सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७१
[ सुरतकाल में अधर दंशन कर लेने पर अधर फड़कने लगता है ऐसे
मुखकमल में जो रस होता है, वस्त्र खींच कर हरण कर लेने पर करधनी
की प्रभा से आकर्षक जघन में जो प्रीति होती है, स्त्रियों के नखक्षत के
अंकुर को धारण करने वाले पीन पयोधर में जो शोभा होती है तो ऐसी
भावना से यदि राग सम्पन्न हृदय हो तो फिर वह जन्मान्तर में भी विरक्त नहीं
होता है, यह निश्चित समझिये । ]
यहाँ जन्मान्तर में भी रस, प्रीति एवं अनुराग के अनुवर्तन के कथन से
जन्मान्तर में भी हृदय में वैराग्य होना सम्भव नहीं है । अतः संसार के बन्धन से
छुटकारा असंभव है । ऐसे अर्थ का बोध होने से यहाँ 'अर्थापत्ति' नामक लक्षण
स्पष्ट है ।
३३. प्रसिद्धि :—प्रसाधक = प्रकृष्ट साधक, प्रसिद्ध = पूर्व से ही जो सिद्ध
है । जैसे गदायुद्ध में पराभूत दुर्योधन से श्री बलदेव ने कहा—
बल०—भीमसेन, इदानीं तव युद्धवञ्चनामुत्थाय स्थास्यति ।
दुर्याे०—न चाहं भीमसेनेन वञ्चितः ।
बल०—अथ केन भवानेवंविधः कृतः ।
दुर्याे०—श्रूयताम्—
येनेन्द्रस्य च पारिजातकतरुर्मानेन तुल्यं हृतो
दिव्यं वर्षसहस्रमर्णवजले सुसश्व यो लीलया ।
दीप्त्या भीमगदां प्रविश्य सहसा निर्व्याजयुद्धप्रियः
तेनाहं जगतां प्रियेण हरिणा मृत्योः प्रतिग्राहितः ॥
[ बल—भीमसेन अब तुम्हे युद्ध में वञ्चित कर स्थिर हो गया है ।
दुर्याे—मुझे भीमसेन ने नहीं ठगा है ।
बल—तब फिर तुम्हें ऐसा किसने कर डाला;
दुर्याे—अच्छा तो सुनिये—जिसने इन्द्र के अभिमान के साथ पारिजात का
हरण किया था, जिसने दिव्य सहस्रों वर्षोंतक समुद्र के जल में लीला पूर्वक
शयन किया, उस संसार के प्रिय एवं निर्व्याज छली श्री कृष्ण ( हरि ) ने
अकस्मात् अपनी दीप्ति द्वारा गदा में प्रवेश कर दुर्योधन को मृत्यु के लिये
प्रतिगृहीत करवा डाला है ]
यहाँ श्रीविष्णु के शयन आदि कार्य ही वाक्यार्थ के साधक है । अन्य
आचार्य—यहाँ अलंकार युक्त पदार्थों को वाक्यार्थ के प्रसाधक मानते हैं ।

४७२ नाट्यशास्त्र

३४. पृच्छा :--शोक, मोह आदि के कारण पराधीन हो जाने से स्वयं
अपने को या दूसरे को सम्बोधित कर प्रश्न करने की-सी दशा में कथन-करना
'पृच्छा' है। अतः जहाँ उत्तर की अपेक्षा न हो वहाँ यह प्रश्न एवं कथन ही
प्रत्यायक है। जैसे रामचरित में हनुमान सीता को देख कर कहते हैं :--
स्थानेऽवसीदसि रघूद्वह किं विधातः अस्यास्त्वयेक्षितमलक्षणमङ्ककेषु ।
अद्यापि जीवसि दशानन हे हनूमन् केयं तवाभिमुखवर्तिरिपोः प्रतीक्षा ॥
[ हे रघुनाथ, आप दुःखी होते हों यह उचित ही है । हे विधाता, तुमने
इस भगवती सीता के अंगों पर कौन से अलक्षण या दुर्लक्षण देखे जिन्हें देख
कर इसके ललाट पर विधिना का ऐसा लेख लिखा था । अरे दशमुख, तुम इस
बेचारी को इतना कष्ट देकर आज भी जी रहे हो । और हे हनुमन्, अपने
सामने शत्रु को पाकर भी तुम अब कैसी या किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो । ]
३५. सारूप्य :--यहाँ कथनादि में आदि पद के द्वारा दर्शन, श्रवण
एवं अनुभवन का उपलक्षण है। यहाँ रूप की विशिष्ट भ्रान्ति से क्षोभ को
उत्पन्न कर देने में ही लक्षण का चमत्कार नहीं। जैसे छलितराम में लक्ष्मण
के द्वारा बाँध कर लाये गये लव ने श्रीराम की यज्ञशाला में स्थित हिरण्मयी
सीता को देख कर कहा—'अये कथमियमम्बा राजद्वारमागता' ( अरे माँ
आज कैसे (सहसा) राजद्वार में आ गयी ! ) और सहसा खड़ा होकर
प्रणाम कर एवं ध्यान से देख कर 'अरे यह तो हिरण्मयी हैं—ऐसा अनुभव कर
देख कर, समीप जाकर फिर दूर हट कर बैठ गया । या वेणीसंहार में दुर्योधन
का वध कर के लौटने वाले भीमसेन को चार्वाक के कथन से भ्रान्त युधिष्ठिर
द्वारा दृढ़ता से पकड़ कर यह कहना—'आशैशावादनुदिनम्' इत्यादि ।
३६. मनोरथ :--जैसे विकटनितम्बा के प्रहसन में विकटनितम्बा
कहती है कि—
अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु ।
मुग्धामजातरजसं कलिकामकाले बालां कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः ॥
[ अरे भौरे, रतिकालीन उपमर्द का सहन करनेवाली दूसरी पुष्प-लताओं
से अपना मन बहलाओ ! तुम इन मुग्धा (नग्निका) एवं अनर्तवा कली वाली
नवमालिका को क्यों व्यर्थ ही कदर्थित कर रहे हो । ]
यहाँ विकटनितम्बा ने स्वयं अपने को ही सुमनोलता के बहाने रखकर यह
कहा है ।
३७. लेश :--जैसे अविमारक के द्वितीय अंक में धात्री नायक को
कहती है :

धात्री अय्य, किं चिंतीअदि । [ आर्य, किं चिन्त्यते ? ]
अवि—भवति, शास्त्रं चिन्त्यते ।
धात्री—किं णाम एदं रमणीअं सत्यं चिन्तीअदि । [ किं नामैतत् रमणीयं
शास्त्रं चिन्त्यते । ]
अवि—भवति, योगशास्त्रं चिन्त्यते ।
धात्री—( सस्मितम् ) पडिग्गहिदं मंगलवअणं । ओअ-सत्थं एव भोदु ।
[ प्रतिगृहीतं मङ्गलवचनम् । योगशास्त्रमेव भवतु ]
अवि—को नु खलु वाक्यार्थः । अन्यदप्यभिलाषवशादन्यथा सङ्कल्पयामि ।
इत्यादि ।
[ आर्य, क्या विचार कर रहे हो ? ]
अवि—भवति, मैं शास्त्र की चिन्ता कर रहा हूँ ।
धात्री—यह सुन्दर शास्त्र किस नाम का है।
अवि—भवति, ( इस ) योगशास्त्र की चिन्ता की जा रही है ।
धात्री—मैंने मंगलवचन स्वीकार किया । यह योग का शास्त्र हो जाए ।
अवि—तब वाक्यार्थ क्या रहेगा । और भी अभिलाष के कारण सोचता हूँ
जो अन्यथा संकल्प करना है । इत्यादि ]
अन्य आचार्य जन लेश को लेख पढ़ कर इङ्गितज्ञान को समझ लेना इसका
लक्षण करते हैं ।
३८. क्षोम :—जैसे रत्नावली के तृतीय अंक में सागरिका समझ कर
वासवदत्ता का उपलालन करनेवाले उदयन को वासवदत्ता द्वारा अपने घूंघट
को हटा कर लज्जित कर देने के बाद राजा का यह कथन—
राजा—( अञ्जलिं बद्ध्वा ) प्रिये वासवदत्ते, प्रसीद प्रसीद ।
वास—(अश्रु निपातयन्ती) मा एव्वं भण । अण्णगदाई एदाइ अक्खराणि-
[ मैवं भण । अन्यगतान्येतान्यक्षराणि । ]
विदू—भोदि, महाणुभाआ खु तुमं । खमीअदु दाव एक्को अवराहो
पिअवअस्सस्स । [ भवति, महानुभावा खलु त्वम् । तत् क्षम्यताम् तावदेकोऽ-
पराधो प्रियवयस्यस्य । ]
वास—णं पढमसंगमे विग्धं करंतीए मए जेव्व एदस्स अवरद्धं ण अज्ज-
पुत्तस्स । [ ननु प्रथमसङ्गम एव विघ्नं कुर्वन्त्या मयैवैतस्यापराद्धं नार्यपुत्रस्य ]
[ राजा प्रिये, वासवदत्ते, तुम प्रसन्न हो जाओ ।
वास—(आंसु गिरा कर ) आप ऐसा क्यों कहते हैं । ये अक्षर तो दूसरों
के लिये हैं ।

