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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

षोडश अध्याय
(वृत्तविधान)
१. जैसा कि पिछले अध्याय में बतलाया है कि—'अक्षराणि निवेशयेत्'
इत्यादि। उसी अक्षर-निवेश को श्रव्यता के लिये रसायन बनाने के उद्देश्य
से छन्दों के विभाग को दिखलाने का उपक्रम करते हैं—'छन्दाँस्येवम्'
इत्यादि के द्वारा। इन छन्दों से (जिन्हें पूर्व अध्याय में दिखलाया था)
बने हुए वृत्तों का—जिनका नाट्य में प्रयोग अभीष्ट है—लक्षण बतलाता हूँ।
ये वृत्त कौन है? जिनमें गुरु तथा लघु के नियम के कारण श्रव्यता का
आधान हों ऐसे वृत्तों को। 'वृत्त' पद में अधिकरण में 'क्त' प्रत्यय हुआ है।
[अतः जो सुनने या सुनाने के योग्य हों वे 'वृत्त' होते हैं]
२. अब छः अक्षरों वाले छन्द से आरम्भ कर २६ अक्षरों वाले उत्कृति
पर्यन्त छन्दों का (जो प्रयोग योग्य हों। इस तथ्य को पिछले अध्याय में
दिखलाया जा चुका है अतः अब उसी) का उपक्रम करते हैं। 'गायत्र' =
गायत्र्या एव गायत्रम्। यहाँ 'तेन निर्वृत्तम्' से अण् प्रत्यय किया गया है।
अतः गायत्री से जो सम्पन्न है वह गायत्र है। इस अध्याय में भरतमुनि ने
त्रिक (या तीन गुरु लघु) के अनुसारी कुछ छन्दों के लक्षण कहे हैं तथा
अन्य आचार्यों ने गण के आधार पर लक्षण कहे थे। अतः यहाँ दोनों ही प्रकार
का पाठ विचारार्थ के लिया गया है। (जब कि अर्थ उनका एक ही है)।
[यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि पिङ्गलाचार्य के पूर्व छन्दो लक्षण गुरु,
लघु की गणना के निर्देश पर प्रचलित था, गणों के आधार पर नहीं।
इस प्रकार यहाँ दोनों ही रूप में प्राप्त लक्षण हमारे द्वारा भी पाठान्तर
आदि के साथ संगृहीत कर लिये गये हैं]
१५. सिंहलेखं वृत्तम् = सिंह के नखों से कुरेदने के समान घट रही है
या सिंहलेख वृत्त (छन्द) सी हो गयी है।
२६. मयूरसारणी—मयूरीभिः सारी गतिविशेषो यस्यास्तादृशी। यद्वा
मयूरवद् सारो व्याकोचमस्याः ॥
अर्थात् मयूरी के सदृश गति या मयूर के समान विकसित या फैला
हुआ स्वरूप जिसका रहे ऐसा छन्द।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५५
२८. दोधकवृत्तम् — दोधकेन मन्दं मन्दं गीयमानं वृत्तम् दोधकवृत्तम् ।
अर्थात् दूध दुहने की तरह मन्द मन्द जो गाया जाए ऐसा छन्द ।
३४. उपेन्द्रवज्रा — उपेन्द्र का वज्र जिसमें उपमान हो वह । यहाँ मत्वर्थीय
अच् प्रत्यय कर उपेन्द्रवज्रम् पद बना । उपेन्द्रवज्रम् में उपमित समास
है । (नायिका के स्मित एवं कान्ति से) इन्द्रधनुष सदृश वर्णों का
वैचित्र्य (सम्मिश्रण भी) जहाँ हो ऐसी । इन्द्रधनुष में (भी) वर्णों का
वैचित्र्य है तथा नायिका में (स्वयं के) वर्ण की विचित्रता है ही ।
४३. तोटकवृत्तम् = तोटक = छेदक का वृत्त चेष्टित तथा तोटक नामक
वृत्त (छन्द) ।
७४. नान्दीमुखी — नान्दी पाठ के समय बजाए जाने वाले दन्दुभि वाद्य
की तरह जिसका (विस्तीर्ण या बकवासी) मुख हो ऐसी ।।
१२०. यहाँ 'नानावृत्त-समुद्भूवाः' कहने का उद्देश्य (आशय) यह है
कि समवृत्त छन्द के पद्यों के लक्षण की पृथक् पाद में पृथक् कर समता या
विषमता का विद्वान् स्वयं 'ऊह' या तर्कना करें ।
१२१. दो सम = प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ ये दो पाद
सम रहें । प्रथम द्वितीय तथा तृतीय चतुर्थ ये दोनों पाद विषम रहे । यहाँ द्वौ
पद वीप्सागर्भ है अर्थात् दो दो बार कहना इष्ट है ।
१२३. सिद्धम् = अर्थात् लक्षित या जिसका लक्षण किया गया है ।
सार्वपादिकम् = सम्पूर्ण पाद में यह लक्षण रहना चाहिए । छेद = पादों का
विभाग या यति ।
१३७. सगुर्वन्तः = गुरु जिसके अन्त में रहे ऐसा गण अर्थात् सगण
तथा सर्वलघु अर्थात् नगण या त्रिक के अन्त स्थित गुरु वर्ण । प्रथम अक्षर
के पश्चाद्वर्ती चतुर्थ अक्षर से आगे वाला या पूर्व में लघु यकार भी इष्ट
नहीं होता अर्थात् इनका प्रयोग नहीं रहना चाहिए ।
१४४. हतशोभानि = काव्यों में प्रयुक्त नहीं होते, व्यर्थ या शोभाहीन
होने के कारण । अर्थात् पाठ्य काव्यों में गीत का प्रयोग नहीं होता ।
१४५. गीतों में पक्षमानता का अभाव होता है तथा वृत्तों में श्रव्यता
की अपेक्षा नहीं होती । गीत में केवल लय एवं तालों की योजना के लिये
अर्थ-साम्य का विधान होता है, अतएव गीतों में मात्रा एवं वर्णों के नियम
का आश्रय या अनुसरण किया जाता है । अतः गीतों में ही ऐसे वृत्तों की
योजना की जाए तो पाठ्य के उपयुक्त 'वृत्त' न हों ।

