्ता का प्रवर्तक है ।
८६. लक्षणों की प्रमुखता को संकेतित करते हुए उपसंहार करते हैं—
'एभिरर्थे' इत्यादि से । अर्थक्रियायुक्तैः = अर्थ की क्रिया में रस-चर्वणा में
युक्त योग है जिनका ऐसे । यह दोष विवरण कई प्राचीन पुस्तकों के
अध्यायान्त में मिलता है फिर भी यही सर्वत्र मिलने के कारण इसकी
व्याख्या की गयी । अतः परमपद से वक्तव्यान्तर संकेतित किया गया है ।
अतः अब दोष का ही आगे विवरण देगें ।
८७-८८. गूढ़ार्थ आदि ।—"पर्याय" इति । पद, वाक्य या अर्थ को
पर्याय शब्द से कहना 'गूढ़ार्थ' दोष है । वास्तव में यदृच्छा शब्द या द्रव्य
शब्दों को पर्याय वाचक नहीं बनाया जाता अतः दोष है ।
४८० नाट्यशास्त्र
६३. जहाँ दो वर्णों या पदों में नैरन्तर्य है अर्थात् अव्यवधान है, जहाँ
विचार या सम्बन्ध है तथा जहाँ अन्य का अन्य में लय होता है । इस प्रकार
सन्धान या सन्धि तीन प्रकार से होती है । जहाँ शब्द अयुक्त या युक्तिरहित
अथवा पारुष्य का उद्भावक हो जाए तो 'विसन्धि' दोष हो जाएगा । यह
दोष व्याकरणशास्त्र के अनुसार लागू होगा । ये दोष उत्तरोत्तर स्थूल हैं तथा
कभी कभी गुण भी हो जाते हैं । (द्रष्टव्य ना० शा० द्वितीय भाग टिप्पणी
पृ० ३००) ।
६४. अब गुणों के विषय में प्रतिज्ञा करते हैं—'गुणाः विपर्ययाद्'
इत्यादि से । इसका आशय है कि दोषों के विघात में ही गुण होते हैं। यहाँ
यह प्रश्न हो सकता है कि दोषों के विपर्यय में गुण सामान्यतः होते हैं या
विशेष रूप से । इसका उत्तर यही है कि ये विशेष प्रकार से ही होते हैं,
सामान्यतः नहीं। भरत के इस विचार का समर्थन उत्तरवर्ती आचार्यों ने
भी किया जिसका संकेत मात्र नाट्यशास्त्र में था । इस मान्यता का विकास
विपर्यय या दोषों की अनित्यता में हो गया । दोषाभाव होने पर निर्दुष्टः
काव्य सौन्दर्य का आविर्भाव होता है । आगे भोज तथा मम्मट और हेमचन्द्र
जैसे आचार्यों ने दोषहान तथा अदोषता शब्दों से इसी तथ्य को अधिक स्पष्टता
प्रदान की क्योंकि दस दोष दस गुणों के विपर्यय मात्र नहीं होते हैं ।
१०६. काव्यगुणों का लक्षण सहित विवरण भी भरत ने सर्वप्रथम दिया है
परन्तु यह सभी पूर्व लक्ष्य लक्षणादि के आधार पर है यह स्पष्ट है। इस दृष्टि से
बाल्मीकिरामायण, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा जैनागम उपजीव्य
ग्रन्थ विशेषरूप से उल्लेख योग्य हैं। रामायण में रामकथा के सन्दर्भ में उदार
मधुर तथा असन्दिग्ध, अविस्तर, संस्कारक्रमसम्पन्न तथा हृदयहारी
गुणों का विशेषण के रूप में उल्लेख था । इसी प्रकार महाभारत में विचित्र-
पदत्व श्रुतिसुख, मधुर और अर्थवत् आदि गुणों का उल्लेख है । अर्थशास्त्र
में अर्थक्रम, सम्बन्ध, परिपूर्णता, माधुरी, उदारता तथा स्पष्टत्व जैसे गुणों
का वर्णन मिलता है । औदार्य तथा माधुर्य गुणों की स्थिति भरत के अनुरूप
है । जैनागम के अनुयोगद्वार सूत्र में निर्दोष, सारवत् हेतुमत्, अलंकृत, उपनीत,
सोपचार, मित, तथा मधुर—ये आठ गुण दिखलाये । गये हैं अन्य जैनागम
रायप्रसेणीयसुत्त में (राजप्रश्नीय) में सत्यवचन के पैंतीस अवशेषों में संस्कार-
वत्व, उदात्तत्व, उपचारोपेतत्व जैसे शब्दगुण तथा महार्थ, अव्याहत, पौर्वापर्य,
असन्दिग्ध, देशकालयुक्त, अतिस्निग्धमधुर, उदार तथा ओजस्वी अर्थ गुण हैं
जिनकी भरत के गुणों से भावनामूलक समानता प्राप्त होती है ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१
भरत मुनि के निरूपित गुणों के विवरण से स्पष्ट है कि उनकी चिन्तनधारा
काव्यएवं नाट्योन्मुखी थी तथा शब्द एवं अर्थगत गुणों की अस्पष्ट रेखा भी इनके
लक्षणों में प्राप्त रही । इनमें सौकुमार्य तथा अर्थव्यक्ति के लक्षण में प्रयोज्य
तथा प्रयोग का उल्लेख नाट्योन्मुखी तथा समता, श्लेष एवं उदारता जैसे गुणों
काव्योन्मुखी प्रवृत्ति को स्पष्ट निर्दर्शित करता है । इनके दस गुणों में कुछ
अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक हैं । यद्यपि भरत ने गुणों की कोई विभाजक
रेखा नहीं दी है परन्तु उसका ऐसा वर्गीकरण लक्षणों को लेकर सरलता से
किया जा सकता है ।
भरत के उत्तरवर्ती काल में आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा
स्वीकारते हुए गुण को उसके अंग के रूप में प्रतिपादित किया तथा आचार्य
आनन्दवर्द्धन ने रस को काव्य ( नाट्य ) की आत्मा मानकर रसाश्रित गुण
का सिद्धान्त दिखलाया ।
वामन के अनुसार गुण शब्दार्थमय काव्यशरीर के अविनाभूत अंग हैं
जिनके बिना काव्य की शोभा की कल्पना नहीं की जा सकती । अतः काव्य-
रचना के लिये गुण सर्वस्व तुल्य ही हैं । आचार्य वामन ने भरतोक्त दस गुणों
के स्थान पर शब्द तथा अर्थगत बीस गुणों को निरूपित किया । दस शब्द गुण
तथा दस अर्थगुण । भोज ने वामन का ही अनुसरण कर कुछ परिवर्धन कर
चौबीस गुणों को दिखलाया । जयदेव ने चन्द्रालोक में वामनप्रवर्तित गुणों का
ही अनुसरण किया ।
गुणसिद्धान्त की अन्य धारा में आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रवर्तित परम्परा
अधिक युक्ति सम्मत तथा व्यावहारिक रही । इसका प्रवर्त्तन आचार्य आनन्द-
वर्धन नेकिया अवश्य किन्तु संवर्द्धन एवं परिवर्द्धन आचार्य मम्मट एवं विश्वनाथ