विदूषक—भवति, आप महानुभावा हैं, अतः प्रियवयस्य के एक अपराध
को क्षमा कर दो ।
वास—अरे, इस प्रथम मिलन में विघ्न डाल कर तो अपराध मैंने ही
किया है आपके इन प्रियमित्र ने नहीं ।]
अन्य आचार्य इसका 'आत्मन्यभूततद्भावभावनम्' (अपने में अभूत जैसी
भावना रखना, ) लक्षण करते है । इसके अतिरिक्त अन्य इसे 'अन्यगते हेताव-
स्मिन् कार्यकल्पनम्' (अन्यगत कारण से भिन्न में कार्य की कल्पना करना )
लक्षण करते हैं ।
३६. गुणकीर्तन :—जैसे वत्सराजचरित के चतुर्थ अङ्क में शालङ्कायन
कहते हैं—
शालङ्कायनः—नीलनागव्यपदेशेन समन्ततः शस्त्रप्रभाभासुरैरस्मद्योधैः
परीतेन महति भयस्थाने विगतसम्भ्रमं—
तेन प्रोक्तं धैर्यगाम्भीर्यशौर्यप्रज्ञातेजो-नीति-दाक्षिण्यगर्भम् ।
वाक्यं सामाद्यं सोर्जितं श्रोत्ररम्यं शास्त्रीकर्तव्यं तद्बुधैः स्वार्थकामैः ॥
भरतरोहकः—एषः सङ्क्षिप्तविस्तरो नाम ।
राजा—ततस्ततः ।
शालङ्कायनः—देव, यस्तस्य युद्धे महति प्रवृत्ते पराक्रमः साहसलाञ्छनः सः ।
प्रद्युम्नरामार्जुनभीमकर्ण—साम्बाभिमन्युष्वविचिन्त्य एव ।।
राजा—अहोनु खलु स्वभावसिद्धानां गुणानामव्यभिचारिता । कुतः—
अविदित इति नैकधा प्रयत्नाद् बहुदिवसं बहुधा परीक्षमाणः ।
द्विगुणमभिविराजते गुणैः स्वैर्मणिरिव जातिविशेषवान् महार्हः ॥
[—शालङ्कायन—काले सर्प के बहाने से चारों ओर शस्त्रों की प्रभा से
दीप्त हमारे योद्धाओं से घिरे हुए उसने भय के स्थान होने पर भी सम्भ्रम
को त्याग कर—धैर्य, गाम्भीर्य, शौर्य, प्रज्ञा, तेज, नीति तथा दाक्षिण्य से
युक्त सामप्रधान एवं ऊर्जस्वी होकर भी कर्णसुखद वाक्य को कहा—बुधजन
अपने प्रयोजन के लिये इसे शास्त्रवचन के रूप में ग्रहण करें ।
भरतरोहक—यह संक्षिप्त है तथा विस्तीर्ण भी ।
राजा—अच्छा, इसके बाद ।
शाल—महाराज, तब महान् युद्ध के आरम्भ हो जाने पर उसने जो
पराक्रम दिखलाया वह साहस ही कहना चाहिए, क्योंकि ऐसे साहस को
प्रद्युम्न, बलराम, अर्जुन, भीम, कर्ण, साम्ब तथा अभिमन्यु के विषय में भी
सोचा नहीं जा सकता था ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७५
राजा—अरे, जो गुण सहज होते हैं वे अव्यभिचारी भी होते हैं। क्योंकि—
जाना पहिचाना नहीं है ऐसा कह कर या जानकर एक बार नहीं अनेक बार
बहुत दिनों तक प्रयत्नपूर्वक परीक्षा लेने पर यह जातिविशेष या बहुमूल्य
मणि जैसा अपने गुणों से दूने रूप में शोभित हो रहा है।]
४०. अनुक्तसिद्धि :—जैसे तापसवत्सराज में यौगन्धरायण ने अस्थि-
रचित्त वासवदत्ता से कहा—
यौग—कौशाम्बीं परिभूय नः कृपणकैर्विद्वेषिभिः स्वीकृतां
जानास्येव तथा प्रमादपरतां पत्युर्नयद्वेषिणः।
स्त्रीणाञ्च प्रिय-विप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे
वक्तुं नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥
[हम लोगों को दबा कर इन तुच्छ (कृपणक) शत्रुओं ने कौशाम्बी
को ले लिया। इस प्रकार नीति से अनुसार चलने में रुचि न लेने वाले
अपने स्वामी की प्रमादपरता को आप स्वयं ही जानती हैं तथा स्त्रियों का चित्त
सदा ही प्रिय के वियोग में विधुर रहता है। अतएव इस विषय में कुछ भी
कहने में मेरा उत्साह नहीं होता। इसके बाद के कर्तव्य को देवी स्वयं
समझ लें।]
४१. प्रियोक्ति :—जैसे तापसवत्सराज में सप्तम अङ्क में भरतरोहक
वासवदत्ता को वीणा का शिक्षण देने के लिये अर्पण करने की इच्छा से
वत्सराज को देख कर कहता है :—
या शेते कौस्तुभस्य द्युतिकिसलयिते शारदव्योमनीले
विष्णोर्वक्षस्युदारे रजनिकरकराकारहारोपहारे।
साभ्येत्यालिङ्गत्तु त्वां प्रशिथिलगलितेनोत्तरीयेण लक्ष्मी-
र्हर्षादापीडयन्ती नवकमलरजोरोचनाभ्यां स्तनाभ्याम् ॥
[जिसमें कौस्तुभमणि की कान्ति किसलय के सदृश है, जो शरदकालीन
आकाश जैसा नीलवर्ण है एवं चन्द्र की किरणों से निर्मल हार से विभूषित है,
ऐसे उदार श्रीविष्णु के वक्षःस्थल पर जो शयन करती है वही शिथिल एवं
गलित उत्तरीय वाली श्री लक्ष्मी स्वयं आकर अपने नूतन कमल के पराग से
शोभित उरोजों से आपीडन करने के साथ ही आपका आलिङ्गन करे।]
४२. दृश्य एवं पाठ्य काव्यों की तरह श्रव्यप्रबन्धों में भी कथाशरीर के
संविधान, सम्भाषण और वैदग्ध्यरूप इन (लक्षण नामक) कविव्यापार को
इसी प्रकार समझना चाहिए !

