नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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४७६ नाट्यशास्त्र
- ४३. शरीर कल्प इसी लक्षण के शब्द तथा अर्थ गत अलङ्कारों का
निरूपण करने के लिये उनका नामतः उद्देश्य कथन करते हैं— 'उपमा'
इत्यादि से। काव्य में लक्षण शरीर स्थानीय होता है उसके अर्थभाग में
रहने वाले उपमा आदि तीन अलंकार होते हैं। जैसे हार से रमणी विभूषित
होती है उसी प्रकार जहाँ पृथक् सिद्ध उपमान से प्रकृत वर्णनीय (मुखादि)
को सुन्दर किया जाता हो वे ही अलङ्कार हैं।
प्रश्न—जिस हारादि अलङ्कार से कामिनी की सुन्दरता वृद्धिगत होती है
वह रमणी से पृथक् सिद्ध है पर रमणी भी उससे पृथक् सिद्ध है। परन्तु ये
उपमादि अलङ्कार काव्य से पृथक् सिद्ध नहीं, क्योंकि उनमें शब्द तथा अर्थ—
जो काव्य के शरीरभूत हैं—उन्हें ही किसी भङ्गिमा से कहने पर अलङ्कार बन
जाता है। उत्तर—यह ठीक है परन्तु ये शब्द और अर्थ कवि की बुद्धि में चञ्च-
लता से परिवर्तित होते रहते हैं जिनमें परिवर्तन ही पृथक् है तथा शरीर पृथक्।
(अतः अलङ्कार पृथक् सिद्ध हो ही जाते हैं)।
इस अलङ्कार की स्थिति तीन प्रकार से है। एक स्थिति वह है
जहाँ उपमानोपमेयभाव सम्पूर्ण या स्फुट हो क्योंकि वहाँ (उपमा में)
वर्णनीय उपमान तथा उपमेय के द्योतक इवादि एवं साधारण धर्म की
सन्निधि रहती है। दूसरी स्थिति वह है जहाँ उपमानोपमेयभाव निलीन
(या अभिन्न) रहता है तथा जिसके कारण उपमानोपमेय एक कर दिये
जाते हैं (या उनमें अभेद हो जाता है) तब यहाँ रूपक अलंकार का व्यवहार
होता है। ऐसे स्थल पर पदार्थ को बतलाने के लिये प्रयुज्यमान शब्द इवाद्यर्थ को
गर्भित कर लेता सा प्रतीत होता है, यह न्यायसिद्ध (सिद्धान्त) है।
तीसरी है वह जहाँ कहीं पर तो धर्मियों के एक प्रघट्टक में रहने के
सामर्थ्य या बल के कारण उपमा की गति होती है या उपमा का बोध होता
है। जैसे—दीपक अलङ्कार में। यह भिन्न विचित्रताओं का उपलक्षण मात्र
है अर्थात् ऐसी अनेक विचित्रताएँ होती हैं।
श्री भट्ट तोत का मत है कि लक्षण के बल से अलङ्कारों में विलक्षणता
या वैचित्र्य (का आना) होता है। जैसे पूर्ववर्णित लक्षणों में गुणानुवाद
नामक लक्षण के योग से प्रशंसोपमालङ्कार होता है, अतिशय के योग से
अतिशयोक्ति, मनोरथ के योग से अप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसाय के योग
से अपह्नुति तथा सिद्धि के योग से तुल्ययोगिता होती है। इसी प्रकार
अनेक विलक्षणताओं की उत्प्रेक्षा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त पारस्परिक
विचित्रताओं से भी इनके अनन्त प्रकार हो जाते हैं। जैसे प्रतिषेध एवं मनोरथ के