नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७५
राजा—अरे, जो गुण सहज होते हैं वे अव्यभिचारी भी होते हैं। क्योंकि—
जाना पहिचाना नहीं है ऐसा कह कर या जानकर एक बार नहीं अनेक बार
बहुत दिनों तक प्रयत्नपूर्वक परीक्षा लेने पर यह जातिविशेष या बहुमूल्य
मणि जैसा अपने गुणों से दूने रूप में शोभित हो रहा है।]
४०. अनुक्तसिद्धि :—जैसे तापसवत्सराज में यौगन्धरायण ने अस्थि-
रचित्त वासवदत्ता से कहा—
यौग—कौशाम्बीं परिभूय नः कृपणकैर्विद्वेषिभिः स्वीकृतां
जानास्येव तथा प्रमादपरतां पत्युर्नयद्वेषिणः।
स्त्रीणाञ्च प्रिय-विप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे
वक्तुं नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥
[हम लोगों को दबा कर इन तुच्छ (कृपणक) शत्रुओं ने कौशाम्बी
को ले लिया। इस प्रकार नीति से अनुसार चलने में रुचि न लेने वाले
अपने स्वामी की प्रमादपरता को आप स्वयं ही जानती हैं तथा स्त्रियों का चित्त
सदा ही प्रिय के वियोग में विधुर रहता है। अतएव इस विषय में कुछ भी
कहने में मेरा उत्साह नहीं होता। इसके बाद के कर्तव्य को देवी स्वयं
समझ लें।]
४१. प्रियोक्ति :—जैसे तापसवत्सराज में सप्तम अङ्क में भरतरोहक
वासवदत्ता को वीणा का शिक्षण देने के लिये अर्पण करने की इच्छा से
वत्सराज को देख कर कहता है :—
या शेते कौस्तुभस्य द्युतिकिसलयिते शारदव्योमनीले
विष्णोर्वक्षस्युदारे रजनिकरकराकारहारोपहारे।
साभ्येत्यालिङ्गत्तु त्वां प्रशिथिलगलितेनोत्तरीयेण लक्ष्मी-
र्हर्षादापीडयन्ती नवकमलरजोरोचनाभ्यां स्तनाभ्याम् ॥
[जिसमें कौस्तुभमणि की कान्ति किसलय के सदृश है, जो शरदकालीन
आकाश जैसा नीलवर्ण है एवं चन्द्र की किरणों से निर्मल हार से विभूषित है,
ऐसे उदार श्रीविष्णु के वक्षःस्थल पर जो शयन करती है वही शिथिल एवं
गलित उत्तरीय वाली श्री लक्ष्मी स्वयं आकर अपने नूतन कमल के पराग से
शोभित उरोजों से आपीडन करने के साथ ही आपका आलिङ्गन करे।]
४२. दृश्य एवं पाठ्य काव्यों की तरह श्रव्यप्रबन्धों में भी कथाशरीर के
संविधान, सम्भाषण और वैदग्ध्यरूप इन (लक्षण नामक) कविव्यापार को
इसी प्रकार समझना चाहिए !