४७६ नाट्यशास्त्र

  • ४३. शरीर कल्प इसी लक्षण के शब्द तथा अर्थ गत अलङ्कारों का
    निरूपण करने के लिये उनका नामतः उद्देश्य कथन करते हैं— 'उपमा'
    इत्यादि से। काव्य में लक्षण शरीर स्थानीय होता है उसके अर्थभाग में
    रहने वाले उपमा आदि तीन अलंकार होते हैं। जैसे हार से रमणी विभूषित
    होती है उसी प्रकार जहाँ पृथक् सिद्ध उपमान से प्रकृत वर्णनीय (मुखादि)
    को सुन्दर किया जाता हो वे ही अलङ्कार हैं।
    प्रश्न—जिस हारादि अलङ्कार से कामिनी की सुन्दरता वृद्धिगत होती है
    वह रमणी से पृथक् सिद्ध है पर रमणी भी उससे पृथक् सिद्ध है। परन्तु ये
    उपमादि अलङ्कार काव्य से पृथक् सिद्ध नहीं, क्योंकि उनमें शब्द तथा अर्थ—
    जो काव्य के शरीरभूत हैं—उन्हें ही किसी भङ्गिमा से कहने पर अलङ्कार बन
    जाता है। उत्तर—यह ठीक है परन्तु ये शब्द और अर्थ कवि की बुद्धि में चञ्च-
    लता से परिवर्तित होते रहते हैं जिनमें परिवर्तन ही पृथक् है तथा शरीर पृथक्।
    (अतः अलङ्कार पृथक् सिद्ध हो ही जाते हैं)।
    इस अलङ्कार की स्थिति तीन प्रकार से है। एक स्थिति वह है
    जहाँ उपमानोपमेयभाव सम्पूर्ण या स्फुट हो क्योंकि वहाँ (उपमा में)
    वर्णनीय उपमान तथा उपमेय के द्योतक इवादि एवं साधारण धर्म की
    सन्निधि रहती है। दूसरी स्थिति वह है जहाँ उपमानोपमेयभाव निलीन
    (या अभिन्न) रहता है तथा जिसके कारण उपमानोपमेय एक कर दिये
    जाते हैं (या उनमें अभेद हो जाता है) तब यहाँ रूपक अलंकार का व्यवहार
    होता है। ऐसे स्थल पर पदार्थ को बतलाने के लिये प्रयुज्यमान शब्द इवाद्यर्थ को
    गर्भित कर लेता सा प्रतीत होता है, यह न्यायसिद्ध (सिद्धान्त) है।
    तीसरी है वह जहाँ कहीं पर तो धर्मियों के एक प्रघट्टक में रहने के
    सामर्थ्य या बल के कारण उपमा की गति होती है या उपमा का बोध होता
    है। जैसे—दीपक अलङ्कार में। यह भिन्न विचित्रताओं का उपलक्षण मात्र
    है अर्थात् ऐसी अनेक विचित्रताएँ होती हैं।
    श्री भट्ट तोत का मत है कि लक्षण के बल से अलङ्कारों में विलक्षणता
    या वैचित्र्य (का आना) होता है। जैसे पूर्ववर्णित लक्षणों में गुणानुवाद
    नामक लक्षण के योग से प्रशंसोपमालङ्कार होता है, अतिशय के योग से
    अतिशयोक्ति, मनोरथ के योग से अप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसाय के योग
    से अपह्नुति तथा सिद्धि के योग से तुल्ययोगिता होती है। इसी प्रकार
    अनेक विलक्षणताओं की उत्प्रेक्षा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त पारस्परिक
    विचित्रताओं से भी इनके अनन्त प्रकार हो जाते हैं। जैसे प्रतिषेध एवं मनोरथ के

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७७
मिश्रण से आक्षेप बनता है। यह समग्र अलंकार वर्ग उपमा का ही प्रपञ्च होता
है, ऐसा भी विद्वज्जन मानते हैं।
४४. अब उपमा का लक्षण करते हैं—'यत् किञ्चित्' इत्यादि से।
काव्यबन्धेषु—काव्यप्रबन्धों में। काव्यलक्षणों के रहने पर यहाँ यह दिखलाया
कि 'गौरिव गवयः' में उपमा नहीं है। यहाँ बन्ध का अर्थ है गुम्फ,
भणिति एवं कवि व्यापार। लक्षण अलंकार शून्य होता है किन्तु निरर्थक
नहीं (इस विषय में उदाहरणों से दिखलाया जा चुका है) परन्तु गुण
शून्य काव्य नहीं होता। काव्य में गुणों का अहेयत्व दिखलाने के लिये ही
प्रसादादि में गुण शब्द को योजित कर व्यवहार रखा जाता है, क्योंकि उनके
बिना काव्यरूपता सम्भव ही नहीं। सुन्दरास्पद तो लक्षण रूप शरीर है ही
जिसे पूर्व में कहा जा चुका है। उपमादि के बिना काव्य होता है इसे बतलाने के
लिये उपमादि में अलंकार का व्यवहार दिखलाया है। अतः स्पष्ट है कि
लोकवत् यहाँ काव्य में अलङ्कारों की पृथक् सिद्धि नहीं है। इसके अतिरिक्त
दण्डी ने 'काव्य के शोभाधायक धर्म' को अलङ्कार कहा है भी।
४५-४८. अब उपमा के उदाहरणों को क्रमशः दिखलाते हैं—'एकस्येति'
इत्यादि से। इसमें उपमा के लक्षण की योजना को 'तुल्यं ते' इत्यादि से
दिखलाते हैं।
४६-५१. उपमान एवं उपमेय की संख्या के भेद से उपमा के प्रभेदों को
दिखला कर अब तद्गत शरीर के भेदों को 'प्रशंसा चैव' इत्यादि से दिखलाते
हैं। उपमान के प्राशस्त्य से प्रशंसोपमा होती है तथा उपमान की निन्दनीयता
से निन्दोपमा। यही आगे भी समझना चाहिए।
५२-५३. इसी प्रकार सदृश के साथ सदृश कल्पित हो तो 'कल्पिता'।
उदाहरण में जंगम पर्वतों की उपमानत्वेन कल्पना की गयी है क्योंकि अन्य
से सादृश्य नहीं बनता। अन्य आचार्य सदृशी के स्थान पर कल्पितासदृशी
पद में अकार का प्रश्लेष मान कर असदृशी पाठ मान कर उसकी व्याख्या
करते हैं कि यहाँ सदृश पद उपमेय को भी बतलाता है।
५४. जहाँ सादृश्य का गमक कोई स्फुट पद नहीं हो तथा न ही
सर्वात्मना रूपक की तरह वस्तुद्वय का मीलन ही अतः समास से व्यक्त या
निर्मित उपमा को किञ्चित्सदृशी कहा गया है तथा उदाहरण है—'सम्पूर्ण
चन्द्रवदना' इत्यादि।
५५. इसकी अन्य मत से व्याख्या है—इस ग्रन्थ में जिन्हें नहीं बतलाया
उन्हें लोक या काव्य से ग्रहण किया जाए।

