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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 668 में से

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पृष्ठ 592

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१
भरत मुनि के निरूपित गुणों के विवरण से स्पष्ट है कि उनकी चिन्तनधारा
काव्यएवं नाट्योन्मुखी थी तथा शब्द एवं अर्थगत गुणों की अस्पष्ट रेखा भी इनके
लक्षणों में प्राप्त रही । इनमें सौकुमार्य तथा अर्थव्यक्ति के लक्षण में प्रयोज्य
तथा प्रयोग का उल्लेख नाट्योन्मुखी तथा समता, श्लेष एवं उदारता जैसे गुणों
काव्योन्मुखी प्रवृत्ति को स्पष्ट निर्दर्शित करता है । इनके दस गुणों में कुछ
अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक हैं । यद्यपि भरत ने गुणों की कोई विभाजक
रेखा नहीं दी है परन्तु उसका ऐसा वर्गीकरण लक्षणों को लेकर सरलता से
किया जा सकता है ।
भरत के उत्तरवर्ती काल में आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा
स्वीकारते हुए गुण को उसके अंग के रूप में प्रतिपादित किया तथा आचार्य
आनन्दवर्द्धन ने रस को काव्य ( नाट्य ) की आत्मा मानकर रसाश्रित गुण
का सिद्धान्त दिखलाया ।
वामन के अनुसार गुण शब्दार्थमय काव्यशरीर के अविनाभूत अंग हैं
जिनके बिना काव्य की शोभा की कल्पना नहीं की जा सकती । अतः काव्य-
रचना के लिये गुण सर्वस्व तुल्य ही हैं । आचार्य वामन ने भरतोक्त दस गुणों
के स्थान पर शब्द तथा अर्थगत बीस गुणों को निरूपित किया । दस शब्द गुण
तथा दस अर्थगुण । भोज ने वामन का ही अनुसरण कर कुछ परिवर्धन कर
चौबीस गुणों को दिखलाया । जयदेव ने चन्द्रालोक में वामनप्रवर्तित गुणों का
ही अनुसरण किया ।
गुणसिद्धान्त की अन्य धारा में आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रवर्तित परम्परा
अधिक युक्ति सम्मत तथा व्यावहारिक रही । इसका प्रवर्त्तन आचार्य आनन्द-
वर्धन नेकिया अवश्य किन्तु संवर्द्धन एवं परिवर्द्धन आचार्य मम्मट एवं विश्वनाथ
महापात्र जैसे आचार्यों ने किया था । इसमें रस रूप काव्यात्मा के ओज, प्रसाद
तथा माधुर्य नित्य धर्म हैं तथा अलंकार अनित्य धर्म माने गये तथा गुण दस या
बीस नहीं तीन ही हैं तथा इन्हीं तीन गुणों में शेष गुणों का अन्तर्भाव होता है
तथा कुछ गुणदोषा भाव रूप हैं । आनन्दवर्द्धन की दृष्टि में आत्मा कीशूरता जैसे
नित्य धर्मों की तरह ओज आदि गुण नित्य धर्म हैं तथा अलंकार कटक-केयूरों
की तरह अंगों के माध्यम से आत्मरूप रस के उपकारक । इसी विचारसरणि के
प्रकाश में मम्मट ने काव्य के लक्षण में अनलंकृत काव्य को भी काव्य मानने
का विचार रखा तथा विश्वनाथ भी इसी मत को स्वीकार करते थे ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आनन्दवर्धन ने भरत के रससिद्धान्त को पुनः
नवीन रूप प्रदान किया था। आनन्दवर्धन की मान्यता में तीन गुणों में सभी का
३१ ना० शा० द्वि०