नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७९
का भी संग्रह कर लिया गया है । विशेष दर्शन का अर्थ है उद्देश्य एवं लक्षणों
का दर्शन ।
६१-६३. अक्षर पद से एक अक्षर तथा अनेक अक्षरों को लिया जाता है ।
६५. संहृत :- संहृत है रश्मियों का मण्डल अर्थात् समुदाय या ओघ
जिसका । तपनीयमण्डल पद का अर्थ है सौवर्णचक्र ।
६७. जनीनाम् = युवतियों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली । रामा पद सभी
स्त्रियों का वाचक है । 'यामं यामं' यहाँ वीप्सा से सभी प्रहरों का ग्रहण किया
गया है । पुष्प खिल रहे हैं और भौंरे उन पर मंडरा रहे हैं जिन्हें देखकर
ये हँसती हैं तथा पुष्पों के खिलने पर भी जब भौंरे नहीं आकर मंडराते तो
विस्मय करती हैं ।
६६. प्रवरक अर्थात् श्रेष्ठ है आनन जिसका ऐसा हाथी । इसी प्रकार
केतकी के पुष्प ही पीले दाँत जिसके हैं ऐसे हस्ति से युक्त प्रवर = श्रेष्ठ कानन
= अरण्य शोभित हो रहा है ।
७१. द्विशृंग = जिसके दो शिखर हों या दो उन्नत दाँतों की विशिष्टता
से युक्त या दाँतों की विकलता या राहित्य से युक्त जिसके शिखर हैं ।
७४. सञ्चिताः = युद्ध में एकत्र हो गये हैं । अनुपुङ्गैः - पुङ्ख तक मग्न
होने वाले । चित = व्याप्त । अन्य प्रकार से अर्थ में जैसे निहतास्तलैः को
यदि निहतों के अस्त मरण को ला प्रदान करते हैं ऐसा हो तो यह क्लिष्ट
कल्पना है ।
८२. यह शरद् ऋतु वारण पुष्पों के विकास का समय है । इसी प्रकार
वारण = हाथियों के अनामय अर्थात् स्वस्थ रहने का यही समय है । वारणों=
शत्रुओं का यह काल = मृत्यु होता है । रणों = युद्धों का कालक्षेप अर्थात्
समय का बिताना या चिन्ता का प्रवर्तक है ।
८६. लक्षणों की प्रमुखता को संकेतित करते हुए उपसंहार करते हैं—
'एभिरर्थे' इत्यादि से । अर्थक्रियायुक्तैः = अर्थ की क्रिया में रस-चर्वणा में
युक्त योग है जिनका ऐसे । यह दोष विवरण कई प्राचीन पुस्तकों के
अध्यायान्त में मिलता है फिर भी यही सर्वत्र मिलने के कारण इसकी
व्याख्या की गयी । अतः परमपद से वक्तव्यान्तर संकेतित किया गया है ।
अतः अब दोष का ही आगे विवरण देगें ।
८७-८८. गूढ़ार्थ आदि ।—"पर्याय" इति । पद, वाक्य या अर्थ को
पर्याय शब्द से कहना 'गूढ़ार्थ' दोष है । वास्तव में यदृच्छा शब्द या द्रव्य
शब्दों को पर्याय वाचक नहीं बनाया जाता अतः दोष है ।