४५६ नाट्यशास्त्र
१७७. मात्रावृत्तों की संख्या ज्ञान के लिये बतलाते हैं—'सर्वेषमित्यादि
से । विकल्प के द्वारा पूर्व में जो संख्याभेद किया था उसका उत्तरवर्ती
संख्या के साथ गुणन करने पर जो पिण्डीभूत संख्या हो उसे दिखलाये ।
इनमें समसंख्या के पांच और विषम के चार भेद होते हैं । षष्ठ के दो
तथा द्वितीयार्ध में एक भेद, अष्टम में भी एक ही भेद होगा । इस प्रकार
यहाँ पूर्व अङ्क से उत्तर अङ्क का गुणन करे तथा उससे अन्य अंक का तो इस
प्रकार सोलह भेद हो जाते हैं । जैसे चार का पांच से गुणन करने पर २०
तथा बीस को चार से गुणन करने पर (२० × ४ = ८०) अस्सी होते हैं ।
फिर अस्सी में चार का गुणा करने पर (८० × ४ = ३२०) तीन सौ बीस
हो जाते हैं इसी प्रकार आगे भी ये बढ़कर ३२ लाख ८ हजार २० कुल हो
जाते है इसका संकलन निम्न श्लोक में इस प्रकार है:—
"आर्या शतसहस्राणि ज्ञेया ह्येकान्नविंशतिः ।"
अष्टौ सहस्राणि तथा विशतिश्च प्रमाणतः ॥
१७६. 'काव्यबन्धाः' इत्यादि के द्वारा वृत्तों का उपसंहार करते हुए
अग्रिम अध्याय गत लक्षण, गुण आदि का संकेत किया गया है । यहाँ काव्य
को एक निर्माण वस्तु दिखाया कर यह दिखलाया गया है कि यदि प्रासाद का
निर्माण करना हो तो प्रथम उसमें भूमि की अपेक्षा होगी इसी प्रकार काव्य
के निर्माण में आधारभूत छन्दों की (भूमि की तरह) विधि होती है । यह
काव्य में आधार होने से भित्ति स्थानीय माना जाता है, तब इस भित्ति पर
लक्षणादि की योजना एवं गुणादि का निवेश चित्र कर्म तथा पच्चीकारी
के समान होता है । इसके बाद इस काव्य प्रासाद में झरोखों के समान
दशरूपक का विभाग, प्रयोग के निरूपण के तुल्य काकु, स्वर आदि वाचिक
का स्वरूप कहा जा रहा है । इस वाचिक अभिनय के क्रम में वृत्तों का
विधान यहाँ दिखलाया गया । यद्यपि रूपक निर्माण की वेला में परिपक्व
प्रज्ञा के सहृदय को क्रम प्रतिभास नहीं होता फिर भी अपोद्धार वृद्धि से
उसकी कल्पना की जाती है । प्रबन्धनिर्माण के समय युक्त या उचित
अभ्यास की सम्पत्ति अर्थात् अभिनय के लिये आधार तैयार करना । इसी
को 'क्रम' कहा गया है। इस क्रम का उल्लंघन कर नाटकादि का निर्माण
करने पर बड़ी हानि या प्रमाद या स्वाच्छन्द्य हो जाता है—क्योंकि सभी
रूपक रचयिता जन कालिदास की तरह नहीं होते । इसके अतिरिक्त
इनका प्रतिभा के अंगभूत ज्ञानातिशय को भी पूर्वजन्म में किये गये

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५७

अभ्यास से उत्पन्न संस्कार पाटव से ही उत्पन्न समझना चाहिए। आचार्य ने
कहा भी है कि—
महाकवीनां पदवीमुपात्तामारुरुक्षताम्।
नासंस्मृत्य पदस्पर्शन्सम्पत्सोपानपद्धतिः ॥
“काव्य निर्माण से उपात्त महाकवियों की पदवी पर आरोहण करने
की भावना रखने वाले व्यक्ति जब तक पदों का स्पर्श नहीं करेंगे तब
तक 'सोपानपद्धति' पर आरोहण का क्रम सम्भव कैसे होगा या सम्पन्न नहीं
होगा।”