४७८ नाट्यशास्त्र
५६-५७ दीपक :-अब 'नानाधिकरणानाम्' इत्यादि से 'दीपक'
अलङ्कार बतलाते हैं। नाना जो वाक्यरूप या पदरूप भिन्न-भिन्न शब्द हैं
उनके अधिकरण में अर्थात् जिनकी वे साकांक्ष शब्द तथा उनका सम्यक् जो
दीपक है अर्थात् आकांक्षापूरक गुण या जात्यादि जहाँ हो वह दीपक है।
क्योंकि एक अवान्तर वाक्य के द्वारा असंयुक्त वाक्य भी संयुक्त की
तरह कर दिया जाता है अतः देहली में जलाया हुआ दीपक जैसे बाहर
और अन्दर प्रकाश करता है वैसा ही दीपक प्रकृति होने से यह 'दीपक'
अलङ्कार है।
५८. रूपक- अब रूपक अलङ्कार को बतलाते हैं 'स्वविकल्पेन' इत्यादि
से। अपने विकल्प अर्थात् विशिष्ट कल्पना से वदन को चन्द्र रूप में रूपित करना
अर्थात् दूसरे को अपने रूप से युक्त करना ही 'रूपक' है। यह दो प्रकार से
होता है। एक वह—जहाँ तुल्य अवयव वाले अवयवियों को अन्य के रूप से
युक्त करना तथा दूसरा किञ्चित् सादृश्य से युक्त रूप वाले बनाना। यहाँ
कुछ एक दूसरे के रूप के सदृश रूप से युक्त अर्थात् रूपान्तर के द्वारा रूपित
करना होता है तथा ऐसे स्थल पर एकदेशविवर्ति नामक द्रव्यादि रूपक
हो जाता है यह प्रसिद्ध है।
अन्य 'नानाद्रव्यादि' के अनुसार रूपक का पाठ लेते हैं। तदनुसार यह
रूपक शब्द के अनुगत अर्थत्व का आख्यान करता है। इसमें औपम्य का गुण
(गौण) रूप से अर्थात् अप्रधान रूप से संश्रयण करता है। इसके कारण
रूप की जो किसी अन्य के रूप से निश्चय पूर्वक वर्णना है वही 'रूपक' है।
५६. यहाँ (पद्माननस्ताः में) "हंसकुलैः" में अरूपित भी नर्मसचिवत्व
व्यक्त होता है। इतना अंश 'यदि वा किञ्चिद्' के अनुसार द्वितीय भेद का
उदाहरण है। यहाँ 'अन्योन्यमिव' पाठ ठीक नहीं है क्योंकि इव घटित
पाठ में उपमा या उत्प्रेक्षा की आशंका होगी अतः 'अन्योन्यमिह' ऐसा पाठ
उपयुक्त है।
६०. यमक :—यहाँ शब्दाभ्यास में शब्द पद से वाक्य, पद, पदैकदेश
तथा वर्ण सभी का ग्रहण होता है। फलतः लाटानुप्रास आदि का भी इसी
से ग्रहण समझ लिया जाना चाहिए। 'यम' उसे कहते हैं जहाँ दो बालक
एक साथ (एक जैसे भी) उत्पन्न हों अतः तत्प्रकृतिक या उसी स्वभाव के
कारण इसे 'यमक' कहा जाता है। यह वाक्य, पद एवं वर्ण के सदृश सान्तर
या निरन्तर (रूप) में प्रयुक्त हुआ द्वितीय वाक्य, पद एवं वर्ण शोभा का
आधायक हो जाने से अलङ्कार बन जाता है। पादादि में विकल्प कहने से
मध्य एवं अन्त में स्थापन का नियम नहीं है अर्थात् इस विकल्प से लाटानुप्रास

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७९

का भी संग्रह कर लिया गया है । विशेष दर्शन का अर्थ है उद्देश्य एवं लक्षणों
का दर्शन ।
६१-६३. अक्षर पद से एक अक्षर तथा अनेक अक्षरों को लिया जाता है ।
६५. संहृत :- संहृत है रश्मियों का मण्डल अर्थात् समुदाय या ओघ
जिसका । तपनीयमण्डल पद का अर्थ है सौवर्णचक्र ।
६७. जनीनाम् = युवतियों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली । रामा पद सभी
स्त्रियों का वाचक है । 'यामं यामं' यहाँ वीप्सा से सभी प्रहरों का ग्रहण किया
गया है । पुष्प खिल रहे हैं और भौंरे उन पर मंडरा रहे हैं जिन्हें देखकर
ये हँसती हैं तथा पुष्पों के खिलने पर भी जब भौंरे नहीं आकर मंडराते तो
विस्मय करती हैं ।
६६. प्रवरक अर्थात् श्रेष्ठ है आनन जिसका ऐसा हाथी । इसी प्रकार
केतकी के पुष्प ही पीले दाँत जिसके हैं ऐसे हस्ति से युक्त प्रवर = श्रेष्ठ कानन
= अरण्य शोभित हो रहा है ।
७१. द्विशृंग = जिसके दो शिखर हों या दो उन्नत दाँतों की विशिष्टता
से युक्त या दाँतों की विकलता या राहित्य से युक्त जिसके शिखर हैं ।
७४. सञ्चिताः = युद्ध में एकत्र हो गये हैं । अनुपुङ्गैः - पुङ्ख तक मग्न
होने वाले । चित = व्याप्त । अन्य प्रकार से अर्थ में जैसे निहतास्तलैः को
यदि निहतों के अस्त मरण को ला प्रदान करते हैं ऐसा हो तो यह क्लिष्ट
कल्पना है ।
८२. यह शरद् ऋतु वारण पुष्पों के विकास का समय है । इसी प्रकार
वारण = हाथियों के अनामय अर्थात् स्वस्थ रहने का यही समय है । वारणों=
शत्रुओं का यह काल = मृत्यु होता है । रणों = युद्धों का कालक्षेप अर्थात्
समय का बिताना या चिन्ता का प्रवर्तक है ।
८६. लक्षणों की प्रमुखता को संकेतित करते हुए उपसंहार करते हैं—
'एभिरर्थे' इत्यादि से । अर्थक्रियायुक्तैः = अर्थ की क्रिया में रस-चर्वणा में
युक्त योग है जिनका ऐसे । यह दोष विवरण कई प्राचीन पुस्तकों के
अध्यायान्त में मिलता है फिर भी यही सर्वत्र मिलने के कारण इसकी
व्याख्या की गयी । अतः परमपद से वक्तव्यान्तर संकेतित किया गया है ।
अतः अब दोष का ही आगे विवरण देगें ।
८७-८८. गूढ़ार्थ आदि ।—"पर्याय" इति । पद, वाक्य या अर्थ को
पर्याय शब्द से कहना 'गूढ़ार्थ' दोष है । वास्तव में यदृच्छा शब्द या द्रव्य
शब्दों को पर्याय वाचक नहीं बनाया जाता अतः दोष है ।