महापात्र जैसे आचार्यों ने किया था । इसमें रस रूप काव्यात्मा के ओज, प्रसाद
तथा माधुर्य नित्य धर्म हैं तथा अलंकार अनित्य धर्म माने गये तथा गुण दस या
बीस नहीं तीन ही हैं तथा इन्हीं तीन गुणों में शेष गुणों का अन्तर्भाव होता है
तथा कुछ गुणदोषा भाव रूप हैं । आनन्दवर्द्धन की दृष्टि में आत्मा कीशूरता जैसे
नित्य धर्मों की तरह ओज आदि गुण नित्य धर्म हैं तथा अलंकार कटक-केयूरों
की तरह अंगों के माध्यम से आत्मरूप रस के उपकारक । इसी विचारसरणि के
प्रकाश में मम्मट ने काव्य के लक्षण में अनलंकृत काव्य को भी काव्य मानने
का विचार रखा तथा विश्वनाथ भी इसी मत को स्वीकार करते थे ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आनन्दवर्धन ने भरत के रससिद्धान्त को पुनः
नवीन रूप प्रदान किया था। आनन्दवर्धन की मान्यता में तीन गुणों में सभी का
३१ ना० शा० द्वि०
४८२ नाट्यशास्त्र
अन्तर्भाव करने की प्रवृत्ति का आधार कदाचित् भामह का गुणनिरूपण रहा था
जिसके स्रोत का ज्ञान नहीं होता न और संकेत ही मिलता है । परन्तु इतना स्पष्ट
है कि भरत के द्वारा किया गया दोषाभावरूप गुण का संकेत गुणों की संख्या
को कम करने के विचार के लिये पर्याप्त आधार बन गया । बात भी ठीक है
कि गुण दोषाभावरूप होते हैं और हैं भी परन्तु तीन गुणों की कल्पना एक
विशिष्ट विचार धारा के साथ आयी थी जो गुण के विकास क्रम में आज भी
ज्योति स्तम्भ सी दीपित है, यह स्पष्ट है ।
१०७. जहाँ तनुवाही ( सूक्ष्म वाही ) चित्त का परिस्पन्द नहीं रहे तो
वहाँ वीर आदि में उपमा एवं रूपक जैसे अलंकारों में लघु अक्षर प्रधान 'वृत्त'
रहते हैं ।
११८. औदार्य अर्थगुण है जो प्रधानतया दीप्त रसों में रहता है । यह
शब्द गुण भी है अतः दीप्तत्व के प्रकाशक वर्णों में स्थित रहता है । उसी का
अनुयायी माधुर्य गुण है । ये गुण अपने अनुगत ( अनुयायी ) गुणों से अनुस्यूत
मसृण रसों में स्थित रहते हैं ।
११६. अर्थगुण योग्यता का अतिक्रमण किये बिना सर्वत्र रहते हैं । इसे
ही 'प्रमदाभिधेयान्' पद से कहा गया है । प्रमद अर्थात् हर्ष या हर्ष को उत्पन्न
करने वाला सकल गुणों से समन्वित अभिधेय अर्थ जिन शब्दों का हो वे उदार
एवं मधुर शब्द ही हैं ।
१२१. ललित सुकुमार जो प्रयोग हैं वे ही नटों के द्वारा प्रयुक्त होने योग्य
हैं इस तथ्य को दिखलाया है—'मृदुललित' इत्यादि से मुनि ने ।
सप्तदश-अध्याय अनुबन्ध
१-४. शब्दों का शब्दों के साथ, अर्थों का अर्थों के साथ तथा शब्दों का
अर्थों के साथ विचित्र संघटन करवाने वाली अभिधा विशिष्टा उक्ति ही
निर्माण धुरा पर आरूढ़ करवाने पर 'लक्षण' बन जाती है । इसलिये लक्षण
ही प्रधान है तथा गुण एवं अलङ्कार उसी के प्रसंग से प्राप्त होते हैं, यह बात
लक्षणों के स्वरूप तथा व्याख्यान से स्पष्ट है । अब उद्देश्य कथनार्थ—
‘विभूषणम्’ इत्यादि ४ पद्य कहते हैं । तदनुसार जो विभाव, अनुभाव तथा
व्यभिचारियों के वाचक शब्द हैं तथा जो उनके अर्थ हैं वे स्थायी भाव को
रस रूप में परिणत करने रूप प्रयोजनान्तर को प्राप्त करते हैं तथा अभिधा
व्यापार से उपसंक्रान्त होने वालेजो उद्यानादि अर्थ हैं वे लक्षण है । इसीलिये
उनका काव्य में सम्यक् प्रयोग अभीष्ट है ।
५. विभूषण :— इन लक्षणों में प्रथम विभूषण का लक्षण बतलाते है—
अलङ्कारै ‘इत्यादि से । कंकण जैसे अलंकार को पृथक् कर किस स्थान पर,
किस समय, किस दशा में किस पुरुष को धारण करना चाहिए ऐसा विचार कर
धारण किये गये अलंकार तथा गुण के द्वारा जो अलंकरण हो वह 'भूषण'
नामक लक्षण होगा । इसके विन्यास में कवि का व्यापार होता है और कवि
के द्वारा शब्द और अर्थ का ( भी ) व्यापार ( होता ) है ।
स्थान में निवेश का उदाहरण है—‘लीनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवान्त-
र्निखातेव च प्रोत्कीर्णेव च वज्रलेपघटितेव ( माल० मा० ) इत्यादि । प्रस्तुत
पद्य में विप्रलम्भ की अवस्थाओं को माधुर्य, प्रसाद आदि गुणों से युक्त काव्य
में रखा गया है । यह विप्रलम्भ समस्त अलङ्कारवर्ग का अनुग्राहक कवि
व्यापार रूप है, और इसी के कारण शब्द एवं अर्थ के व्यापार को स्पर्श करने
वाला यह 'विभूषण' लक्षण हो रहा है ।
६. अक्षरसंहति :— अब अक्षरसंहति को दिखलाते हैं—‘यत्रालपैरक्षरै,’
इत्यादि से । यहाँ अक्षर शब्द से यदृच्छा शब्दों की प्रमुखता बतलाई गयी है
क्योंकि यदृच्छाशब्दों में स्वरूप को ही प्रवृत्ति निमित्त माना गया है । अतः श्लेष
युक्त स्वल्प अक्षरों के द्वारा प्रवृत्तिनिमित्त स्वरूप से उपलक्षित होने के कारण
विचित्र अतएव प्रकृत रस के योग्य विभावादि भाव को प्राप्त होने वाले अर्थ का
४८४ नाट्यशास्त्र
वर्णन किया जाता है । वह जिस अर्थ के विषय में श्रोताओं के हृदयों में
उपसंक्रांत करने के लिये कविगण का व्यापार होता है वह अक्षरसंघात
ही उस व्यापार के करने में कारण ( बनता ) है । अतः अक्षरों का
संघात ही इसमें प्रधान है । इनमें यदृच्छा शब्द की प्रधानता का यह
उदाहरण है :—
विस्तम्भादुत्तमाङ्गं प्लवगबलपतेः पादमक्षस्य हन्तुः
कृत्वोत्सङ्गे सलीलं त्वचि कनकमृगस्याङ्कमाधाय शेषम् ।
वाणं रक्षःकुलघ्नं प्रगुणितमनुजेनादरात्तीक्षणमक्ष्णोः
कोणोनोद्वीक्ष्यमाणस्त्वदनुजवदने दत्तकर्णोऽयमास्ते ॥