सप्तदश अध्याय
(काव्यलक्षणादि)
१-५. पूर्व अध्याय में छत्तीस लक्षणों से युक्त 'काव्य रचना' की बात
(अध्याय समाप्ति के साथ) कही गयी थी। यहाँ यह प्रश्न है कि गुण,
अलंकार तथा रीति का काव्य में आधान प्रसिद्ध है, किन्तु काव्य में 'लक्षण'
भी होते हैं यह (अति) प्रसिद्ध नहीं। व्यवहारों से तो 'पुरुष' को लक्षण,
गुण एवं अलंकारों से सम्पन्न होना उपयुक्त माना गया है परन्तु पुरुष की
तरह काव्य में लक्षणादि का व्यवहार समुचित नहीं हो सकता। क्योंकि
पुरुष शरीरधारी होता है, अतः शुभाशुभ लक्षण शरीर में होते हैं तथा
अलंकारों से उसकी शोभा बढ़ती है। किन्तु काव्य के निर्माण या अनुभूति
के समय लक्षण की गणना नहीं की जाती। दण्डी ने भी (इसी कारण)
काव्य की शोभा संवर्धक धर्मों को 'अलङ्कार' कहा है तथा गुणों के मध्य
प्रसाद आदि को बतलाते हुए यह सूचित किया कि गुण एवं अलङ्कारों का
विभाग करना कठिन ही है। इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि
गुण चिन्मय आत्मरूप होकर शृङ्गारादि रसों में अवस्थित होने के कारण
शृङ्गार में उन्हें लक्षित करना पड़ता है। जो पद काव्य के शब्द एवं अर्थ
गत शरीर में पृथक् सिद्ध हो वही लक्षण है। प्रकृत में अलंकारों से युक्त
काव्य भी लक्षणों के बिना शोभित नहीं होता। इस प्रकार यह स्पष्ट है
कि गुण, अलंकार तथा लक्षण में भेद निश्चित है। इस भेद का प्रतिपादन
विश्लेषणात्मक पद्धति से न्यस्त प्रक्रिया के द्वारा किया है जिससे कवि प्रतिभा
में भासमान वस्तु भाषा में प्रकट की जाती है तथा उसका काव्य के पाठक
या सहृदय दर्शक को बोध होता है। परन्तु लक्षण एवं अलंकारों में भेद के
प्रतिपादन का उद्देश्य काव्यरचना एवं काव्यगत रस के आस्वादन को
सर्वगम्य या सरल बनाना है।
लक्षण वह अर्थ है जो कविव्यापार की प्रकटीकरण प्रक्रिया से ऐसे
विलक्षण आनन्दप्रद रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वही अर्थ
अपने सामान्य रूप से भिन्न ज्ञात होकर (अपने) विलक्षणरूप में रस का
विधायक अंश बन रसानुभव को उत्पन्न करने में सहायक होता है। लक्षण ही
रसात्मक काव्य को अरसात्मक काव्य से पृथक् या भिन्न बनाता है।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४५९
इसे इस प्रकार समझें कि- गुण तथा अलंकार दोनों ही शब्दार्थ से
सम्बद्ध होते हैं परन्तु लक्षण पूर्णतः कवि व्यापार से संलग्न होता है, क्योंकि
कवि के प्रयत्न से (ही) काव्य में शब्दार्थगत वैचित्र्य का आधान होता है।
यह जिस प्रयत्न से होता है वह समग्र प्रयत्न 'लक्षण' ही है। इसी के कारण
काव्य कविकर्म कहा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे एक उदाहरण
देकर समझाया कि 'पुष्टता' शरीर का गुण है परन्तु जब यही सुन्दरी के
स्तनों में रहे तो वह स्तन का लक्षण बन जाता है और वही कटि में रहे तो
सुन्दरी का कुलक्षण बन जाता है। इसी तरह एक प्रकार से कही जाने वाली
वस्तु उसी क्रम में रसोचित विभाव के रूप में प्रकट हुई तो वह 'लक्षण' है।
इसी कारण गुण एवं अलंकार ऐसे लक्षण से स्वतः भिन्न हो जाते हैं।
इसी प्रकार कवि व्यापार के बल से लौकिक वस्तु का भी काव्य में
अलौकिक स्वभाव में प्रकट होना 'लक्षण' कहलाता है। इसीलिये लक्षणों के
आश्रयण के बिना काव्य में अलङ्कारों को स्थान नहीं मिल सकता। इस
प्रकार अर्थालंकारों के बीजभूत एवं कथा शरीर में विचित्रता (को) प्रदान करने
वाले वक्रोक्ति-रूप सम्पन्न समस्त चमत्कारों का 'लक्षण' शब्द से व्यवहार किया
जाता है। लक्षण गुण एवं अलङ्कारों की अपेक्षा न रख कर स्वयं अपनी ही
महिमा से प्रोद्भासित होते हैं तथा महापुरुष के शरीर में विद्यमान पद्मादि
रेखाओं से सुलक्षण की तरह काव्य में सौन्दर्य का आधान करते हैं। रत्नखचित
आभरण से जैसे नायकादि का सौन्दर्य शोभित नहीं होता वही स्थिति अलंकारों
के बिना की है कि जिससे काव्य की सौन्दर्य शोभा हो सके। गुण भी धैर्यादि
की प्रवृत्ति से द्योतित होकर शोभित होता है। इसी प्रकार (गुण भी) काव्य
गत शब्द तथा अर्थ की रचना के आश्रय में स्थित रहता है। परन्तु जैसे
लक्षणहीन पुरुष सुन्दर शब्द से अभिहित नहीं होते, ठीक उसी तरह प्रौढ़काव्य
अपने कथा शरीर, गुण एवं अलङ्कारों से प्रोज्वक होकर भी नीरसता की स्थिति
में प्राप्त होकर अभिधान के योग्य नहीं होता है (इसका कारण है लक्षण का
न होना)। कथाशरीर से मण्डित (दृश्य) काव्य में लक्षणों का सम्पादन
अवश्य किया जाता है (अल्प प्रसार के कारण) मुक्तकादि खण्डकाव्यों में नहीं।
इसीलिये भरत मुनि ने मुक्तकादि से भेद दिखलाने के लिये ही 'काव्यवन्धास्तु
कर्तव्या' (१६।१७६) कहा भी है। यद्यपि लक्षण असंख्येय हो सकते हैं
किन्तु चमत्कार विशेष से गरिष्ट छत्तीस लक्षणों को ही भरत ने निदर्शित किया
है। मुनि के शिष्य कोहलादि आचार्यों ने जिन अन्य बातों को अतिरिक्त रूप
में कहा भी था उनमें से कुछ अतिरिक्त लक्षण के रूप में प्रसिद्ध हो गये तथा

