नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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३४. पृच्छा :--शोक, मोह आदि के कारण पराधीन हो जाने से स्वयं
अपने को या दूसरे को सम्बोधित कर प्रश्न करने की-सी दशा में कथन-करना
'पृच्छा' है। अतः जहाँ उत्तर की अपेक्षा न हो वहाँ यह प्रश्न एवं कथन ही
प्रत्यायक है। जैसे रामचरित में हनुमान सीता को देख कर कहते हैं :--
स्थानेऽवसीदसि रघूद्वह किं विधातः अस्यास्त्वयेक्षितमलक्षणमङ्ककेषु ।
अद्यापि जीवसि दशानन हे हनूमन् केयं तवाभिमुखवर्तिरिपोः प्रतीक्षा ॥
[ हे रघुनाथ, आप दुःखी होते हों यह उचित ही है । हे विधाता, तुमने
इस भगवती सीता के अंगों पर कौन से अलक्षण या दुर्लक्षण देखे जिन्हें देख
कर इसके ललाट पर विधिना का ऐसा लेख लिखा था । अरे दशमुख, तुम इस
बेचारी को इतना कष्ट देकर आज भी जी रहे हो । और हे हनुमन्, अपने
सामने शत्रु को पाकर भी तुम अब कैसी या किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो । ]
३५. सारूप्य :--यहाँ कथनादि में आदि पद के द्वारा दर्शन, श्रवण
एवं अनुभवन का उपलक्षण है। यहाँ रूप की विशिष्ट भ्रान्ति से क्षोभ को
उत्पन्न कर देने में ही लक्षण का चमत्कार नहीं। जैसे छलितराम में लक्ष्मण
के द्वारा बाँध कर लाये गये लव ने श्रीराम की यज्ञशाला में स्थित हिरण्मयी
सीता को देख कर कहा—'अये कथमियमम्बा राजद्वारमागता' ( अरे माँ
आज कैसे (सहसा) राजद्वार में आ गयी ! ) और सहसा खड़ा होकर
प्रणाम कर एवं ध्यान से देख कर 'अरे यह तो हिरण्मयी हैं—ऐसा अनुभव कर
देख कर, समीप जाकर फिर दूर हट कर बैठ गया । या वेणीसंहार में दुर्योधन
का वध कर के लौटने वाले भीमसेन को चार्वाक के कथन से भ्रान्त युधिष्ठिर
द्वारा दृढ़ता से पकड़ कर यह कहना—'आशैशावादनुदिनम्' इत्यादि ।
३६. मनोरथ :--जैसे विकटनितम्बा के प्रहसन में विकटनितम्बा
कहती है कि—
अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु ।
मुग्धामजातरजसं कलिकामकाले बालां कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः ॥
[ अरे भौरे, रतिकालीन उपमर्द का सहन करनेवाली दूसरी पुष्प-लताओं
से अपना मन बहलाओ ! तुम इन मुग्धा (नग्निका) एवं अनर्तवा कली वाली
नवमालिका को क्यों व्यर्थ ही कदर्थित कर रहे हो । ]
यहाँ विकटनितम्बा ने स्वयं अपने को ही सुमनोलता के बहाने रखकर यह
कहा है ।
३७. लेश :--जैसे अविमारक के द्वितीय अंक में धात्री नायक को
कहती है :