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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 668 में से

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पृष्ठ 594

सप्तदश-अध्याय अनुबन्ध
१-४. शब्दों का शब्दों के साथ, अर्थों का अर्थों के साथ तथा शब्दों का
अर्थों के साथ विचित्र संघटन करवाने वाली अभिधा विशिष्टा उक्ति ही
निर्माण धुरा पर आरूढ़ करवाने पर 'लक्षण' बन जाती है । इसलिये लक्षण
ही प्रधान है तथा गुण एवं अलङ्कार उसी के प्रसंग से प्राप्त होते हैं, यह बात
लक्षणों के स्वरूप तथा व्याख्यान से स्पष्ट है । अब उद्देश्य कथनार्थ—
‘विभूषणम्’ इत्यादि ४ पद्य कहते हैं । तदनुसार जो विभाव, अनुभाव तथा
व्यभिचारियों के वाचक शब्द हैं तथा जो उनके अर्थ हैं वे स्थायी भाव को
रस रूप में परिणत करने रूप प्रयोजनान्तर को प्राप्त करते हैं तथा अभिधा
व्यापार से उपसंक्रान्त होने वालेजो उद्यानादि अर्थ हैं वे लक्षण है । इसीलिये
उनका काव्य में सम्यक् प्रयोग अभीष्ट है ।
५. विभूषण :— इन लक्षणों में प्रथम विभूषण का लक्षण बतलाते है—
अलङ्कारै ‘इत्यादि से । कंकण जैसे अलंकार को पृथक् कर किस स्थान पर,
किस समय, किस दशा में किस पुरुष को धारण करना चाहिए ऐसा विचार कर
धारण किये गये अलंकार तथा गुण के द्वारा जो अलंकरण हो वह 'भूषण'
नामक लक्षण होगा । इसके विन्यास में कवि का व्यापार होता है और कवि
के द्वारा शब्द और अर्थ का ( भी ) व्यापार ( होता ) है ।
स्थान में निवेश का उदाहरण है—‘लीनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवान्त-
र्निखातेव च प्रोत्कीर्णेव च वज्रलेपघटितेव ( माल० मा० ) इत्यादि । प्रस्तुत
पद्य में विप्रलम्भ की अवस्थाओं को माधुर्य, प्रसाद आदि गुणों से युक्त काव्य
में रखा गया है । यह विप्रलम्भ समस्त अलङ्कारवर्ग का अनुग्राहक कवि
व्यापार रूप है, और इसी के कारण शब्द एवं अर्थ के व्यापार को स्पर्श करने
वाला यह 'विभूषण' लक्षण हो रहा है ।
६. अक्षरसंहति :— अब अक्षरसंहति को दिखलाते हैं—‘यत्रालपैरक्षरै,’
इत्यादि से । यहाँ अक्षर शब्द से यदृच्छा शब्दों की प्रमुखता बतलाई गयी है
क्योंकि यदृच्छाशब्दों में स्वरूप को ही प्रवृत्ति निमित्त माना गया है । अतः श्लेष
युक्त स्वल्प अक्षरों के द्वारा प्रवृत्तिनिमित्त स्वरूप से उपलक्षित होने के कारण
विचित्र अतएव प्रकृत रस के योग्य विभावादि भाव को प्राप्त होने वाले अर्थ का