४८० नाट्यशास्त्र
६३. जहाँ दो वर्णों या पदों में नैरन्तर्य है अर्थात् अव्यवधान है, जहाँ
विचार या सम्बन्ध है तथा जहाँ अन्य का अन्य में लय होता है । इस प्रकार
सन्धान या सन्धि तीन प्रकार से होती है । जहाँ शब्द अयुक्त या युक्तिरहित
अथवा पारुष्य का उद्भावक हो जाए तो 'विसन्धि' दोष हो जाएगा । यह
दोष व्याकरणशास्त्र के अनुसार लागू होगा । ये दोष उत्तरोत्तर स्थूल हैं तथा
कभी कभी गुण भी हो जाते हैं । (द्रष्टव्य ना० शा० द्वितीय भाग टिप्पणी
पृ० ३००) ।
६४. अब गुणों के विषय में प्रतिज्ञा करते हैं—'गुणाः विपर्ययाद्'
इत्यादि से । इसका आशय है कि दोषों के विघात में ही गुण होते हैं। यहाँ
यह प्रश्न हो सकता है कि दोषों के विपर्यय में गुण सामान्यतः होते हैं या
विशेष रूप से । इसका उत्तर यही है कि ये विशेष प्रकार से ही होते हैं,
सामान्यतः नहीं। भरत के इस विचार का समर्थन उत्तरवर्ती आचार्यों ने
भी किया जिसका संकेत मात्र नाट्यशास्त्र में था । इस मान्यता का विकास
विपर्यय या दोषों की अनित्यता में हो गया । दोषाभाव होने पर निर्दुष्टः
काव्य सौन्दर्य का आविर्भाव होता है । आगे भोज तथा मम्मट और हेमचन्द्र
जैसे आचार्यों ने दोषहान तथा अदोषता शब्दों से इसी तथ्य को अधिक स्पष्टता
प्रदान की क्योंकि दस दोष दस गुणों के विपर्यय मात्र नहीं होते हैं ।
१०६. काव्यगुणों का लक्षण सहित विवरण भी भरत ने सर्वप्रथम दिया है
परन्तु यह सभी पूर्व लक्ष्य लक्षणादि के आधार पर है यह स्पष्ट है। इस दृष्टि से
बाल्मीकिरामायण, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा जैनागम उपजीव्य
ग्रन्थ विशेषरूप से उल्लेख योग्य हैं। रामायण में रामकथा के सन्दर्भ में उदार
मधुर तथा असन्दिग्ध, अविस्तर, संस्कारक्रमसम्पन्न तथा हृदयहारी
गुणों का विशेषण के रूप में उल्लेख था । इसी प्रकार महाभारत में विचित्र-
पदत्व श्रुतिसुख, मधुर और अर्थवत् आदि गुणों का उल्लेख है । अर्थशास्त्र
में अर्थक्रम, सम्बन्ध, परिपूर्णता, माधुरी, उदारता तथा स्पष्टत्व जैसे गुणों
का वर्णन मिलता है । औदार्य तथा माधुर्य गुणों की स्थिति भरत के अनुरूप
है । जैनागम के अनुयोगद्वार सूत्र में निर्दोष, सारवत् हेतुमत्, अलंकृत, उपनीत,
सोपचार, मित, तथा मधुर—ये आठ गुण दिखलाये । गये हैं अन्य जैनागम
रायप्रसेणीयसुत्त में (राजप्रश्नीय) में सत्यवचन के पैंतीस अवशेषों में संस्कार-
वत्व, उदात्तत्व, उपचारोपेतत्व जैसे शब्दगुण तथा महार्थ, अव्याहत, पौर्वापर्य,
असन्दिग्ध, देशकालयुक्त, अतिस्निग्धमधुर, उदार तथा ओजस्वी अर्थ गुण हैं
जिनकी भरत के गुणों से भावनामूलक समानता प्राप्त होती है ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१
भरत मुनि के निरूपित गुणों के विवरण से स्पष्ट है कि उनकी चिन्तनधारा
काव्यएवं नाट्योन्मुखी थी तथा शब्द एवं अर्थगत गुणों की अस्पष्ट रेखा भी इनके
लक्षणों में प्राप्त रही । इनमें सौकुमार्य तथा अर्थव्यक्ति के लक्षण में प्रयोज्य
तथा प्रयोग का उल्लेख नाट्योन्मुखी तथा समता, श्लेष एवं उदारता जैसे गुणों
काव्योन्मुखी प्रवृत्ति को स्पष्ट निर्दर्शित करता है । इनके दस गुणों में कुछ
अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक हैं । यद्यपि भरत ने गुणों की कोई विभाजक
रेखा नहीं दी है परन्तु उसका ऐसा वर्गीकरण लक्षणों को लेकर सरलता से
किया जा सकता है ।
भरत के उत्तरवर्ती काल में आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा
स्वीकारते हुए गुण को उसके अंग के रूप में प्रतिपादित किया तथा आचार्य
आनन्दवर्द्धन ने रस को काव्य ( नाट्य ) की आत्मा मानकर रसाश्रित गुण
का सिद्धान्त दिखलाया ।
वामन के अनुसार गुण शब्दार्थमय काव्यशरीर के अविनाभूत अंग हैं
जिनके बिना काव्य की शोभा की कल्पना नहीं की जा सकती । अतः काव्य-
रचना के लिये गुण सर्वस्व तुल्य ही हैं । आचार्य वामन ने भरतोक्त दस गुणों
के स्थान पर शब्द तथा अर्थगत बीस गुणों को निरूपित किया । दस शब्द गुण
तथा दस अर्थगुण । भोज ने वामन का ही अनुसरण कर कुछ परिवर्धन कर
चौबीस गुणों को दिखलाया । जयदेव ने चन्द्रालोक में वामनप्रवर्तित गुणों का
ही अनुसरण किया ।
गुणसिद्धान्त की अन्य धारा में आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रवर्तित परम्परा
अधिक युक्ति सम्मत तथा व्यावहारिक रही । इसका प्रवर्त्तन आचार्य आनन्द-
वर्धन नेकिया अवश्य किन्तु संवर्द्धन एवं परिवर्द्धन आचार्य मम्मट एवं विश्वनाथ
महापात्र जैसे आचार्यों ने किया था । इसमें रस रूप काव्यात्मा के ओज, प्रसाद
तथा माधुर्य नित्य धर्म हैं तथा अलंकार अनित्य धर्म माने गये तथा गुण दस या
बीस नहीं तीन ही हैं तथा इन्हीं तीन गुणों में शेष गुणों का अन्तर्भाव होता है
तथा कुछ गुणदोषा भाव रूप हैं । आनन्दवर्द्धन की दृष्टि में आत्मा कीशूरता जैसे
नित्य धर्मों की तरह ओज आदि गुण नित्य धर्म हैं तथा अलंकार कटक-केयूरों
की तरह अंगों के माध्यम से आत्मरूप रस के उपकारक । इसी विचारसरणि के
प्रकाश में मम्मट ने काव्य के लक्षण में अनलंकृत काव्य को भी काव्य मानने
का विचार रखा तथा विश्वनाथ भी इसी मत को स्वीकार करते थे ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आनन्दवर्धन ने भरत के रससिद्धान्त को पुनः
नवीन रूप प्रदान किया था। आनन्दवर्धन की मान्यता में तीन गुणों में सभी का
३१ ना० शा० द्वि०

४८२ नाट्यशास्त्र
अन्तर्भाव करने की प्रवृत्ति का आधार कदाचित् भामह का गुणनिरूपण रहा था
जिसके स्रोत का ज्ञान नहीं होता न और संकेत ही मिलता है । परन्तु इतना स्पष्ट
है कि भरत के द्वारा किया गया दोषाभावरूप गुण का संकेत गुणों की संख्या
को कम करने के विचार के लिये पर्याप्त आधार बन गया । बात भी ठीक है
कि गुण दोषाभावरूप होते हैं और हैं भी परन्तु तीन गुणों की कल्पना एक
विशिष्ट विचार धारा के साथ आयी थी जो गुण के विकास क्रम में आज भी
ज्योति स्तम्भ सी दीपित है, यह स्पष्ट है ।
१०७. जहाँ तनुवाही ( सूक्ष्म वाही ) चित्त का परिस्पन्द नहीं रहे तो
वहाँ वीर आदि में उपमा एवं रूपक जैसे अलंकारों में लघु अक्षर प्रधान 'वृत्त'
रहते हैं ।
११८. औदार्य अर्थगुण है जो प्रधानतया दीप्त रसों में रहता है । यह
शब्द गुण भी है अतः दीप्तत्व के प्रकाशक वर्णों में स्थित रहता है । उसी का
अनुयायी माधुर्य गुण है । ये गुण अपने अनुगत ( अनुयायी ) गुणों से अनुस्यूत
मसृण रसों में स्थित रहते हैं ।
११६. अर्थगुण योग्यता का अतिक्रमण किये बिना सर्वत्र रहते हैं । इसे
ही 'प्रमदाभिधेयान्' पद से कहा गया है । प्रमद अर्थात् हर्ष या हर्ष को उत्पन्न
करने वाला सकल गुणों से समन्वित अभिधेय अर्थ जिन शब्दों का हो वे उदार
एवं मधुर शब्द ही हैं ।
१२१. ललित सुकुमार जो प्रयोग हैं वे ही नटों के द्वारा प्रयुक्त होने योग्य
हैं इस तथ्य को दिखलाया है—'मृदुललित' इत्यादि से मुनि ने ।