४६० नाट्यशास्त्र :
काल प्रवाह से (कारण) भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर के रूप में प्रविष्ट या
समायोजित कर दिये गये। ऐसे सभी लक्षणों का यथा स्थान विवरणादि यहाँ
प्रकाशित किया जा रहा है।
६. भूषण :—जहाँ भरतोक्त उपमा आदि अलंकारों तथा श्लेष आदि
गुणों से कथा-शरीर की रचना समुल्लसित होती हो-वह 'भूषण' है। यहाँ
'चित्रार्थैः' पद के द्वारा-विभावादि रूप सामग्री के प्रत्यायक होने के कारण
उसके उद्योतक अर्थ विशेषों के द्वारा या वक्रोक्ति से कथा शरीर का समुल्लास
किया जाना-सूचित किया गया है। यथा—
रत्नावली नाटिका में प्रथमाङ्क में यौगन्धरायण का निम्न वचन—
'विश्रान्त विग्रह-कथो रतिमाङ्गनस्य चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् ।
पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति ॥ (र० १।८)
[ जिसकी शासन पद्धति में विग्रह की बात नहीं होती, जिन पर प्रजाजन
का अनुराग है, जो सब के चित्त में बसते हैं, जिन्हें वसन्तक अति प्रिय है वही
यह वत्सराज उदयन साक्षात् अशरीरी मदन होकर साथ में रति को लिये
हुए प्रजाजन के चित्त में निवास करने वाले मदन सा महोत्सव को देखने के
लिये यहाँ आ रहा है । ]
यह भूषण की ही अतिशयिता है जिसमें सामान्य बात से काव्य का
पार्थक्य स्पष्टतः दिखलाई देता है। अतः जहाँ गुण एवं अलङ्कारों के द्वारा
कथारूप वक्रोक्ति अतिशयित हो जाती या की जाती हो वहाँ 'भूषण' समझना
चाहिए यह स्पष्ट है।
७. अक्षरसङ्घात :—यहाँ विविध श्लेषमयी उक्तियों से या अक्षरों के
विपर्यासादि से उक्ति प्रत्युक्ति में विचित्रता आये तो 'अक्षर-संघात' है। जैसे
उभयाभिसारिका में—
विट :—भगवति, वैशिकाचलोऽहमभिवादये ।
परिव्राजिका—न वैशिकाचलेन प्रयोजनं न च वैशेषिकाचलेन ।
विट :—अस्यैतत् कारणम् ?
परिव्राजिका—षट्पदार्थबहिष्कृतैः सह सम्भाषणमस्मद्गुरुभिनिरुद्धम् ।
[ विट—भगवति मैं वैशिकाचल आपका अभिवादन करता हूँ।
परिव्राजिका—मुझे न वैशिकाचल से कुछ काम है न वैशेषिकाचल से ।
विट—इसका कारण ।
परिव्राजिका—छः पदार्थों का बहिष्कार करने वालों से संभाषण न
करना हमारे गुरुजी ने बतलाया है । ] इत्यादि ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१
अथवा—“अभिज्ञानशाकुन्तल” के सप्तमांक में-‘शकुन्तलावण्यं पश्य’
में ‘शकुन्तला’ पद से शकुन्त के लावण्य तथा शकुन्तला को सूचित करना ।
८. शोभा :—जहाँ सिद्ध प्रयोजनों से असिद्ध का चमत्कारी अर्थ निर्णय
करता या सूचना देता है और वह भी शुभ संघटना, श्लेष, वक्रोक्ति या ध्वनि
की महिमा द्वारा तो वह ‘शोभा’ होती है । कई लोक-स्वभाव के प्रकटन को
‘शोभा’ बतलाते हैं । अन्य जन युवक एवं युवतियों के सहज मनोभावों का
प्रकटन ‘शोभा’ मानते हैं । यह अर्थ प्रधान वस्तु में परम शोभा प्राप्त करती
है । जैसे रत्नावली के प्रथम अंक में यौगन्धरायण—‘द्वीपादन्यस्मादित्यादि’
( २ ० १ । ६ ) के बाद कहता है कि—
प्रारब्धेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतौ
दैवेनेत्थं दत्तहस्तावलम्बे ।
सिद्धे भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि
स्वेच्छाचारी भीत एवास्मि भर्तुः ॥ ( रत्ना ० १ । ७ )
[ स्वामी के अभ्युदयार्थ जो कार्यारम्भ किया गया है उसी में भाग्य के
द्वारा इस प्रकार सहारा दे दिया है कि अब उसकी सिद्धि में सन्देह नहीं रहा
है, परन्तु फिर भी यह सभी मैंने अपने ही मन से किया इसलिये अपने स्वामी
से भयभीत मैं अवश्य हूँ । ]
कथाशरीर की संघटना रूप शोभा के आधार पर ही यहाँ मधुरता की
प्रसक्ति है ।
६. उदाहरण:—जहाँ दूसरों के ( शत्रु आदि जन के ) परम रहस्य
पूर्ण या दुर्भेद्य अर्थ को तुल्यार्थक वाक्य से दूसरों के लिये निपुण जन प्रकाशित
कर दें तो—‘उदाहरण’ है । जैसे देवीचन्द्रगुप्त नाटक में प्रावेशिकी ध्रुवा से
संशयाकुल चित्त वाले चन्द्रगुप्त के प्रवेश सूचक अर्थ को द्योतित करना ।
जैसे—
एसो सिअकर-वित्थर-पणासिआसेसवेरितिमिरोहो ।
णिअविहवरोणचन्दो गअणगिहं लंघिऊँ विसई ॥—
एषः शीतकरविस्तरप्रणाशिताशेषवैरितिमिरौघः ।
निजविभववरश्चन्द्रो गगनगृहं लङ्घितुं विशति ॥
[ यह चन्द्र अपने शीतल करों के फैलाव से समग्र शत्रुभूत अन्धकार को
नष्ट करते हुए अपने ही आकाश रूप गृह को पार करने की इच्छा के लिये
वहाँ प्रवेश कर रहा है । ]

४६२ नाट्यशास्त्र
१०. हेतु :— जो वचन फल को सिद्ध करने का सामर्थ्य लिये हो,
जिसमें शब्द एवं अर्थ परिमित रहे तथा जो विचित्र शैली में कहे जाएँ तो—
'हेतु'। जैसे तापसवत्सराज के षष्ठ अंक में मरण का निश्चय करने वाली
वासवदत्ता को समझाने के लिये यौगन्धरायण का यह कथनः—
आसृष्टेः प्रतिपार्थिवं युवतयो जाताः मनोवल्लभाः
मग्नास्ते व्यसनार्णवे च बहवस्ताभिः सहैवेश्वराः ।
देव्या यत्तु कृतं तदाविकलतामुत्सृज्य लोकोत्तरं
तस्यैषा कृपणोचितेन विधिना किं ग्लानिरुत्पद्यते ॥
[ जब से इस सृष्टि का आरम्भ हुआ है तभी से प्रत्येक राजा को उसकी
मनोनुकूल युवतियाँ प्रिय होती रही है । ये प्रेयसियाँ घोर शङ्का में निमग्न
रही और उनके समर्थ एवं ईश्वर पति भी इसी में डूब गये । किन्तु महादेवी
ने जो उस समय ( भी ) विकलता को छोड़ कर लोकोत्तर कार्य कर
डाला उसके विषय में अब यह दीनता से ग्लानि क्यों उत्पन्न हो रही है । ]
यहाँ देवी ने जो किया वह इष्टार्थ साधक है तथा उससे शीघ्र ही आप
स्वयं शुभफल का अनुभव करेंगी।" इत्यादि में हेतु है ।
११. संशय :—वाक्य के पूर्णतः समाप्त न होने से साध्यविषय के स्वरूप
या अवस्था में सन्दिग्धता आना 'संशय' है। इसका अर्थ एवं काम प्रधान
रूपकों में निपुणता के साथ प्रयोग रखा जाता है। जैसे—कुन्दमाला के षष्ठ
अंक में रामायण कथा के वाचक लव तथा कुश कहते हैं:—
सीतां निर्जनसंम्पाते चण्डश्वापदसङ्कुले ।
परित्यज्य महारण्ये लक्ष्मणोऽपि न्यवर्तत ॥
ततः प्राणैः परित्यक्ता निराशा जनकात्मजा ।
( इति तूष्णीं भवतः )
अप्रियाख्यानभीतेन कविना संहृता कथा ॥
किमितः कल्याणमावेदयति । एवं तावदनुयोक्ष्ये । ( इति पृच्छतः )
[ निर्जन तथा भयंकर हिंसक प्राणियों से व्याप्त महारण्य में सीता का
परित्याग कर ( जल्द ) लक्ष्मण जी वापस चले गये तब प्राणों से भी प्रिय एवं
प्रियजन के द्वारा छोड़ी गयी निराश सीता ने—
( इतना कहकर चुप हो जाते हैं )
( तब राम और लक्ष्मण कहते हैं कि )— सम्भव है अप्रिय सत्य के
कहने से डर कर कवि ने यहीं कथा का उपसंहार कर डाला हो । ]