[ वानर सेनापति सुग्रीव के उत्सङ्ग में विश्वास पूर्वक अपने मस्तक को,
अक्षहन्ता हनुमान के उत्सङ्ग में चरण को तथा कनकमृग की त्वचा पर शेष
अंगों को स्थापित कर राक्षसों के विनाश करने के लिये अनुज लक्ष्मण के द्वारा
प्रगुणित तीक्ष्य बाणों को आँखों के कोने से देखते हुए तथा हे रावण, तुम्हारे
बन्धु विभीषण के मुख की ओर अपने कानों को लगा कर ये ( यहाँ )
श्रीरामचन्द्र विद्यमान हैं । ]
यहाँ अलङ्कारों की योजना के बिना ही ( शब्द की योजना की प्रमुखता
के कारण से ) जो अर्थों की सुन्दरता है वह 'अक्षरसंहति' है ।
७. शोभा :—अब शोभा को कहते है—'सिद्धेरर्थै' इत्यादि से ।
जैसे—मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः
सत्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः ।
उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिद्ध्यन्ति लक्ष्ये चले
मिथ्या हि व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग् विनोदः कुत ॥ (अभि०२।५)
[ इसमें मेद के कम हो जाने के कारण उदर कृश हो जाता है इसलिये
शरीर हलका और उठने योग्य हो जाता है । प्राणियों के भी भय एवं क्रोध
की स्थिति में रहने वाले चित्त के भाव दिखलाई पड़ते हैं और फिर यह तो
धनुर्धारियों का उत्कर्ष माना जाता है कि उनके निशाने चल लक्ष्य पर भी
ठीक बैठ जाएँ । अतः ऐसी लाभदायक मृगया को व्यर्थ ही लोग व्यसन कहते है
क्योंकि इतना विनोद अन्यत्र कहाँ प्राप्त हो सकता है । ]
यहाँ मृगया रूप अर्थ का अविकल निरूपण किया गया है जिससे यहाँ
जो अनुचित या अप्रसिद्ध अर्थ हैं वे ही उचित एवं विचित्र प्रतीत होते हैं ।
यहाँ अशोभन अर्थ भी इस प्रकार शोभित होने से 'शोभा' नामक लक्षण है ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८५
७. अभिमान :—'धार्यमाणस्तु' इत्यादि से 'अभिमान' बतलाते हैं ।
जैसे :—शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं
सम्प्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससन्धुक्षिताः ।
किं प्राणान् न हरन्त्युत प्रियतमा-संजल्पमन्त्राक्षरैः
वार्यन्ते किमु यद्विमोहविवशात् सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥
[ यदि चन्द्र की किरणें अमृतमयी हैं तो फिर ये मेरे मन को अतिशय
क्यों सन्तप्त कर रही हैं। यदि कहें कि ये किरणें कालकूट विष के साथ वास
करने से विषाक्त हो गयी है तो फिर ये प्राणों का हरण क्यों नहीं करतीं । ये
प्राणों को हर लेती पर प्रिया के संभाषण रूप मन्त्राक्षरों से इस विष के प्रभाव
को निवारण कर दिया गया है और जब ऐसा हो तो फिर से विष के प्रभाव
से जन्य मोह के कारण सन्तापमयी स्थिति क्यों बना रहीं हैं । ]
यहाँ एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ की योजना ( घटना ) इस प्रकार रखी
गई है जिसमें फल की योजनाओं से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में
अवस्थित नहीं हो पाता है वहीं पर बँध जाता है । इस प्रकार अर्थ अलौकिक
होने से विलक्षण एवं उपेय है । अतः यह अभिभान नामक लक्षण है ।
६. गुणकीर्तन :—अब गुणकीर्तन का स्वरूप—'कीर्त्यमानै' इत्यादि से
दिखलाते हैं । जैसे:—
पृथुरसि गुणैः मूर्त्या रामो नलो भरतो भवान्
महति समरे शत्रुघ्नस्त्वं तथा जनकः स्थितौ ।
इति सुचरितैर्मूत्तिं बिभ्रच्चिरन्तनभूपतां
कथमसि न मान्धाता देवस्त्रिलोकविजय्यपि ॥
[ हे राजन् , आप गुणों से पृथु या विशाल गुणशाली हैं, मूर्ति या आकार
से आप श्रीराम, नल तथा भरत हैं, युद्ध में शत्रुओं के संहर्ता शत्रुघ्न हैं तथा
पालन करने में आप जनक हैं । इस प्रकार उत्तम चरित्रों में चिरन्तन राजगण
के स्वरूप को धारण करते हुए भी आप त्रिलोकजयी मान्धाता क्यों नहीं
( अर्थात् मुझे पालित करने वाले ) हो रहे हैं । ( अवश्य होंगें ) ]
यहाँ गुणों के उल्लेख द्वारा प्रकृत की चारुता से 'गुणकीर्तन' नामक
लक्षण है । यहाँ यद्यपि श्लेष भी अनुग्राहक के रूप में उपस्थित है परन्तु
लक्षण अलङ्कारों में भी वैचित्र्याधायक होता है ( अतः प्रमुख यहाँ लक्षण
( ही ) है । )
१०. प्रोत्साहन :—अब 'प्रोत्साहन' को—'उत्साहजननै' इत्यादि से
४८६ नाट्यशास्त्र
बतलाते हैं। औपम्य का अर्थात् उपमा का जहाँ संश्रय अर्थात् यत्नपूर्वक
अन्वेषण हो ऐसे। जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
हरवृषभ तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसूतिरेका।
निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ॥
[ हे नन्दीश्वर, संसार में एक मात्र असदृश एवं तुम्हारे सदृश जन को
प्रसव करनेवाली तुम्हारे जैसी ही माता की जय हो। जिसका अन्वेषण कर
परमेश शिव भी अपने पुत्रों एवं गणों को साथ लेकर अपनी सहधर्मिणी के
साथ प्रसन्नता से निवास कर रहे हैं । ]
यद्यपि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी है तथापि वैचित्र्य यहाँ लक्षण
का ही है। इसे ही अन्यत्र पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति कहा गया है।
११. उदाहरण :—अब उदाहरण को—‘यत्रैकस्यापि’ इत्यादि से
कहते हैं।
जैसे :—वल्मीकात् किमुतोद्धृतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं
त्रैलोक्यं तपसा जितं यदि सखे दोष्णा किमेतावता ।
सवं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत्
त्वद्दन्ताङ्कितवालि-कक्षरुधिरक्लिन्नाग्रपुङ्खं शरम् ॥
[ यह वल्मीक से उखाड़ा हुआ पर्वत है यह बात किस के मन को स्पर्श
करेगी अर्थात् इसे कौन स्वीकार कर सकेगा। परन्तु हे मित्र, तुमने तप के
द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर त्रैलोक्य को जीता तो इससे क्या हो गया।
हाँ, ये सभी तभी साधु या ठीक होगी जब तुम विरह से क्षीणगात्र वाले
श्रीराम के उस शर को सह सको जिसके पुंख का अग्रभाग तुम्हारे दांतों
के घाव से अङ्कित बालि की कोख के रुधिर से आर्द्र हो गया है । ]
यहाँ बालि के कक्ष के रावण के द्वारा काटने पर उसकी प्रतीकार करने
की असमर्थता को दिखला कर फिर भी घमण्ड रखने की उसी की स्वकीय
प्रकृति का ध्वनन होता है। यहाँ तुम्हारे दांतों से इस रूप में उसके धिक्कार
का कथन करने से ‘उदाहरण’ है।
१२. निरुक्त :—निरुक्त दो प्रकार का होता है। एक सिद्धि अर्थात् जिसे
लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाए वह तथ्य तथा जो लक्षण से सिद्ध
न हो वह अतथ्य। इसका उदाहरण अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
वीरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत् सत्यपथं कथञ्चित् ।
स चार्जुनः सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा ॥
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८७
[ वीरजन के लिये उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने अपने
उद्बोधन से सत्यपथ पर पहुँचा दिया वह पहुँचाने वाला तो कृष्ण ( काला )
और पहुँचने वाला अर्जुन (शुक्ल) है ऐसी यह सभी प्रसिद्धि वितथ ( मिथ्या )
ही समझना चाहिए । ]
यहाँ कृष्ण तथा अर्जुन के नामों से परस्पर अन्यत्र स्थल में सत्यता तथा
अपने विषय में उनमें असत्यता है। यहाँ अर्थश्लेष नहीं हो सकता क्योंकि
वह तुल्यसंख्या के पदार्थ में रहता है जब कि यहाँ एक का दूसरे में संकेत
किया गया है। अर्थात् जो मूढ़ हो उसे कृष्ण ( या काला ) होना चाहिए
किन्तु यहाँ वह अर्जुन है तथा जिसने सत्पथ पर पहुँचाया उसे अर्जुन होना
चाहिए किन्तु वह कृष्ण है। इस प्रकार एक ही में दोनों का व्यवहार हो रहा
है ( यह तथ्य और अतथ्यभूत 'निरुक्त' है ) ।
१३. गुणानुवाद :—गुणों का अनुवाद अर्थात् अनुकथन करना । परिमित
या परिच्छिन्न वस्तु की आपादित या कल्पित उत्कृष्ट गुण से उपमा के द्वारा
जो गुणों का उत्सेक हो वही 'गुणानुवाद' । जैसे:—
'पालिता द्यौरिवेन्द्रेण त्वया राजन् वसुन्धरा ।'
[ हे राजन्, जैसे इन्द्र ने स्वर्ग का पालन किया था वैसा ही आपने
इस पृथ्वी का पालन किया ] यहाँ एक पृथ्वी पर स्थित मनुष्य राजा की
इन्द्र से तुलना कर उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया गया है ।
अतिशय :—उत्तम अर्थ अर्थात् कहे गये अर्थ से जो विशेष अर्थ है । जैसे
भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
यावन्त्येव पदान्यलीकपिशुनैरालीजनेः शिक्षिता
तावन्त्येव कृतागसो दुततरं व्याहृत्य पत्युः पुरः ।
प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा वर्तितुं
प्रेम्णो मौग्ध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः ॥
[ उस मुग्धा को झूठी चुगली लगाने नाली उसकी सखियों ने जितने अक्षर
( या वाक्य ) सिखलाये उतने ही अक्षरों को उसने ( अविवेकवश ) अपने
अपराधी पति के सम्मुख वैसे ही कह दिया तथा फिर काम की भावना के
अनुरूप रति भी की । यह तो भोलेपन से अधिक सुन्दर बन पड़ने वाले प्रेम
का एक विलक्षण एवं सहज सुन्दर ( एवं अतिरिक्त ) प्रक्रम हो गया । ]
यहाँ पर प्रेम में ईर्ष्यात्मा अर्थ जो हो सकता है उससे विशेष बात कही
गयी है तथा प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भी सुन्दरता से देखने योग्य
४८८ नाट्यशास्त्र
रखा गया है अतः यहाँ 'अतिशय' है, क्योंकि यहाँ अर्थ सम्भाव्यमान है अतः
यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार नहीं है ।
१४. हेतु :—अब हेतु या सहेतु को बतलाते हैं—'बहूनाम्' इत्यादि
के द्वारा । अनेक बोलने वालों का अनादर कर किसी एक असाधारण अर्थ
के निर्णय का कर्तव्य रूप में अवलम्बन कर सिद्ध प्रमाणभूत उपमान का
प्रक्षेप या कथन हो (अर्थात् मुझे ऐसा प्रतिभात होता है )—तो उसे 'हेतु'
समझना चाहिए । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
एके वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं
केचित् पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेऽह्नि चन्द्राचिषाम् ।
मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि प्रत्यक्षतीव्रातपो
मन्येऽहं पुनरध्वनीन-रमणीचेतोऽधिशेते रविः ॥
[ दिन के क्षीण होने पर कुछ कहते हैं कि चन्द्र की किरणों का जलनिधि
में प्रवेश हो जाता है, अन्य कहते हैं कि इसका अग्नि ( में प्रवेश या )
योग होता है किन्तु हे सखि, ये सभी बाते मिथ्या हैं, क्योंकि इनका साक्षी
कोई नहीं है । परन्तु प्रत्यक्ष में जो इसका तीव्र आतप अनुभव किया जा रहा
है उससे मैं तो यह मानती हूँ कि यह पथिक विरहियों के विरह से जलने