सप्तदश-अध्याय अनुबन्ध
१-४. शब्दों का शब्दों के साथ, अर्थों का अर्थों के साथ तथा शब्दों का
अर्थों के साथ विचित्र संघटन करवाने वाली अभिधा विशिष्टा उक्ति ही
निर्माण धुरा पर आरूढ़ करवाने पर 'लक्षण' बन जाती है । इसलिये लक्षण
ही प्रधान है तथा गुण एवं अलङ्कार उसी के प्रसंग से प्राप्त होते हैं, यह बात
लक्षणों के स्वरूप तथा व्याख्यान से स्पष्ट है । अब उद्देश्य कथनार्थ—
‘विभूषणम्’ इत्यादि ४ पद्य कहते हैं । तदनुसार जो विभाव, अनुभाव तथा
व्यभिचारियों के वाचक शब्द हैं तथा जो उनके अर्थ हैं वे स्थायी भाव को
रस रूप में परिणत करने रूप प्रयोजनान्तर को प्राप्त करते हैं तथा अभिधा
व्यापार से उपसंक्रान्त होने वालेजो उद्यानादि अर्थ हैं वे लक्षण है । इसीलिये
उनका काव्य में सम्यक् प्रयोग अभीष्ट है ।
५. विभूषण :— इन लक्षणों में प्रथम विभूषण का लक्षण बतलाते है—
अलङ्कारै ‘इत्यादि से । कंकण जैसे अलंकार को पृथक् कर किस स्थान पर,
किस समय, किस दशा में किस पुरुष को धारण करना चाहिए ऐसा विचार कर
धारण किये गये अलंकार तथा गुण के द्वारा जो अलंकरण हो वह 'भूषण'
नामक लक्षण होगा । इसके विन्यास में कवि का व्यापार होता है और कवि
के द्वारा शब्द और अर्थ का ( भी ) व्यापार ( होता ) है ।
स्थान में निवेश का उदाहरण है—‘लीनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवान्त-
र्निखातेव च प्रोत्कीर्णेव च वज्रलेपघटितेव ( माल० मा० ) इत्यादि । प्रस्तुत
पद्य में विप्रलम्भ की अवस्थाओं को माधुर्य, प्रसाद आदि गुणों से युक्त काव्य
में रखा गया है । यह विप्रलम्भ समस्त अलङ्कारवर्ग का अनुग्राहक कवि
व्यापार रूप है, और इसी के कारण शब्द एवं अर्थ के व्यापार को स्पर्श करने
वाला यह 'विभूषण' लक्षण हो रहा है ।
६. अक्षरसंहति :— अब अक्षरसंहति को दिखलाते हैं—‘यत्रालपैरक्षरै,’
इत्यादि से । यहाँ अक्षर शब्द से यदृच्छा शब्दों की प्रमुखता बतलाई गयी है
क्योंकि यदृच्छाशब्दों में स्वरूप को ही प्रवृत्ति निमित्त माना गया है । अतः श्लेष
युक्त स्वल्प अक्षरों के द्वारा प्रवृत्तिनिमित्त स्वरूप से उपलक्षित होने के कारण
विचित्र अतएव प्रकृत रस के योग्य विभावादि भाव को प्राप्त होने वाले अर्थ का

४८४ नाट्यशास्त्र
वर्णन किया जाता है । वह जिस अर्थ के विषय में श्रोताओं के हृदयों में
उपसंक्रांत करने के लिये कविगण का व्यापार होता है वह अक्षरसंघात
ही उस व्यापार के करने में कारण ( बनता ) है । अतः अक्षरों का
संघात ही इसमें प्रधान है । इनमें यदृच्छा शब्द की प्रधानता का यह
उदाहरण है :—
विस्तम्भादुत्तमाङ्गं प्लवगबलपतेः पादमक्षस्य हन्तुः
कृत्वोत्सङ्गे सलीलं त्वचि कनकमृगस्याङ्कमाधाय शेषम् ।
वाणं रक्षःकुलघ्नं प्रगुणितमनुजेनादरात्तीक्षणमक्ष्णोः
कोणोनोद्वीक्ष्यमाणस्त्वदनुजवदने दत्तकर्णोऽयमास्ते ॥
[ वानर सेनापति सुग्रीव के उत्सङ्ग में विश्वास पूर्वक अपने मस्तक को,
अक्षहन्ता हनुमान के उत्सङ्ग में चरण को तथा कनकमृग की त्वचा पर शेष
अंगों को स्थापित कर राक्षसों के विनाश करने के लिये अनुज लक्ष्मण के द्वारा
प्रगुणित तीक्ष्य बाणों को आँखों के कोने से देखते हुए तथा हे रावण, तुम्हारे
बन्धु विभीषण के मुख की ओर अपने कानों को लगा कर ये ( यहाँ )
श्रीरामचन्द्र विद्यमान हैं । ]
यहाँ अलङ्कारों की योजना के बिना ही ( शब्द की योजना की प्रमुखता
के कारण से ) जो अर्थों की सुन्दरता है वह 'अक्षरसंहति' है ।
७. शोभा :—अब शोभा को कहते है—'सिद्धेरर्थै' इत्यादि से ।
जैसे—मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः
सत्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः ।
उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिद्ध्यन्ति लक्ष्ये चले
मिथ्या हि व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग् विनोदः कुत ॥ (अभि०२।५)
[ इसमें मेद के कम हो जाने के कारण उदर कृश हो जाता है इसलिये
शरीर हलका और उठने योग्य हो जाता है । प्राणियों के भी भय एवं क्रोध
की स्थिति में रहने वाले चित्त के भाव दिखलाई पड़ते हैं और फिर यह तो
धनुर्धारियों का उत्कर्ष माना जाता है कि उनके निशाने चल लक्ष्य पर भी
ठीक बैठ जाएँ । अतः ऐसी लाभदायक मृगया को व्यर्थ ही लोग व्यसन कहते है
क्योंकि इतना विनोद अन्यत्र कहाँ प्राप्त हो सकता है । ]
यहाँ मृगया रूप अर्थ का अविकल निरूपण किया गया है जिससे यहाँ
जो अनुचित या अप्रसिद्ध अर्थ हैं वे ही उचित एवं विचित्र प्रतीत होते हैं ।
यहाँ अशोभन अर्थ भी इस प्रकार शोभित होने से 'शोभा' नामक लक्षण है ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८५
७. अभिमान :—'धार्यमाणस्तु' इत्यादि से 'अभिमान' बतलाते हैं ।
जैसे :—शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं
सम्प्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससन्धुक्षिताः ।
किं प्राणान् न हरन्त्युत प्रियतमा-संजल्पमन्त्राक्षरैः
वार्यन्ते किमु यद्विमोहविवशात् सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥
[ यदि चन्द्र की किरणें अमृतमयी हैं तो फिर ये मेरे मन को अतिशय
क्यों सन्तप्त कर रही हैं। यदि कहें कि ये किरणें कालकूट विष के साथ वास
करने से विषाक्त हो गयी है तो फिर ये प्राणों का हरण क्यों नहीं करतीं । ये
प्राणों को हर लेती पर प्रिया के संभाषण रूप मन्त्राक्षरों से इस विष के प्रभाव
को निवारण कर दिया गया है और जब ऐसा हो तो फिर से विष के प्रभाव
से जन्य मोह के कारण सन्तापमयी स्थिति क्यों बना रहीं हैं । ]
यहाँ एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ की योजना ( घटना ) इस प्रकार रखी
गई है जिसमें फल की योजनाओं से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में
अवस्थित नहीं हो पाता है वहीं पर बँध जाता है । इस प्रकार अर्थ अलौकिक
होने से विलक्षण एवं उपेय है । अतः यह अभिभान नामक लक्षण है ।
६. गुणकीर्तन :—अब गुणकीर्तन का स्वरूप—'कीर्त्यमानै' इत्यादि से
दिखलाते हैं । जैसे:—
पृथुरसि गुणैः मूर्त्या रामो नलो भरतो भवान्
महति समरे शत्रुघ्नस्त्वं तथा जनकः स्थितौ ।
इति सुचरितैर्मूत्तिं बिभ्रच्चिरन्तनभूपतां
कथमसि न मान्धाता देवस्त्रिलोकविजय्यपि ॥
[ हे राजन् , आप गुणों से पृथु या विशाल गुणशाली हैं, मूर्ति या आकार
से आप श्रीराम, नल तथा भरत हैं, युद्ध में शत्रुओं के संहर्ता शत्रुघ्न हैं तथा
पालन करने में आप जनक हैं । इस प्रकार उत्तम चरित्रों में चिरन्तन राजगण
के स्वरूप को धारण करते हुए भी आप त्रिलोकजयी मान्धाता क्यों नहीं
( अर्थात् मुझे पालित करने वाले ) हो रहे हैं । ( अवश्य होंगें ) ]
यहाँ गुणों के उल्लेख द्वारा प्रकृत की चारुता से 'गुणकीर्तन' नामक
लक्षण है । यहाँ यद्यपि श्लेष भी अनुग्राहक के रूप में उपस्थित है परन्तु
लक्षण अलङ्कारों में भी वैचित्र्याधायक होता है ( अतः प्रमुख यहाँ लक्षण
( ही ) है । )
१०. प्रोत्साहन :—अब 'प्रोत्साहन' को—'उत्साहजननै' इत्यादि से