यहाँ संशय है। संशयालङ्कार का चमत्कार संशय नामक इस लक्षण
से भिन्न होता है।
१२. दृष्टान्त :-धर्म के अविरोध से सभी जन के मन का आकर्षक
ऐसा वचन जो सकारण तथा निदर्शन युक्त हो 'दृष्टान्त' कहलाता है। जैसे
'धूर्तविट' में 'स्त्रीषु प्रसङ्गो न कर्तव्यः इस विषय में भाव का क्या मत है ?
यह पूछे जाने पर विट-भोः उपदेशमात्रं खल्वेतत् । तमहं न पश्यामि यः स्त्रीषु
प्रसङ्गं न गच्छेत् । श्रूयन्ते हि महेन्द्रादयोऽप्यहल्यासु विकृतिमापन्नाः' इत्यादि
कथन में दृष्टान्त है।
१३. प्राप्ति :-इसका उदाहरण कुन्दमाला के तृतीय अङ्क में बालुका
पर पद चिन्हों को देखकर लक्ष्मण ने राम के प्रति कहा—
विलासभोगेन परिश्रमेण वा स्वभावतो वा निभृतानि मन्थरम् ।
पदानि कस्याश्चिदिमानि सैकते प्रयान्ति तुल्यं कलहंसविभ्रमम् ॥
रामः (निर्वर्ण्य सहर्षम् ) किमुच्यते कस्याश्चिदिति । ननु वक्तव्यं
सीतायाः पदानीति । पश्य—
समानं संस्थानं निभृतललिता सैव रचना
तदेवैतद्रेखा कमलरचितं चारुतिलकम् ।
यथा चेयं दृष्ट्वा हरति हृदयं शोकविधुरं
तथा ह्यस्मिन् देव्या सपदि पदपङ्क्तिर्विनिहिता ॥
[—क्रीड़ा करते हुए, परिश्रम से भागते हुए या स्वभावतः मन्थरता से
बालुका में धंसे हुए ये किसी के पैर कलहंस के विभ्रम की शृङ्गार मयी
चेष्टाओं की समता कर रहे हैं।
राजा राम— ( ध्यान से देखकर प्रसन्न हो ) अरे ये किसी के पैर हैं
ऐसा क्यों कहते हो । अरे भैया, ये तो सीता के ही पैर हैं। देखो--पैरों का
विन्यास समानरूप वाला है, वही निभृत (विनीत ) एवं ललित रचना
है, यही वह रेखा है जिनसे तिलक एवं कमल बड़े ही सुन्दर रूप में बन गये
है। देखने पर यह पदपंक्ति शोक से विधुर विकल हृदय को आकृष्ट कर
रही है। जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ ( सीता ) देवी ने अपने पैरों को
अभी तत्काल ही रखा है। ]
यहाँ प्राप्ति है ।
१४. अभिप्रायः - अभूतपूर्व अर्थात् अद्भुत या असत् अर्थ जो केवल
कल्पित है। अन्य आचार्य अभूतपूर्व पद का अर्थ आस्वाद्य पदार्थ में अपूर्वता

४६४ नाट्यशास्त्र
का अभिमान करते हैं परन्तु यह भावविलक्षणता से शून्य होने पर आचार्य
तौत के मत में अनुपयुक्त है। जैसे तापसवत्सराज के चतुर्थ अंक में साङ्कृत्या-
यनी यौगन्धरायण के उद्योग को देखकर सोच कर चर से कहती है—
दूरमुदीर्णे रिपौ वेषमकिञ्चित् करे च विजिगीषौ ।
भवता तु नयगुणशतैः सोऽयमसूत्रः पटः क्रियते ॥
[ शत्रु अपनी जबरदस्त शक्ति के साथ बडे जोर से उठ खड़ा हुआ है
विजिगिषु महाराज इस समय कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है और आप
सैकड़ो नीतिरूपी उपायों से बिना सूत्र के ही अपना कपड़ा बुन रहे हैं । ]
१५. निदर्शन :—प्रसिद्धानां अर्थात् देवताओं का, परापेक्षा = साध्या-
कांक्षा से व्युदासार्थ = हटाने या दूर करने के लिये। जैसे:—उभयाभि-
सारिका में—
शान्ति याति शनैर्महोषधिवलादाशीविषाणां विषं
शक्यो मोचयितुं मदोत्कटकटादात्मा गजेन्द्राद्वने ।
ग्राहस्यापि मुखान्महार्णवजले मोक्षः कदाचिद् भवेद्
वेशस्त्रीवडवामुखानलगतो नैवोत्थितो दृश्यते ॥
[ औषधियों के प्रभाव से सर्पों का विष शान्त हो जाता है, अरण्य में
प्राप्त मदोन्मत्त हाथी से अपने आपको छुड़ाया जा सकता है, मदोत्कट
ग्राह से भी महासमुद्र में मोक्ष हो सकता है परन्तु वेशस्त्री रूप वडवा की
मुखाग्नि में पड़ा हुआ व्यक्ति कभी नहीं निकला और उसे किसी ने भी
आज तक उठते हुए नहीं देखा ! ]
इसी कारण इसका दृष्टान्त से स्वतः भेद हो जाता है।
१६. निरुक्तः —पूर्वोक्तार्थ = पूर्व में जो किसी बाह्य अर्थ का सम्बन्धी
कोई अर्थ कह दिया गया है उसकी प्रसिद्धि के लिये अनवद्य भाव का वाचक
जो शब्द कहा जाए वह निरुक्त है। अतः इससे अन्यथा करने पर अर्थ
निरर्थक हो ही जाएगा। जैसे वत्सराजचरित के प्रथम अंक में भरतरोहक
राजा से कहता है—
भरतरोहकः—प्रसह्य हरणे केवलं प्रमादिताख्यातिः ।
राजा—किमेतत् !
भरतरोहकः—सदोषेषु कार्येषु यदल्पदोषं तत् प्रारब्धव्यम् ।
वसुवर्मा—स्वामिन्, तत्राप्यहं वाच्यदोषं न पश्यामि । कुतः—
नीता बलात् प्रकृति भद्रतरा सुभद्रा यद्वासुभद्रभगिनी कपिकेतनेन ।
देवस्य तेन समभूद्वचनीयता किं तेजःप्रकाशयशसां यदुदन्तिनां वा ॥

