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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४८४ नाट्यशास्त्र
वर्णन किया जाता है । वह जिस अर्थ के विषय में श्रोताओं के हृदयों में
उपसंक्रांत करने के लिये कविगण का व्यापार होता है वह अक्षरसंघात
ही उस व्यापार के करने में कारण ( बनता ) है । अतः अक्षरों का
संघात ही इसमें प्रधान है । इनमें यदृच्छा शब्द की प्रधानता का यह
उदाहरण है :—
विस्तम्भादुत्तमाङ्गं प्लवगबलपतेः पादमक्षस्य हन्तुः
कृत्वोत्सङ्गे सलीलं त्वचि कनकमृगस्याङ्कमाधाय शेषम् ।
वाणं रक्षःकुलघ्नं प्रगुणितमनुजेनादरात्तीक्षणमक्ष्णोः
कोणोनोद्वीक्ष्यमाणस्त्वदनुजवदने दत्तकर्णोऽयमास्ते ॥
[ वानर सेनापति सुग्रीव के उत्सङ्ग में विश्वास पूर्वक अपने मस्तक को,
अक्षहन्ता हनुमान के उत्सङ्ग में चरण को तथा कनकमृग की त्वचा पर शेष
अंगों को स्थापित कर राक्षसों के विनाश करने के लिये अनुज लक्ष्मण के द्वारा
प्रगुणित तीक्ष्य बाणों को आँखों के कोने से देखते हुए तथा हे रावण, तुम्हारे
बन्धु विभीषण के मुख की ओर अपने कानों को लगा कर ये ( यहाँ )
श्रीरामचन्द्र विद्यमान हैं । ]
यहाँ अलङ्कारों की योजना के बिना ही ( शब्द की योजना की प्रमुखता
के कारण से ) जो अर्थों की सुन्दरता है वह 'अक्षरसंहति' है ।
७. शोभा :—अब शोभा को कहते है—'सिद्धेरर्थै' इत्यादि से ।
जैसे—मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः
सत्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः ।
उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिद्ध्यन्ति लक्ष्ये चले
मिथ्या हि व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग् विनोदः कुत ॥ (अभि०२।५)
[ इसमें मेद के कम हो जाने के कारण उदर कृश हो जाता है इसलिये
शरीर हलका और उठने योग्य हो जाता है । प्राणियों के भी भय एवं क्रोध
की स्थिति में रहने वाले चित्त के भाव दिखलाई पड़ते हैं और फिर यह तो
धनुर्धारियों का उत्कर्ष माना जाता है कि उनके निशाने चल लक्ष्य पर भी
ठीक बैठ जाएँ । अतः ऐसी लाभदायक मृगया को व्यर्थ ही लोग व्यसन कहते है
क्योंकि इतना विनोद अन्यत्र कहाँ प्राप्त हो सकता है । ]
यहाँ मृगया रूप अर्थ का अविकल निरूपण किया गया है जिससे यहाँ
जो अनुचित या अप्रसिद्ध अर्थ हैं वे ही उचित एवं विचित्र प्रतीत होते हैं ।
यहाँ अशोभन अर्थ भी इस प्रकार शोभित होने से 'शोभा' नामक लक्षण है ।