वाली विरहिणियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है, चन्द्र नहीं ] ।
यहाँ असाधारण अर्थ का कथन होने से 'हेतु' है ।
१५. सारूप्य :—अनुकरण से उत्पन्न होने से अपदेश जहाँ परोक्ष है तो
'सारूप्य' ।
इसका उदाहरण आचार्य अभिनवगुप्त पाद का यह पद्यः—
सैन्दूरीकृतसान्द्रकुङ्कुमरसप्रच्छायमालोच्यते
यत् प्राच्यां दिशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्द्वन्द्वलेह्यं महः ।
तत्तेजो जरठांशुतां कलयता भाविप्रवासावधि
सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कीर्णो नखाग्राङ्कुरः ॥
[ जो पूर्व दिशा में टेढ़ा तथा दोनों नेत्रों से देखने योग्य सिन्दूर से गाढ़े
कुङ्कुम रस सदृश यह दिखलाई दे रहा है । यह उस तेज की जरठांशुता को
प्रवास की भावी अवधि की सूचना देनेवाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू
के कपोल पर अङ्कित अभिनव नखाग्राङ्कुर है । ]
यहाँ यत् पद से निर्देश्य जो वस्तु है वह परोक्ष है क्योंकि यहाँ तत्त्व का
पूर्ण परिज्ञान नहीं है । आलोच्यते से उसकी छाया मात्र अपदेश्य है । यहाँ
सैन्दूरीकृत इत्यादि से जिसकी दर्शन क्रिया बतलाई वह प्रमाण सहित वस्तु
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८९
है अतः यहाँ 'सारूप्य' लक्षण है। यहाँ उपमालङ्कार नहीं है क्योंकि उपमेय
शब्दोपात्त नहीं है पर पूर्वार्ध से उपमेय को सूचित किया जाना अवश्य
मिलता है।
१६. मिथ्याध्यवसाय :-अब मिथ्याध्यवसाय को कहते हैं- अभूतपूर्वैः
इत्यादि से। वास्तविकता से रहित अर्थों के द्वारा तत्तुल्य अवस्तुभूत अर्थान्तर
का वक्ता के व्यापार या बोलने पर निश्चय होना 'मिथ्याध्यवसाय' है। जैसा
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :-
यो दुर्जनाद्वाञ्छितसिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम् ।
जुह्वज्ज्वलाग्नौ विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत् ॥
[ जो दुर्जन से वाञ्छित अर्थ की सिद्धि चाहता है वह अवश्य ही
उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और जलती अग्नि में हवन करते
हुए हठात् ही अर्थ या प्रयोजन रूप षष्ठ विषय को सिद्ध करने का उद्योग
करता है। ]
यहाँ छठी इन्द्रिय के अभाव में उसके विषय की जैसे कोई स्थिति नहीं
उसी प्रकार दुर्जन से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती। यह काव्यलक्षण
है ऐसा कहने का आशय यही है कि काव्य में लोक का विपर्यास थोड़ा या
अधिक होता ( ही ) है। इसे अन्य पाठ में 'विपर्यय' बतलाया गया है।
१७. सिद्धि :- अब सिद्धि बतलाते हैं- 'बहूनाम्' इत्यादि से। अनेक
प्रसिद्ध पदार्थों में से किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं। यह उस अप्रसिद्ध
की असाधारण सम्पत्ति के लिये कहा जाता है। अतएव उसमें जिसका निवेश
कर वैसा कहते है यह सिद्धि का हेतु होने से 'सिद्धि' कहा गया है।
जैसे :-
भद्रेश्वरः सुरसरित् स भवानहञ्च त्रैलोक्यसारमिह सम्प्रति जीवलोके ।
भद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्थिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु ॥
यहाँ आप और मैं-इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के बीच में उपादान-
असाधारण्य को दिखला कर 'सिद्धि' का विधान करता है।
१८. पदोच्चय :-अब पदोच्चय को 'गुणैर्बहुभि.' से कहते हैं। एक
तात्पर्य के विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक शब्दों के वाच्यरूप में स्वीकृत जो
धर्म हैं उनका उपलक्षण कर जो वस्तु का प्रसंशन है वह पदोच्चय। क्योंकि
अर्थों की उपलब्धि काव्य में स्थित पदों से ही होती है। अतः इन पदों का
उच्चय अर्थात् बाहुल्य जहाँ हो वह 'पदोच्चय' है।
४९० नाट्यशास्त्र
जैसे—असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं
निरालोकं लोकं जननयननिर्माणमफलम् ।
अदर्पं कन्दर्पं मरणशरणं बान्धवजनं
जगज्जीर्णारण्यं कथमसि विधातुं व्यवसितः । ( मालतीमाधवे । )
[ संसार को असार, त्रैलोक्य को रत्नरहित, संसार को प्रकाश हीन,
लोकनेत्रों के निर्माणभूत सौंदर्य को निष्फल, काम को दर्प से विकल,
बान्धवों को मरण की शरण लेने वाले तथा जगत् को जीर्ण अरण्य बनाने के
लिये ऐसा व्यवसाय क्यों कर रहे हो ( कि तुम मालती को मेरे ही सम्मुख
समाप्त करना चाहते हो ) ]
यहाँ अवन्तर अर्थों के बोधक अवान्तर वाक्य रूप पदों का तात्पर्य एक ही
है, किन्तु उन पदों का अपना वाच्यार्थ भिन्न-भिन्न है । यहाँ पदोच्चय पद में
पद का अर्थ है पाद या भाग । अन्य आचार्यों के मत में पूर्व से या आरम्भ
से जो अर्थ चलता हो उसी अर्थ का अन्त तक चलना एकार्थ तात्पर्यक होता है
अतः 'पदोच्चय' है ।
१६. आक्रन्द :—अब आक्रन्द को 'आत्मभावम्' इत्यादि से कहते हैं ।
यहाँ एक अर्थ कटु या कठोर रहने से साक्षात् या सीधे नहीं कहा जाता है
इसीलिये ऐसे अर्थ को सादृश्य के द्वारा आरम्भ में रख कर आगे स्फुट कर
प्रतिपाद्य भाव को प्रधानता से रखते हैं, अतः यह 'आक्रन्द' है । जैसे आचार्य
अभिनवगुप्त का यह पद्य :—
किं पान्थ त्वरसे विलोकय निशां या ह्युन्मुखी पाण्डुरा
चन्द्रं चुम्बितुमीहते प्रकटयन्त्यग्रे सरागां स्थितिम् ।