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६५
शालं—साधु निरुक्तमभिहितं वसुवर्मणा ॥
[ भरतरोहक—बलात् हरण करने में प्रमादी होने की केवल ख्याति मात्र
होती है।
राजा—यह क्या कहते हो।
भरतरोहक—सदोष कार्य के रहने पर भी जिसमें दोष कम रहे ऐसे कार्य
का आरम्भ कर दिया जाता है।
वसुवर्मा—स्वामिन्, मैं तो इसमें कोई उल्लेखनीय दोष नहीं देख रहा
हूँ, क्योंकि स्वभावतः कल्याणमयी श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा को बलात् अर्जुन
ने हरण कर लिया तो क्या इससे अर्जुन की निन्दा हुई या अपने तेज की
तरह चमकने वाले हाथियों की निन्दा हो गयी।
शालङ्कायन—अच्छा। वसुवर्मा ने तो यह वैदिक पदों का निरुक्त ही कह
डाला । ]
१७. सिद्धि :—प्रधानानाम् अर्थात् जो स्पृहणीय एवं अतर्कितोपनत या
काकतालीय न्याय से प्राप्त हो ऐसे प्रधान प्रयत्नों का कीर्तन 'सिद्धि' है।
जैसे—कौमुदीमहोत्सव के चतुर्थ अङ्क में मन्त्रगुप्त का वचन—
सङ्गतिश्चिरमचिन्तितपूर्वा निर्वृतप्रणयिनीमिथुनानाम् ।
आधिराज्यमधिरोहति तस्याः षोडशीमपि कलां न मघोनः ॥
[—जिसका पूर्व में चिन्तन नहीं किया था ऐसा इन (दोनों) का या हम
दोनों का यह मिलन है। युग्म या मिथुनों की संगति आनन्ददायी होती है
जिसकी सोलहवीं कला को इन्द्र का परमैश्वर्य भी प्राप्त नहीं कर सकता।]
१८. विशेषण :—जैसे तापसवत्सराज में तृतीय अङ्क में राजा विदूषक
से कहता है कि—
राजा—अयि मूढ,
वृत्तिर्मूलफलादिभिः क्षितितले शय्या जटा धारणं
वासो वल्कलमीदृशं कृतमिदं सामान्यमन्यैरपि ।
संवेगाभिभवे विगूढ़मनसा यन्नानुयाता प्रिया
तन्मिथ्या परिबोधितेन न कृतं स्नेहानुरूपं मया ॥
[ कन्दमूल फल आदि से वृत्ति या निर्वाह, भूमि पर शयन, जटाओं का
धारण तथा वल्कल का वस्त्र रूप में धारण, ऐसा आचरण तो सामान्य जन ने
भी किया है किन्तु संवेगों के दबाने में विमूढ़ मैंने जो प्रिया का अनुनय नहीं
किया यह मैंने अपने मिथ्या ज्ञान के कारण स्नेह के अनुरूप नहीं किया ।]
३० ना० शा० द्वि०

४६६ नाट्यशास्त्र
१६. गुणातिपात :—जैसे धूर्तविट में विट का यह कथन—
विटः—
जात्यन्धां सुरतेषु दीनवदनामन्तर्मुखाभाषिणीं
हृष्टस्यापि जनस्य शोकजननीं लज्जापटेनावृताम् ।
निर्व्याजं स्वयमप्यदृष्टजघनां स्त्रीरूपबद्धां पशुं
कर्तव्यं खलु नैव भोः कुलवधूकारां प्रवेष्टुं मनः ॥
यहाँ कुलाङ्गनाओं के योग्य विनय, लज्जा आदि गुणों की विपरीत अर्थ
में योजना करने से 'गुणातिपात' है ।
२०. अतिशय :—जैसे कुरुराज दुर्योधन के लज्जित होने पर धृतराष्ट्र
के प्रति भीष्म की यह उक्ति :—
एतत्ते हृदयं स्पृशामि यदि वा साक्षी तवैवात्मजः
सम्प्रत्येव तु गोग्रहे यदभवत्तत्तावदाकर्ण्यताम् ।
एकः पूर्वमुदायुधैः स बहुभिर्दृष्टस्ततोऽनन्तरं
यावन्तो वयमाहवप्रणयिनस्तावन्त एवार्जुनाः ॥ इति ।
२१. तुल्यतर्क :—जैसे वत्सराज-चरित के अष्टम अंक में राजा का
यह कथन :—
नवार्कभापल्लवितामलोदरे सुगन्धिरेणूत्करकेसरोज्ज्वले ।
रसामृतज्ञो भ्रमरः सरोरुहे किमर्कपुष्पे प्रणयं करिष्यति ॥
[ जिसका निर्मल उदर सूर्य की किरणों से पल्लवित है तथा जो सुगन्धित
रेणुओं के समुदाय एवं केशरों से उज्ज्वल है, ऐसे सरोज के रसामृत का मर्मज्ञ
भ्रमर क्या अर्क पुष्प में प्रणय रखेगा । ]
२२. पदोच्चय :—जैसे वत्सराजचरित के षष्ठ अंक में राजा सचिव की
उत्तमता का वर्णन करते हुये कहते हैं ।
राजा— खड्गो रक्षान्धकारे रविररितिमिरे कार्यभारेषु धुर्यः
दीपो मन्त्रान्धकारे सुरगुरुर्नये सङ्क्रमो व्यापदोधे ।
उत्कण्ठायां सहभागी गतिरनवसरे चन्दनं शोकतापे
सङ्क्षेपान्मानुषाभो हितशिवसुखदो भव्यचिन्तामणिर्मे ॥
[ रक्षा रूप अन्धकार में खड्ग की तरह शक्ति रखने वाले, शत्रु रूप
तिमिर को नष्ट करने में सूर्य, कार्यभार को वहन करने में धुर्य (वृष) हो
धरा को धारण करने में समर्थ, मन्त्रणा के समय आने वाली कठिनाइयों में
दीपक की तरह प्रकाशक, अनीति के आने पर बृहस्पति की तरह विपत्तियों
को दूर करने वाला, उत्कण्ठा के समय साझीदार, अनवसर में गति की तरह

