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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 668 में से

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पृष्ठ 585

विदूषक—भवति, आप महानुभावा हैं, अतः प्रियवयस्य के एक अपराध
को क्षमा कर दो ।
वास—अरे, इस प्रथम मिलन में विघ्न डाल कर तो अपराध मैंने ही
किया है आपके इन प्रियमित्र ने नहीं ।]
अन्य आचार्य इसका 'आत्मन्यभूततद्भावभावनम्' (अपने में अभूत जैसी
भावना रखना, ) लक्षण करते है । इसके अतिरिक्त अन्य इसे 'अन्यगते हेताव-
स्मिन् कार्यकल्पनम्' (अन्यगत कारण से भिन्न में कार्य की कल्पना करना )
लक्षण करते हैं ।
३६. गुणकीर्तन :—जैसे वत्सराजचरित के चतुर्थ अङ्क में शालङ्कायन
कहते हैं—
शालङ्कायनः—नीलनागव्यपदेशेन समन्ततः शस्त्रप्रभाभासुरैरस्मद्योधैः
परीतेन महति भयस्थाने विगतसम्भ्रमं—
तेन प्रोक्तं धैर्यगाम्भीर्यशौर्यप्रज्ञातेजो-नीति-दाक्षिण्यगर्भम् ।
वाक्यं सामाद्यं सोर्जितं श्रोत्ररम्यं शास्त्रीकर्तव्यं तद्बुधैः स्वार्थकामैः ॥
भरतरोहकः—एषः सङ्क्षिप्तविस्तरो नाम ।
राजा—ततस्ततः ।
शालङ्कायनः—देव, यस्तस्य युद्धे महति प्रवृत्ते पराक्रमः साहसलाञ्छनः सः ।
प्रद्युम्नरामार्जुनभीमकर्ण—साम्बाभिमन्युष्वविचिन्त्य एव ।।
राजा—अहोनु खलु स्वभावसिद्धानां गुणानामव्यभिचारिता । कुतः—
अविदित इति नैकधा प्रयत्नाद् बहुदिवसं बहुधा परीक्षमाणः ।
द्विगुणमभिविराजते गुणैः स्वैर्मणिरिव जातिविशेषवान् महार्हः ॥
[—शालङ्कायन—काले सर्प के बहाने से चारों ओर शस्त्रों की प्रभा से
दीप्त हमारे योद्धाओं से घिरे हुए उसने भय के स्थान होने पर भी सम्भ्रम
को त्याग कर—धैर्य, गाम्भीर्य, शौर्य, प्रज्ञा, तेज, नीति तथा दाक्षिण्य से
युक्त सामप्रधान एवं ऊर्जस्वी होकर भी कर्णसुखद वाक्य को कहा—बुधजन
अपने प्रयोजन के लिये इसे शास्त्रवचन के रूप में ग्रहण करें ।
भरतरोहक—यह संक्षिप्त है तथा विस्तीर्ण भी ।
राजा—अच्छा, इसके बाद ।
शाल—महाराज, तब महान् युद्ध के आरम्भ हो जाने पर उसने जो
पराक्रम दिखलाया वह साहस ही कहना चाहिए, क्योंकि ऐसे साहस को
प्रद्युम्न, बलराम, अर्जुन, भीम, कर्ण, साम्ब तथा अभिमन्यु के विषय में भी
सोचा नहीं जा सकता था ।