नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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६३. जहाँ दो वर्णों या पदों में नैरन्तर्य है अर्थात् अव्यवधान है, जहाँ
विचार या सम्बन्ध है तथा जहाँ अन्य का अन्य में लय होता है । इस प्रकार
सन्धान या सन्धि तीन प्रकार से होती है । जहाँ शब्द अयुक्त या युक्तिरहित
अथवा पारुष्य का उद्भावक हो जाए तो 'विसन्धि' दोष हो जाएगा । यह
दोष व्याकरणशास्त्र के अनुसार लागू होगा । ये दोष उत्तरोत्तर स्थूल हैं तथा
कभी कभी गुण भी हो जाते हैं । (द्रष्टव्य ना० शा० द्वितीय भाग टिप्पणी
पृ० ३००) ।
६४. अब गुणों के विषय में प्रतिज्ञा करते हैं—'गुणाः विपर्ययाद्'
इत्यादि से । इसका आशय है कि दोषों के विघात में ही गुण होते हैं। यहाँ
यह प्रश्न हो सकता है कि दोषों के विपर्यय में गुण सामान्यतः होते हैं या
विशेष रूप से । इसका उत्तर यही है कि ये विशेष प्रकार से ही होते हैं,
सामान्यतः नहीं। भरत के इस विचार का समर्थन उत्तरवर्ती आचार्यों ने
भी किया जिसका संकेत मात्र नाट्यशास्त्र में था । इस मान्यता का विकास
विपर्यय या दोषों की अनित्यता में हो गया । दोषाभाव होने पर निर्दुष्टः
काव्य सौन्दर्य का आविर्भाव होता है । आगे भोज तथा मम्मट और हेमचन्द्र
जैसे आचार्यों ने दोषहान तथा अदोषता शब्दों से इसी तथ्य को अधिक स्पष्टता
प्रदान की क्योंकि दस दोष दस गुणों के विपर्यय मात्र नहीं होते हैं ।
१०६. काव्यगुणों का लक्षण सहित विवरण भी भरत ने सर्वप्रथम दिया है
परन्तु यह सभी पूर्व लक्ष्य लक्षणादि के आधार पर है यह स्पष्ट है। इस दृष्टि से
बाल्मीकिरामायण, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा जैनागम उपजीव्य
ग्रन्थ विशेषरूप से उल्लेख योग्य हैं। रामायण में रामकथा के सन्दर्भ में उदार
मधुर तथा असन्दिग्ध, अविस्तर, संस्कारक्रमसम्पन्न तथा हृदयहारी
गुणों का विशेषण के रूप में उल्लेख था । इसी प्रकार महाभारत में विचित्र-
पदत्व श्रुतिसुख, मधुर और अर्थवत् आदि गुणों का उल्लेख है । अर्थशास्त्र
में अर्थक्रम, सम्बन्ध, परिपूर्णता, माधुरी, उदारता तथा स्पष्टत्व जैसे गुणों
का वर्णन मिलता है । औदार्य तथा माधुर्य गुणों की स्थिति भरत के अनुरूप
है । जैनागम के अनुयोगद्वार सूत्र में निर्दोष, सारवत् हेतुमत्, अलंकृत, उपनीत,
सोपचार, मित, तथा मधुर—ये आठ गुण दिखलाये । गये हैं अन्य जैनागम
रायप्रसेणीयसुत्त में (राजप्रश्नीय) में सत्यवचन के पैंतीस अवशेषों में संस्कार-
वत्व, उदात्तत्व, उपचारोपेतत्व जैसे शब्दगुण तथा महार्थ, अव्याहत, पौर्वापर्य,
असन्दिग्ध, देशकालयुक्त, अतिस्निग्धमधुर, उदार तथा ओजस्वी अर्थ गुण हैं
जिनकी भरत के गुणों से भावनामूलक समानता प्राप्त होती है ।