नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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५६-५७ दीपक :-अब 'नानाधिकरणानाम्' इत्यादि से 'दीपक'
अलङ्कार बतलाते हैं। नाना जो वाक्यरूप या पदरूप भिन्न-भिन्न शब्द हैं
उनके अधिकरण में अर्थात् जिनकी वे साकांक्ष शब्द तथा उनका सम्यक् जो
दीपक है अर्थात् आकांक्षापूरक गुण या जात्यादि जहाँ हो वह दीपक है।
क्योंकि एक अवान्तर वाक्य के द्वारा असंयुक्त वाक्य भी संयुक्त की
तरह कर दिया जाता है अतः देहली में जलाया हुआ दीपक जैसे बाहर
और अन्दर प्रकाश करता है वैसा ही दीपक प्रकृति होने से यह 'दीपक'
अलङ्कार है।
५८. रूपक- अब रूपक अलङ्कार को बतलाते हैं 'स्वविकल्पेन' इत्यादि
से। अपने विकल्प अर्थात् विशिष्ट कल्पना से वदन को चन्द्र रूप में रूपित करना
अर्थात् दूसरे को अपने रूप से युक्त करना ही 'रूपक' है। यह दो प्रकार से
होता है। एक वह—जहाँ तुल्य अवयव वाले अवयवियों को अन्य के रूप से
युक्त करना तथा दूसरा किञ्चित् सादृश्य से युक्त रूप वाले बनाना। यहाँ
कुछ एक दूसरे के रूप के सदृश रूप से युक्त अर्थात् रूपान्तर के द्वारा रूपित
करना होता है तथा ऐसे स्थल पर एकदेशविवर्ति नामक द्रव्यादि रूपक
हो जाता है यह प्रसिद्ध है।
अन्य 'नानाद्रव्यादि' के अनुसार रूपक का पाठ लेते हैं। तदनुसार यह
रूपक शब्द के अनुगत अर्थत्व का आख्यान करता है। इसमें औपम्य का गुण
(गौण) रूप से अर्थात् अप्रधान रूप से संश्रयण करता है। इसके कारण
रूप की जो किसी अन्य के रूप से निश्चय पूर्वक वर्णना है वही 'रूपक' है।
५६. यहाँ (पद्माननस्ताः में) "हंसकुलैः" में अरूपित भी नर्मसचिवत्व
व्यक्त होता है। इतना अंश 'यदि वा किञ्चिद्' के अनुसार द्वितीय भेद का
उदाहरण है। यहाँ 'अन्योन्यमिव' पाठ ठीक नहीं है क्योंकि इव घटित
पाठ में उपमा या उत्प्रेक्षा की आशंका होगी अतः 'अन्योन्यमिह' ऐसा पाठ
उपयुक्त है।
६०. यमक :—यहाँ शब्दाभ्यास में शब्द पद से वाक्य, पद, पदैकदेश
तथा वर्ण सभी का ग्रहण होता है। फलतः लाटानुप्रास आदि का भी इसी
से ग्रहण समझ लिया जाना चाहिए। 'यम' उसे कहते हैं जहाँ दो बालक
एक साथ (एक जैसे भी) उत्पन्न हों अतः तत्प्रकृतिक या उसी स्वभाव के
कारण इसे 'यमक' कहा जाता है। यह वाक्य, पद एवं वर्ण के सदृश सान्तर
या निरन्तर (रूप) में प्रयुक्त हुआ द्वितीय वाक्य, पद एवं वर्ण शोभा का
आधायक हो जाने से अलङ्कार बन जाता है। पादादि में विकल्प कहने से
मध्य एवं अन्त में स्थापन का नियम नहीं है अर्थात् इस विकल्प से लाटानुप्रास