४८६ नाट्यशास्त्र
बतलाते हैं। औपम्य का अर्थात् उपमा का जहाँ संश्रय अर्थात् यत्नपूर्वक
अन्वेषण हो ऐसे। जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
हरवृषभ तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसूतिरेका।
निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ॥
[ हे नन्दीश्वर, संसार में एक मात्र असदृश एवं तुम्हारे सदृश जन को
प्रसव करनेवाली तुम्हारे जैसी ही माता की जय हो। जिसका अन्वेषण कर
परमेश शिव भी अपने पुत्रों एवं गणों को साथ लेकर अपनी सहधर्मिणी के
साथ प्रसन्नता से निवास कर रहे हैं । ]
यद्यपि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी है तथापि वैचित्र्य यहाँ लक्षण
का ही है। इसे ही अन्यत्र पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति कहा गया है।
११. उदाहरण :—अब उदाहरण को—‘यत्रैकस्यापि’ इत्यादि से
कहते हैं।
जैसे :—वल्मीकात् किमुतोद्धृतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं
त्रैलोक्यं तपसा जितं यदि सखे दोष्णा किमेतावता ।
सवं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत्
त्वद्दन्ताङ्कितवालि-कक्षरुधिरक्लिन्नाग्रपुङ्खं शरम् ॥
[ यह वल्मीक से उखाड़ा हुआ पर्वत है यह बात किस के मन को स्पर्श
करेगी अर्थात् इसे कौन स्वीकार कर सकेगा। परन्तु हे मित्र, तुमने तप के
द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर त्रैलोक्य को जीता तो इससे क्या हो गया।
हाँ, ये सभी तभी साधु या ठीक होगी जब तुम विरह से क्षीणगात्र वाले
श्रीराम के उस शर को सह सको जिसके पुंख का अग्रभाग तुम्हारे दांतों
के घाव से अङ्कित बालि की कोख के रुधिर से आर्द्र हो गया है । ]
यहाँ बालि के कक्ष के रावण के द्वारा काटने पर उसकी प्रतीकार करने
की असमर्थता को दिखला कर फिर भी घमण्ड रखने की उसी की स्वकीय
प्रकृति का ध्वनन होता है। यहाँ तुम्हारे दांतों से इस रूप में उसके धिक्कार
का कथन करने से ‘उदाहरण’ है।
१२. निरुक्त :—निरुक्त दो प्रकार का होता है। एक सिद्धि अर्थात् जिसे
लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाए वह तथ्य तथा जो लक्षण से सिद्ध
न हो वह अतथ्य। इसका उदाहरण अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
वीरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत् सत्यपथं कथञ्चित् ।
स चार्जुनः सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा ॥

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८७
[ वीरजन के लिये उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने अपने
उद्बोधन से सत्यपथ पर पहुँचा दिया वह पहुँचाने वाला तो कृष्ण ( काला )
और पहुँचने वाला अर्जुन (शुक्ल) है ऐसी यह सभी प्रसिद्धि वितथ ( मिथ्या )
ही समझना चाहिए । ]
यहाँ कृष्ण तथा अर्जुन के नामों से परस्पर अन्यत्र स्थल में सत्यता तथा
अपने विषय में उनमें असत्यता है। यहाँ अर्थश्लेष नहीं हो सकता क्योंकि
वह तुल्यसंख्या के पदार्थ में रहता है जब कि यहाँ एक का दूसरे में संकेत
किया गया है। अर्थात् जो मूढ़ हो उसे कृष्ण ( या काला ) होना चाहिए
किन्तु यहाँ वह अर्जुन है तथा जिसने सत्पथ पर पहुँचाया उसे अर्जुन होना
चाहिए किन्तु वह कृष्ण है। इस प्रकार एक ही में दोनों का व्यवहार हो रहा
है ( यह तथ्य और अतथ्यभूत 'निरुक्त' है ) ।
१३. गुणानुवाद :—गुणों का अनुवाद अर्थात् अनुकथन करना । परिमित
या परिच्छिन्न वस्तु की आपादित या कल्पित उत्कृष्ट गुण से उपमा के द्वारा
जो गुणों का उत्सेक हो वही 'गुणानुवाद' । जैसे:—
'पालिता द्यौरिवेन्द्रेण त्वया राजन् वसुन्धरा ।'
[ हे राजन्, जैसे इन्द्र ने स्वर्ग का पालन किया था वैसा ही आपने
इस पृथ्वी का पालन किया ] यहाँ एक पृथ्वी पर स्थित मनुष्य राजा की
इन्द्र से तुलना कर उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया गया है ।
अतिशय :—उत्तम अर्थ अर्थात् कहे गये अर्थ से जो विशेष अर्थ है । जैसे
भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
यावन्त्येव पदान्यलीकपिशुनैरालीजनेः शिक्षिता
तावन्त्येव कृतागसो दुततरं व्याहृत्य पत्युः पुरः ।
प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा वर्तितुं
प्रेम्णो मौग्ध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः ॥
[ उस मुग्धा को झूठी चुगली लगाने नाली उसकी सखियों ने जितने अक्षर
( या वाक्य ) सिखलाये उतने ही अक्षरों को उसने ( अविवेकवश ) अपने
अपराधी पति के सम्मुख वैसे ही कह दिया तथा फिर काम की भावना के
अनुरूप रति भी की । यह तो भोलेपन से अधिक सुन्दर बन पड़ने वाले प्रेम
का एक विलक्षण एवं सहज सुन्दर ( एवं अतिरिक्त ) प्रक्रम हो गया । ]
यहाँ पर प्रेम में ईर्ष्यात्मा अर्थ जो हो सकता है उससे विशेष बात कही
गयी है तथा प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भी सुन्दरता से देखने योग्य