यद्वा नागर-भोगदुर्ललितकैन्र्यंस्तापि न ज्ञायते
ग्रामेऽग्राम्यजनोपभोगसुभगं निर्व्याज रम्यं सुखम् ॥
[—अरे पथिक, तुम क्यों इतनी शीघ्रता कर रहे हो, जरा इस रात्रि
को तो देखो जो उन्मुखी अर्थात् अपने प्रिय की प्रतीक्षा में ऊपर मुंह किये हुए
तथा विरह से पाण्डुर (पीली) हो गयी है तथा जो आरम्भ में ही अपनी राग-
मयी ऐसी स्थिति को दिखला रही है या फिर नागरिक पदार्थों के भोग
दुलारों से उपेक्षित कर दी गयी है जिसे वह नहीं जानती परन्तु यह समझ
रखिये कि इस ग्राम में भी नागरजन के उपभोग की सुभग, निश्छल एवं
रमणीय सुख की स्थिति बन सकती है । ]
यहाँ उत्तरार्ध में संकेतित ग्रामीण भोग को नायिका स्वाभिप्राय के रूप
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९१
में सीधे न कह कर अरोचक एवं रोचक सुख के उपन्यास से दोनों प्रकार के
तत्त्वों को बतलाते हुए निशाकर के वृत्तान्त की समानता से अपने अभिप्राय
को प्रकट करती है अतः 'आक्रन्द' है। यहाँ प्रथमार्ध से पर सादृश्य तथा
उत्तरार्ध द्वारा अप्रत्यक्ष भाव की ज्ञापना या संकेत भी दिया गया है।
२०. मनोरथ :—अव मनोरथ को 'हृदयस्थस्य' इत्यादि से कहते हैं ।
जैसे :—णिग्गंध-दुरारोहिं पुत्तअ मा पाडलिं समारूढ ।
आरूढणिपडिआ के इमिए ण कआ इह ग्गामे ॥
[ निर्गन्धदुरारोहां पुत्रक पाटलिं मा समारोह ।
आरूढनिपतिताः के नया न कृता इह ग्रामे ॥—छाया ]
[ नासमझ बेटे, गन्धशून्य एवं कण्टकाकीर्ण रहने से आरोहण के अनुप-
युक्त इस पाटली पर तुम आरोहण मत करो, क्योंकि इस ग्राम में इसने किसे
ऊपर नहीं उठाया और फिर नीचे गिराया है । ]
यहाँ वृक्ष पर आरोहण करने के व्याज से किसी पुंश्चली के इच्छुक व्यक्ति
को कोई वृद्धा अपने अभिप्राय को दिखला कर समझा रही है। यह अन्य को
कह कर उसके अन्तर्गत ( अर्थात् अन्यापदेश में रहने से ) प्रस्तुत ही है
अतः यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा है ही, परन्तु यह लक्षणीय रहने से 'लक्षण' ही हैं;
क्योंकि अलङ्कार में अलङ्कार्यत्व असत् है यह कोई युक्ति नहीं हो सकती ।
२१. आख्यान :—अब आख्यान को—'अपृष्टै' इत्यादि से कहते हैं ।
जहाँ प्रश्नों के द्वारा अनेक पदार्थों का निश्चय होता है। जैसे—'बाले नाथ
विमुञ्च मानिनि रुषं' इत्यादि ( अम० शत० ) पद्य की उक्ति प्रत्युक्तियों
में। या फिर बिना ही प्रश्न किये प्रश्न जैसे वाक्यों से शक्य या अशक्य
वस्तुओं के कथन से जहाँ निश्चय हो ऐसे प्रदेश में जैसे 'रामोऽसौ भुवनेषु
विक्रमगुणैः' इत्यादि पद्य में है। यह नाटकाश्रय लक्षण होता है अतः बार-
वार प्रयोग के योग्य होता है, यह दिखलाया गया है ।
२२. याच्ञा :—अव याच्ञा को 'आदौ यत्' इत्यादि से कहते है । इसमें
प्रथमार्ध से हित या इष्ट को दिखलाया ( गया ) है, जिससे यह आशय
प्रकट होता है कि प्रथम अर्थात् आपाततः वह परुष होता है किन्तु परिणाम
में वही वस्तु सम्यक् फल वाली हो जाती है, अतः प्रिय है तथा हितावह होने
से भी प्रिय है ऐसी समझाने की बुद्धि से याच्ञा करना ही 'याच्ञा' है। जैसे
आचार्य अभिनवगुप्त के निम्न पद्य में :—
४९२ नाट्यशास्त्र
भूमिः कण्टकिनी पुरो विटपिनः प्रायो बहूपद्रवाः
भूयश्चैव दिवाकरो मृगयते सन्ध्याङ्गनासङ्गमम् ।
तद्विश्रम्य जनोऽयमत्र सदने ग्राम्योचितां सेवतां
प्रातः पान्थ विचार्य चेतसि चिरं स्थातासि गन्तासि वा ॥
[ यह भूमि कांटों से युक्त है, सामने वाले वृक्षों में उपद्रव भरा है तथा
इधर यह सूर्य भी अपनी सन्ध्यावधू के साथ मिलन को खोज रहा है । इसी
कारण इस समय घर में विश्राम लेकर ग्राम्योचित क्रिया का उपभोग करना
उचित है और प्रातः होने पर विचार करना कि आगे जाना ही है या
ठहरना है । ]
( इसे ही अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' माना है तथा इसका जो अन्य लक्षण
भी मिलता है उसे यथा स्थान देखना चाहिए )
२३. प्रतिषेध :—अब प्रतिषेध का निरूपण करते हैं—‘कार्येषु’ इत्यादि
से । जैसे अमरूक के इस पद्य में :--
लग्ना नांशुकपल्लवे भुजलता न द्वारदेशेऽर्पिता
नो वा पादयुगे तथा निपतितं तिष्ठेति नोक्तं वचः ।
काले केवलमम्बुदालिमलिने गन्तुं प्रवृत्तः शठः
तन्व्या बाष्पजलोपकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥
[ वह पुरुष जब अम्बुराशि से मलिन मेघों वाले समय में दूर देश जाने
को उद्यत हुआ तो उसे रोकने के लिये उस बाला ने न तो कपडे को पकड़ा,
न द्वार देश पर अर्गला सी भुजलता को फैलायी, न उसके चरणों में गिरी
और न ठहरने के लिये शब्द ही कहे किन्तु वह विरह में रोने लगी तो उसके
आँसुओं की नदी बहने से वह शठ उसके प्रवाह से मार्ग अवरुद्ध हो जाने से
आगे नहीं जा सका । ]
इस पद्य के तृतीयपाद से नायक के विपरीत कार्य की प्रवृत्ति दिखलाई
गयी है और पश्चार्ध से नायिका की । यद्यपि कर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति यहाँ
ही सामने आती है परन्तु अन्तिम कार्य से उसने प्रिय की यात्रा का निवारण
कर ही डाला । यह बात चतुर्थपादगत कविचातुर्य से दिखलाई गयी अतः
यहाँ 'प्रतिषेध' है ।
२४. पृच्छा :—अब पृच्छा का निरूपण करते हैं—'यत्राकारोद्भवैः'
इत्यादि से । जैसे वेणीसंहार में—
किं भीमाद् गुरुदक्षिणां गुरुगदाद् भीमप्रियः प्राप्तवान् ( वे० सं० ६। )