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६७
मार्ग दर्शक, शोक रूपी ताप को हटाने में चन्दन जैसा शीतल होने से संक्षेप
में इतना ही समझना चाहिये कि मनुष्य के रूप में हित एवं मङ्गल को देने
वाला यह अमात्य एक उत्तम चिन्तामणि ही होता है।
२३. दिष्ट (दृष्ट) :—जैसे मालविकाग्निमित्र में नायिका वर्णन—
वामं सन्धिस्तिमितवलयं न्यस्य हस्तं नितम्बे
कृत्वा श्यामा विटपसदृशं स्रस्तमुक्तं द्वितीयम् ।
पादाङ्गुष्ठालुलितकुसुमे कुट्टिमे पातिताक्षं
नृत्तादस्याः स्थितमतितरां कान्तमृज्वायताक्षम् ॥
[ इस नायिका का वामहस्त वलय सन्धियों में निश्चल होकर नितम्ब पर
स्थापित है तथा दूसरा हाथ श्याम विटप वाली लता के सदृश खुला छोड़
दिया गया है। पैरों के अंगूठे से कुसुम को ठुकराती दृष्टि को फर्श पर टिका
कर रखे हुए यह कान्त, ऋजु तथा विस्तीर्ण नेत्र वाला नृत्त इस समय अतिशय
सुन्दर हो पड़ा है। ]
यह प्रत्यक्ष दृष्ट का उदाहरण है। परोक्ष दृष्ट का उदाहरण जैसे पात-

४६८ नाट्यशास्त्र
मार्दव एवं कठोरता को दिखलाने का कार्य करे, उत्तम चरों के नेत्रों
से लोकानुवृत्त समझे तथा मण्डलों को भी । इस प्रकार प्रयत्न से आत्मा की
रक्षा करे परन्तु युद्धस्थल में आत्मरक्षा की परवाह न करे । ]
२४. विचार :—प्रवृत्त अर्थ का अनुगामी, परोक्ष अर्थ का साधक एवं
अनेक उपाय एवं उपाधियों का दर्शक वाक्य 'विचार' है । यथा मुद्राराक्षस
के पञ्चम अंक में राक्षस का यह कथन :—
साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितं बिभ्रत्सपक्षे स्थितिं
व्यावृत्तञ्च विपक्षतो भवति यत्तत्साधनं सिद्धये ।
यत्साध्यं स्वयमेव तुल्यमुभयोः पक्षे विरुद्धञ्च यत्
तस्याङ्गीकरणेन वादिन इव स्यात् स्वामिनो निग्रहः ॥
[ जो साधन अन्वय से घटित एवं साध्य में निश्चित रहता है, सपक्ष में
जिसकी स्थिति है तथा विपक्ष से जो व्यावृत्त हो तो ऐसा साधन ( ही ) साध्य
की सिद्धि करने में समर्थ होता है । परन्तु जो स्वयं साध्य में अनुकूल एवं
प्रतिकूल होने से तुल्य हो तथा पक्ष के विरुद्ध रहे तो उसको स्वीकार करने से
वादी के निग्रह की तरह स्वामी भी निगृहीत हो जाता है । ]
२६. विपर्यय :—जैसे रावण के प्रति सचिव की यह उक्ति—
सचिव :—उदर्कसिद्धिमिच्छद्भिः सद्भिर्न खलु दृश्यते ।
चतुर्थी चन्द्रलेखेव परस्त्रीफालपट्टिका ॥
[ परिणाम में उत्तम फल की सिद्धि चाहने वाले सज्जन भाद्रपद की
चतुर्थी के चन्द्र की तरह अन्य स्त्री के भाल पट्ट को नहीं देखते हैं ]
रावण :—परस्त्रीकुचकुम्भेषु कुम्भेषु वरदन्तिनाम् ।
निपतन्ति न भीरूणां दृष्टयः शरवृष्टयः ॥
[ भीरुओं की दृष्टि न परस्त्री के कुचों पर पड़ती है और न उत्तम हाथियों
की कुम्भस्थल पर शरवर्षण ही भीरुओं से हो सकता है । ]
२७. भ्रंश :—जैसे वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन कञ्चुकी से
कहता है :—
दुर्योधन —सहभृत्यगणं सबान्धवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम्।
स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात् पाण्डुसुतः सुयोधनम् ॥
कञ्चुकी— ( कर्णौ पिधाय सभयं ) शान्तं पापम् । प्रतिहतममङ्गलम् ।
इति ।
[ दुर्यो—भाई, बन्धु, पुत्र एवं भृत्यों के साथ शीघ्र ही सुयोधन को यह
पाण्डुपुत्र अपनी शक्ति या सेना के द्वारा युद्ध में मार देगा ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६९
कञ्चुकी—( कानों को बन्द कर, भय युक्तहोते हुए ) अमंगल शान्त हों,
अनर्थ शान्त हों ।
२८. अनुनय :—जैसे रामाभ्युदय के द्वितीय अङ्क में राम के पराक्रम
की स्तुति करने में व्यग्र मारीच को रावण कहता है—
रावणः—आः प्रतिपक्षपातिन्, क्षुद्र, राक्षसापसद । किं बहुना—
तवैव रुधिराम्बुभिः क्षतकठोरकण्ठस्तुतैः
रिपुस्तुतिभवो मम प्रशममेतु कोपानलः ।
सुरद्विपशिरस्थलीदलन-दष्टमुक्ताफलः
स्वसुः परिभवोचितं पुनरसौ विधास्यत्यसिः ॥
( इति खड्गमाकर्षति तदा उभयोर्मध्ये निपत्य प्रहस्तः )
प्रहस्तः—प्रसीदतु प्रसीदतु महाराजः, नेदमनुरूपं स्वामिनः । देव,
लोकत्रयक्षयोद्धृत्त-प्रकोपाग्रेसरस्य ते ।
ईदृशः चन्द्रहासस्य भृत्येष

