नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 593, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ नाट्यशास्त्र
अन्तर्भाव करने की प्रवृत्ति का आधार कदाचित् भामह का गुणनिरूपण रहा था
जिसके स्रोत का ज्ञान नहीं होता न और संकेत ही मिलता है । परन्तु इतना स्पष्ट
है कि भरत के द्वारा किया गया दोषाभावरूप गुण का संकेत गुणों की संख्या
को कम करने के विचार के लिये पर्याप्त आधार बन गया । बात भी ठीक है
कि गुण दोषाभावरूप होते हैं और हैं भी परन्तु तीन गुणों की कल्पना एक
विशिष्ट विचार धारा के साथ आयी थी जो गुण के विकास क्रम में आज भी
ज्योति स्तम्भ सी दीपित है, यह स्पष्ट है ।
१०७. जहाँ तनुवाही ( सूक्ष्म वाही ) चित्त का परिस्पन्द नहीं रहे तो
वहाँ वीर आदि में उपमा एवं रूपक जैसे अलंकारों में लघु अक्षर प्रधान 'वृत्त'
रहते हैं ।
११८. औदार्य अर्थगुण है जो प्रधानतया दीप्त रसों में रहता है । यह
शब्द गुण भी है अतः दीप्तत्व के प्रकाशक वर्णों में स्थित रहता है । उसी का
अनुयायी माधुर्य गुण है । ये गुण अपने अनुगत ( अनुयायी ) गुणों से अनुस्यूत
मसृण रसों में स्थित रहते हैं ।
११६. अर्थगुण योग्यता का अतिक्रमण किये बिना सर्वत्र रहते हैं । इसे
ही 'प्रमदाभिधेयान्' पद से कहा गया है । प्रमद अर्थात् हर्ष या हर्ष को उत्पन्न
करने वाला सकल गुणों से समन्वित अभिधेय अर्थ जिन शब्दों का हो वे उदार
एवं मधुर शब्द ही हैं ।
१२१. ललित सुकुमार जो प्रयोग हैं वे ही नटों के द्वारा प्रयुक्त होने योग्य
हैं इस तथ्य को दिखलाया है—'मृदुललित' इत्यादि से मुनि ने ।