[ क्या उन ने भयंकर गदाधारी तथा प्रिय भीम से गुरुदक्षिणा
प्राप्त की ? ]
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९३
यहाँ आकार एवं अभिप्राय सूचक काक्वादि से उद्धृत शक्ति के द्योतक
वाक्य के कारण 'पृच्छा' है ।
२५. दृष्टान्त :—अब 'दृष्टान्त' कहते हैं—'विद्वान्' इत्यादि से । जैसे
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :—
हा हालाहल लेहने हतमतिः सोऽयं समुत्कण्ठितो
गाढाङ्गारगरिम्णि चैष जडधीर्देहं निविक्षेप्स्यसि ।
ग्राम्योऽप्याजगवीं गुहं गलगुहां मोहादयं धावति
व्याधूयेतरसङ्गतानि यदयं सार्धं खलैः खेलति ॥
[ अरे यह कैसा दुर्बुद्धि है जो अति भीषण विष को चाटने के लिये
उत्कण्ठित हो रहा है, यह धधकते अंगारों वाली अग्नि में अपने शरीर को
पटकना चाहता है, यह गँवार पुरुष मोहवश अजगर की गले रूपी गुहा में
घुसने के लिये दौड़ लगा रहा है, क्योंकि यह उत्कृष्ट संगति को छोड़ कर
दुष्टों के साथ खेलना चाहता है । ]
यहाँ
४९४ नाट्यशास्त्र
उड़ा ले गया हो । नहीं—मेरे सामने साधारण शत्रु तो क्या देवशत्रु राक्षस
भी उसे हरण नहीं कर सकते हैं। वह फिर भी आँखो से वह कैसे एकदम
ओझल हो गयी, यह कैसा व्यवहार है । ]
यहाँ आद्यभाग संशय का उदाहरण है तथा शेष भाग उपपत्ति का है ।
२८. आशी : —अब आशी: को बतलाते हैं—'यथा शास्त्रार्थ' इत्यादि
से । जैसे रत्नावली में—'पादाग्रस्थितया' ( १।१ ) इत्यादि । प्रश्न—यह
आशी: अलंकार लक्षण कैसे हो गया । उत्तर—क्योंकि यहाँ वर्णनीय
स्तुति ही है ।
२९. प्रियवचन : —अब प्रियवचन को बतलाते हैं—'आदौ यत्'
इत्यादि से । जैसे :—
किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थः
तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः ।
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्यां
उन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥
[ दूसरों के घर की बात से हमें क्या वास्ता किन्तु मैं चुप रहने में समर्थ
नहीं हूँ, क्योंकि दाक्षिणात्यों का स्वभाव ही है कि वे स्वभाव से ही वाचाल
होते हैं । अच्छा, वह दूसरों के घर की बात क्या है, तो कहता हूँ कि आपकी
वल्लभा कीर्ति घरों, बाजारों, चौराहों और मद्यशाला तक में उन्मत्त हुई सी
घूम रही है । ( अर्थात् आपकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो रही है । ]
यहाँ आपकी वल्लभा घूम रही है यह कथन आरम्भ में क्रोध का जनक
होकर भी 'हन्त कीर्तिः' कहने पर हर्ष का भी उत्पादक है, अतः 'प्रियवचन'
है । यहाँ व्याजस्तुति नहीं है क्योंकि जहाँ निन्दा का अंश है वहाँ स्तुति नहीं
है और पूरी तरह से नहीं निन्दा है ।
३०. कपटसङ्घात : —अब कपट-संघात को बतलाते हैं—'छलयुक्त्या'
इत्यादि से । यहाँ छल के प्रयोग या बहाने से वञ्चना करने वाला कथन या
अर्थ को अन्यथा ग्रहण करना कपट है तथा उसका संघात 'लक्षण' बनता है ।
यह कपट वस्तुक्रम से या दैव से या शत्रु के प्रयोग से उद्भूत होता है । इनमें
वस्तुक्रम से उद्भूत जैसे-मालतीमाधव में मकरन्द का मालतीवेषधारण करना ।
दैवोद्भूत जैसे—नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन का शंखचूड को छलना ।
शत्रु के प्रयोग से उद्भूत जैसे छलितराम नाटक में लवणासुर द्वारा प्रेषित
राक्षसों के द्वारा मन्थरा और कैकेयी का वेष धारण कर गर्भवती सीता को
निर्वासित करवाना । इसके अतिरिक्त अन्य भी हैं—जैसे कृत्यारावण के प्रथम
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९५
अंक में सीता के वेष को धारण करने वाली शूर्पणखा के द्वारा लक्ष्मण को
वञ्चित एवं तिरस्कृत करना । 'ता सव्वहा अण्ण एव्व दे अणिबद्धं अभिप्पाअं
लक्खेभि' [ तत् सर्वथा अन्यमेव तेऽनिर्बन्धमभिप्रायं लक्षयामि ] इत्यादि से ।
३१. क्षमा :—अब क्षमा को बतलाते है—'दुर्जनोदाहृतै' इत्यादि से ।
दुर्जन के क्रोध उत्पन्न करने वाले कथनों से सभी के समक्ष सभा में तिरस्कृत
होकर भी जो पुरुष क्रोध नहीं करता वह क्षमावान् है । ऐसे उस पुरुष
के वर्णन योग्य कवि व्यापार को 'क्षमा' लक्षण समझना चाहिए । इससे यह
भी सूचित होता है कि औचित्य के अनुरूप भिन्न वृत्तियों का विभावादि के
उपयुक्त सञ्चय काव्यलक्षण के रूप में संग्रह के योग्य होगा । इसका उदाहरण
जैसे आचार्य अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
श्रोत्राय दुष्टवचनं प्रति किं न कोपः क्षोभं करोति हृदये ननु कोप एव ।
मित्रं ममैष तु निजात्मनि योऽपकारं कृत्वा ममाशुभकलङ्क-विघातहेतुः ॥
[ क्या कानों को बुरे वचन सुन कर क्रोध नहीं होता परन्तु जो हृदय में
क्षोभ उत्पन्न करे वह तो कोप है ही परन्तु जो अपकार करके भी मेरे अशुभ
कलंक को दूर करने में कारण बनता हो वह तो मेरा मित्र ही होगा यह
निश्चय ही कहा जा सकता है । ]
३२. प्राप्ति :—अब प्राप्ति को दिखलाते है—'दृष्ट्वैवावयवं' इत्यादि से ।
जैसे शाकुन्तल में—
अभ्युन्नता पुरस्तादवगाढ़ा जघनगौरवात् पश्चात् ।
द्वारेऽस्य पाण्डुसिकते पदपङ्क्तिर्दृश्यतेऽभिनवा ॥ (अ० शा० ३।५)
[ पीली रेत से युक्त इस लतामंडप के द्वार पर आगे की ओर उठा हुआ
तथा कटि भार के कारण पीछे की ओर गहरा होने वाला यह नवीन
पदचिह्न दिखाई पड़ रहा है । ]