४८८ नाट्यशास्त्र
रखा गया है अतः यहाँ 'अतिशय' है, क्योंकि यहाँ अर्थ सम्भाव्यमान है अतः
यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार नहीं है ।
१४. हेतु :—अब हेतु या सहेतु को बतलाते हैं—'बहूनाम्' इत्यादि
के द्वारा । अनेक बोलने वालों का अनादर कर किसी एक असाधारण अर्थ
के निर्णय का कर्तव्य रूप में अवलम्बन कर सिद्ध प्रमाणभूत उपमान का
प्रक्षेप या कथन हो (अर्थात् मुझे ऐसा प्रतिभात होता है )—तो उसे 'हेतु'
समझना चाहिए । जैसे भट्टेन्दुराज के इस पद्य में—
एके वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं
केचित् पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेऽह्नि चन्द्राचिषाम् ।
मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि प्रत्यक्षतीव्रातपो
मन्येऽहं पुनरध्वनीन-रमणीचेतोऽधिशेते रविः ॥
[ दिन के क्षीण होने पर कुछ कहते हैं कि चन्द्र की किरणों का जलनिधि
में प्रवेश हो जाता है, अन्य कहते हैं कि इसका अग्नि ( में प्रवेश या )
योग होता है किन्तु हे सखि, ये सभी बाते मिथ्या हैं, क्योंकि इनका साक्षी
कोई नहीं है । परन्तु प्रत्यक्ष में जो इसका तीव्र आतप अनुभव किया जा रहा
है उससे मैं तो यह मानती हूँ कि यह पथिक विरहियों के विरह से जलने
वाली विरहिणियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है, चन्द्र नहीं ] ।
यहाँ असाधारण अर्थ का कथन होने से 'हेतु' है ।
१५. सारूप्य :—अनुकरण से उत्पन्न होने से अपदेश जहाँ परोक्ष है तो
'सारूप्य' ।
इसका उदाहरण आचार्य अभिनवगुप्त पाद का यह पद्यः—
सैन्दूरीकृतसान्द्रकुङ्कुमरसप्रच्छायमालोच्यते
यत् प्राच्यां दिशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्द्वन्द्वलेह्यं महः ।
तत्तेजो जरठांशुतां कलयता भाविप्रवासावधि
सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कीर्णो नखाग्राङ्कुरः ॥
[ जो पूर्व दिशा में टेढ़ा तथा दोनों नेत्रों से देखने योग्य सिन्दूर से गाढ़े
कुङ्कुम रस सदृश यह दिखलाई दे रहा है । यह उस तेज की जरठांशुता को
प्रवास की भावी अवधि की सूचना देनेवाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू
के कपोल पर अङ्कित अभिनव नखाग्राङ्कुर है । ]
यहाँ यत् पद से निर्देश्य जो वस्तु है वह परोक्ष है क्योंकि यहाँ तत्त्व का
पूर्ण परिज्ञान नहीं है । आलोच्यते से उसकी छाया मात्र अपदेश्य है । यहाँ
सैन्दूरीकृत इत्यादि से जिसकी दर्शन क्रिया बतलाई वह प्रमाण सहित वस्तु

परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४८९
है अतः यहाँ 'सारूप्य' लक्षण है। यहाँ उपमालङ्कार नहीं है क्योंकि उपमेय
शब्दोपात्त नहीं है पर पूर्वार्ध से उपमेय को सूचित किया जाना अवश्य
मिलता है।
१६. मिथ्याध्यवसाय :-अब मिथ्याध्यवसाय को कहते हैं- अभूतपूर्वैः
इत्यादि से। वास्तविकता से रहित अर्थों के द्वारा तत्तुल्य अवस्तुभूत अर्थान्तर
का वक्ता के व्यापार या बोलने पर निश्चय होना 'मिथ्याध्यवसाय' है। जैसा
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :-
यो दुर्जनाद्वाञ्छितसिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम् ।
जुह्वज्ज्वलाग्नौ विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत् ॥
[ जो दुर्जन से वाञ्छित अर्थ की सिद्धि चाहता है वह अवश्य ही
उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और जलती अग्नि में हवन करते
हुए हठात् ही अर्थ या प्रयोजन रूप षष्ठ विषय को सिद्ध करने का उद्योग
करता है। ]
यहाँ छठी इन्द्रिय के अभाव में उसके विषय की जैसे कोई स्थिति नहीं
उसी प्रकार दुर्जन से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती। यह काव्यलक्षण
है ऐसा कहने का आशय यही है कि काव्य में लोक का विपर्यास थोड़ा या
अधिक होता ( ही ) है। इसे अन्य पाठ में 'विपर्यय' बतलाया गया है।
१७. सिद्धि :- अब सिद्धि बतलाते हैं- 'बहूनाम्' इत्यादि से। अनेक
प्रसिद्ध पदार्थों में से किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं। यह उस अप्रसिद्ध
की असाधारण सम्पत्ति के लिये कहा जाता है। अतएव उसमें जिसका निवेश
कर वैसा कहते है यह सिद्धि का हेतु होने से 'सिद्धि' कहा गया है।
जैसे :-
भद्रेश्वरः सुरसरित् स भवानहञ्च त्रैलोक्यसारमिह सम्प्रति जीवलोके ।
भद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्थिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु ॥
यहाँ आप और मैं-इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के बीच में उपादान-
असाधारण्य को दिखला कर 'सिद्धि' का विधान करता है।
१८. पदोच्चय :-अब पदोच्चय को 'गुणैर्बहुभि.' से कहते हैं। एक
तात्पर्य के विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक शब्दों के वाच्यरूप में स्वीकृत जो
धर्म हैं उनका उपलक्षण कर जो वस्तु का प्रसंशन है वह पदोच्चय। क्योंकि
अर्थों की उपलब्धि काव्य में स्थित पदों से ही होती है। अतः इन पदों का
उच्चय अर्थात् बाहुल्य जहाँ हो वह 'पदोच्चय' है।

४९० नाट्यशास्त्र
जैसे—असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं
निरालोकं लोकं जननयननिर्माणमफलम् ।
अदर्पं कन्दर्पं मरणशरणं बान्धवजनं
जगज्जीर्णारण्यं कथमसि विधातुं व्यवसितः । ( मालतीमाधवे । )
[ संसार को असार, त्रैलोक्य को रत्नरहित, संसार को प्रकाश हीन,
लोकनेत्रों के निर्माणभूत सौंदर्य को निष्फल, काम को दर्प से विकल,
बान्धवों को मरण की शरण लेने वाले तथा जगत् को जीर्ण अरण्य बनाने के
लिये ऐसा व्यवसाय क्यों कर रहे हो ( कि तुम मालती को मेरे ही सम्मुख
समाप्त करना चाहते हो ) ]
यहाँ अवन्तर अर्थों के बोधक अवान्तर वाक्य रूप पदों का तात्पर्य एक ही
है, किन्तु उन पदों का अपना वाच्यार्थ भिन्न-भिन्न है । यहाँ पदोच्चय पद में
पद का अर्थ है पाद या भाग । अन्य आचार्यों के मत में पूर्व से या आरम्भ
से जो अर्थ चलता हो उसी अर्थ का अन्त तक चलना एकार्थ तात्पर्यक होता है
अतः 'पदोच्चय' है ।
१६. आक्रन्द :—अब आक्रन्द को 'आत्मभावम्' इत्यादि से कहते हैं ।
यहाँ एक अर्थ कटु या कठोर रहने से साक्षात् या सीधे नहीं कहा जाता है
इसीलिये ऐसे अर्थ को सादृश्य के द्वारा आरम्भ में रख कर आगे स्फुट कर
प्रतिपाद्य भाव को प्रधानता से रखते हैं, अतः यह 'आक्रन्द' है । जैसे आचार्य
अभिनवगुप्त का यह पद्य :—
किं पान्थ त्वरसे विलोकय निशां या ह्युन्मुखी पाण्डुरा
चन्द्रं चुम्बितुमीहते प्रकटयन्त्यग्रे सरागां स्थितिम् ।
यद्वा नागर-भोगदुर्ललितकैन्र्यंस्तापि न ज्ञायते
ग्रामेऽग्राम्यजनोपभोगसुभगं निर्व्याज रम्यं सुखम् ॥
[—अरे पथिक, तुम क्यों इतनी शीघ्रता कर रहे हो, जरा इस रात्रि
को तो देखो जो उन्मुखी अर्थात् अपने प्रिय की प्रतीक्षा में ऊपर मुंह किये हुए
तथा विरह से पाण्डुर (पीली) हो गयी है तथा जो आरम्भ में ही अपनी राग-
मयी ऐसी स्थिति को दिखला रही है या फिर नागरिक पदार्थों के भोग
दुलारों से उपेक्षित कर दी गयी है जिसे वह नहीं जानती परन्तु यह समझ
रखिये कि इस ग्राम में भी नागरजन के उपभोग की सुभग, निश्छल एवं
रमणीय सुख की स्थिति बन सकती है । ]
यहाँ उत्तरार्ध में संकेतित ग्रामीण भोग को नायिका स्वाभिप्राय के रूप