नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७७
मिश्रण से आक्षेप बनता है। यह समग्र अलंकार वर्ग उपमा का ही प्रपञ्च होता
है, ऐसा भी विद्वज्जन मानते हैं।
४४. अब उपमा का लक्षण करते हैं—'यत् किञ्चित्' इत्यादि से।
काव्यबन्धेषु—काव्यप्रबन्धों में। काव्यलक्षणों के रहने पर यहाँ यह दिखलाया
कि 'गौरिव गवयः' में उपमा नहीं है। यहाँ बन्ध का अर्थ है गुम्फ,
भणिति एवं कवि व्यापार। लक्षण अलंकार शून्य होता है किन्तु निरर्थक
नहीं (इस विषय में उदाहरणों से दिखलाया जा चुका है) परन्तु गुण
शून्य काव्य नहीं होता। काव्य में गुणों का अहेयत्व दिखलाने के लिये ही
प्रसादादि में गुण शब्द को योजित कर व्यवहार रखा जाता है, क्योंकि उनके
बिना काव्यरूपता सम्भव ही नहीं। सुन्दरास्पद तो लक्षण रूप शरीर है ही
जिसे पूर्व में कहा जा चुका है। उपमादि के बिना काव्य होता है इसे बतलाने के
लिये उपमादि में अलंकार का व्यवहार दिखलाया है। अतः स्पष्ट है कि
लोकवत् यहाँ काव्य में अलङ्कारों की पृथक् सिद्धि नहीं है। इसके अतिरिक्त
दण्डी ने 'काव्य के शोभाधायक धर्म' को अलङ्कार कहा है भी।
४५-४८. अब उपमा के उदाहरणों को क्रमशः दिखलाते हैं—'एकस्येति'
इत्यादि से। इसमें उपमा के लक्षण की योजना को 'तुल्यं ते' इत्यादि से
दिखलाते हैं।
४६-५१. उपमान एवं उपमेय की संख्या के भेद से उपमा के प्रभेदों को
दिखला कर अब तद्गत शरीर के भेदों को 'प्रशंसा चैव' इत्यादि से दिखलाते
हैं। उपमान के प्राशस्त्य से प्रशंसोपमा होती है तथा उपमान की निन्दनीयता
से निन्दोपमा। यही आगे भी समझना चाहिए।
५२-५३. इसी प्रकार सदृश के साथ सदृश कल्पित हो तो 'कल्पिता'।
उदाहरण में जंगम पर्वतों की उपमानत्वेन कल्पना की गयी है क्योंकि अन्य
से सादृश्य नहीं बनता। अन्य आचार्य सदृशी के स्थान पर कल्पितासदृशी
पद में अकार का प्रश्लेष मान कर असदृशी पाठ मान कर उसकी व्याख्या
करते हैं कि यहाँ सदृश पद उपमेय को भी बतलाता है।
५४. जहाँ सादृश्य का गमक कोई स्फुट पद नहीं हो तथा न ही
सर्वात्मना रूपक की तरह वस्तुद्वय का मीलन ही अतः समास से व्यक्त या
निर्मित उपमा को किञ्चित्सदृशी कहा गया है तथा उदाहरण है—'सम्पूर्ण
चन्द्रवदना' इत्यादि।
५५. इसकी अन्य मत से व्याख्या है—इस ग्रन्थ में जिन्हें नहीं बतलाया
उन्हें लोक या काव्य से ग्रहण किया जाए।