इस लक्षण ( पद पंक्ति रूप अंश ) को देख कर वह यहाँ होगी ऐसा
शकुन्तला के सद्भाव का उन्नयन 'प्राप्ति' है ।
३३. अब पश्चात्ताप को दिखलाते हैं—'अकार्यं सहसा' इत्यादि से ।
सहसा का अर्थ है बिना विचार के किसी न करने योग्य कार्य को करके ।
जैसे—'मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः ।
कथमप्युन्नमितं न चुम्बितन्तु ॥ ( शाकु० ३ । २२ )
[ उस मनोहरनेत्रों वाली का कन्धे की ओर मुड़ा हुआ मुंह किसी प्रकार
उठाया तो परन्तु मैं चूम न सका । ]
४९६ | नाट्यशास्त्र
३४. अनुवृत्तिः —अब अनुवृत्ति को बतलाते है—'प्रश्रयेणार्थ' इत्यादि
के द्वारा। जैसे भट्टेन्दुराज का पद्य है :—
राजा यद्यनुरुद्ध्यसे यदि भवेद्वाच्यं पुरा मादृशां
तत् सङ्क्रन्दनगोप किञ्चन मनाक् पृच्छत्यधीरो जनः ।
अग्रे रोहणचारिणां सरभसं सञ्चूर्यमाणश्रियं
कम्प्रत्याययितुं प्रयासरसिको यत्नेन रत्नायसे ॥
[ राजा यदि अनुरोध या आग्रह करें और वह भी यदि मेरे जैसे व्यक्ति
को कहने योग्य हो तो हे इन्द्रकीट, यह अधीरजन पूछता है कि रोहण पर्वत
पर सञ्चार करते समय सहसा आगे आने पर बलात् चूर-चूर किये जाने भी
प्रयास करने में रसिक तुम किसे विश्वास देकर समझाने के लिये अपने को
बड़े यत्न से अपने को रत्न के समान मान रहे हो, यह तो बतलाओ । ]
यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा के होने पर भी अप्रस्तुत का जो स्वरूप या शरीर-
गत वैचित्र्य है वह लक्षण के द्वारा ही हो रहा है, क्योंकि लक्षण शरीर भूत है
यह पहिले कहा जा चुका है ।
३५. उपपत्ति :—अब उपपत्ति बतलाते हैं—'प्राप्तानाम्' इत्यादि से ।
यहाँ 'प्राप्तानाम्' में वीप्सागर्भ निर्देश है अर्थात् जो जो प्राप्त होते हों ।
दोषाणाम् अर्थात् अवस्तुभूत क्योंकि उन अर्थों में उपपत्ति का कोई योग या
सम्बन्ध नहीं दिखलाई देता है । जैसे विक्र० के पद्य 'तिष्ठेत् कोपवशात्' इत्यादि
में । ( इसे सम्पूर्ण दिखाया जा चुका है, पृ० ४६३ पर ) । अथवा
जैसे :—क्वाकार्यं शशलक्ष्मण, क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ (विक्र०)
[ अप्सरः कन्या में आसक्ति रूप अकार्य कहाँ और कहाँ चन्द्र का उन्नत
वंश । यह कार्य कुलमर्यादा के विपरीत है । क्या वह फिर कभी दिखाई
पड़ेगी । अरे ! दोषों की शान्ति के लिये हमारा शास्त्र ज्ञान होता है । अरे ।
कोप में भी उसका मुख नितना मनोहर है । निष्पाप एवं पूज्यजन क्या कहेंगे ऐसे
सदाचार के परित्याग करने पर । पर अब तो वह स्वप्न में भी मिलना दुर्लभ
है । अरे मेरे मन, तुम धैर्य एवं स्वस्थता रखो । कौन युवक धन्य होकर उसके
अधर का आस्वादन करेगा । ]
३६. युक्ति :—अब युक्ति का लक्षण करते हैं—'साध्यते' इत्यादि से ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९७
जैसे :—लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डाः ॥
[ यह कोई अन्य ही लावण्य सरिता है जहाँ चन्द्र के साथ कमल भी तैर
रहे हैं, जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदलकाण्ड
तथा मृणालदण्ड भी बह रहे हैं । ]
यहाँ स्पृहणीय उत्कृष्ट नेत्र, मुख आदि का परस्पर शोभात्मक तथा आनु-
कूल्य से उपलक्षित समवाय हैं उससे उपपन्न सरिता रूप अपूर्व अर्थ को सिद्ध
करने वाली अर्थ योजना के कारण यह 'युक्ति' है ।
३७. कार्य :—अब कार्य को बतलाते हैं—'यत्रापसारयन्' इत्यादि से ।
दोष को दूर कर गुण का तत्काल वाच्छनीय अर्थ में नियोजन करें या गुण
को हटा कर दोषों की किसी प्रकृत अर्थनीय पदार्थ में योजना करें तो 'कार्य'
होता है । इसका प्रथम स्थिति में यह उदाहरण है :—
'तावत् स्वात्मनि संश्रितद्रुमलताश्लेषोऽध्वगैर्वर्जनम्' इत्यादि ।
[ पथिकजन मार्गस्थित द्रुम के साथ लता के संश्लेष को भी कामोत्तेजक
होने से देखने की इच्छा छोड़ कर त्याग देते हैं, क्योंकि वैसा वे अपने लिये
ठीक नहीं मानते । ] इत्यादि ।
द्वितीय का उदाहरण है अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
विश्वप्रभो वितरतां कमलां किमन्यत् भूयात् स कोऽपि घटितो भवतोपकारः ।
दूराध्वगेषु पुनरम्बु तथा विकीर्णमन्ते यथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते ॥'
[ हे विश्व के नियन्ता, कमला को हमें प्रदान कीजिये, अन्य बात से हमें
क्या प्रयोजन ! कमला के देने से आपके द्वारा हमारा महान् उपकार हो
जाएगा । दूरस्थ पथिकों के लिये ऐसा जल प्रदान दीजिये जिससे त्रिभुवन में
आपका यश फैल जाए क्योंकि यही अन्तिम कार्य है जो करने योग्य है । ]
यहाँ आपने इसका महान् उपकार किया तथा पथिकों के लिये अतिशय
जल को तृष्णा निवारणार्थ प्रदान किया परन्तु इसके साथ विश्वप्रभो इस अर्थ
की पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जाती है ।
३८. अनुनीति :—अब अनुनीति का लक्षण बतलाते हैं—'अपूर्व' इत्यादि
के द्वारा । अपूर्व अर्थात् अतिशय तीव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिये जो
अपराध हो उसे दूर करना 'अनुनीति । जैसे रत्नावली में 'प्रसीदेति
ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते' ( र० २ । १६ ) [ आप प्रसन्न हों ऐसा यदि
कहता हूँ तो यह कथन आपके क्रोध के बिना बनता नहीं है ( इत्यादि )
३२ ना० शा० द्वि०