४७० नाट्यशास्त्र

कर रोकता है तथा—‘प्रिये, तुम प्रसन्न हो जाओ’ इत्यादि कहता है परन्तु इतना
होने पर भी जब वहाँ से देवी निकल कर चली जाती है तो 'अरण्यरोदन व्यर्थ
है' ऐसा समझाने वाले अपने मित्र विदूषक को राजा कहता है कि—‘तुमने
महारानी के क्रोध को नहीं देखा। अतः देवी को प्रसन्न करने के सिवाय अब
अन्य कोई उपाय नहीं दिखलाई देता। इसलिये चलो, भीतर चलें और महारानी
को प्रसन्न करें।
यहाँ विदूषक के द्वारा राजा का अनुवर्तन करना 'दाक्षिण्य' है।
३१. गर्हण :-दोष को गुण कर लेना 'गर्हण' है। अन्य मत से क्रोध
या अभिमान या मात्सर्य से किसी की कुत्सा करना 'गर्हण' होती है। जैसे—
धूर्तविट में—
प्रणष्टा न व्यक्तिर्भवति वचसा सैव मृदुता
न रागो नेत्राब्जे त्यजति न च लज्जा व्यपगता ।
स्मृतिः प्रत्यायाता परिहृषितमद्यापि च मुखं
मदो दोषांस्त्यक्त्वा त्वयि परिणतस्तिष्ठति गुणैः ॥
[ मदिरा पान से होने वाले नशे ( मद ) से वचन की सफाई नहीं नष्ट
हुई किन्तु उसमें अधिक मृदुता आ गयी है, राग आँखों को नहीं छोड़ रहा है,
लज्जा भी दूर नहीं हुई, स्मृति भी लौट आयी और आज भी (अभी भी) मुख
प्रसन्न दीख रहा है। अतः यह मद आप में रहने पर भी अपने दोषों को छोड़
कर गुणों में परिणत होकर स्थित है ( ऐसा प्रतीत हो रहा है । ) ]
इसी प्रकार गुणों के अतिपात में भी 'गर्हण' होता है। जैसे वत्सराज-
चरित्र के द्वितीय अंक में विष्णुत्रात का यह कथन :—
नृपाः प्रभुत्वात् प्रतिषेध-वामा जिह्मो विधिस्तद्वशवर्ति कार्यम् ।
साचिव्यतो नापरमस्ति पुंसां विषाददुःखायशसां निदानम् ॥
[ राजा अपनी प्रभुता के कारण वाम-स्वभाव से प्रतिषेध करने वाले
रहते हैं, विधि भी कुटिल होता है तथा सभी कार्य इसी के वश में रहते हैं।
इसलिये पुरुषों के लिये राजा का मन्त्रित्व करने के अतिरिक्त विषाद, दुःख
एवं अयश के निवारण का अन्य कोई निदान ( ही ) नहीं है । ]
३२. अर्थापत्ति :—जैसे धूर्तविट में—
आदष्टस्फुरिताधरे भवति यो वक्तारविन्दे रसः
प्रीतिर्या च हृतांशुके च जघने काञ्चीप्रभोद्योतिते ।
लक्ष्मीर्या च नखक्षताङ्कुरधरे पीने कपोले स्त्रियो
रक्तं तेन विरज्यते न हृदयं जात्यन्तरेऽपि ध्रुवम् ॥

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४७१
[ सुरतकाल में अधर दंशन कर लेने पर अधर फड़कने लगता है ऐसे
मुखकमल में जो रस होता है, वस्त्र खींच कर हरण कर लेने पर करधनी
की प्रभा से आकर्षक जघन में जो प्रीति होती है, स्त्रियों के नखक्षत के
अंकुर को धारण करने वाले पीन पयोधर में जो शोभा होती है तो ऐसी
भावना से यदि राग सम्पन्न हृदय हो तो फिर वह जन्मान्तर में भी विरक्त नहीं
होता है, यह निश्चित समझिये । ]
यहाँ जन्मान्तर में भी रस, प्रीति एवं अनुराग के अनुवर्तन के कथन से
जन्मान्तर में भी हृदय में वैराग्य होना सम्भव नहीं है । अतः संसार के बन्धन से
छुटकारा असंभव है । ऐसे अर्थ का बोध होने से यहाँ 'अर्थापत्ति' नामक लक्षण
स्पष्ट है ।
३३. प्रसिद्धि :—प्रसाधक = प्रकृष्ट साधक, प्रसिद्ध = पूर्व से ही जो सिद्ध
है । जैसे गदायुद्ध में पराभूत दुर्योधन से श्री बलदेव ने कहा—
बल०—भीमसेन, इदानीं तव युद्धवञ्चनामुत्थाय स्थास्यति ।
दुर्याे०—न चाहं भीमसेनेन वञ्चितः ।
बल०—अथ केन भवानेवंविधः कृतः ।
दुर्याे०—श्रूयताम्—
येनेन्द्रस्य च पारिजातकतरुर्मानेन तुल्यं हृतो
दिव्यं वर्षसहस्रमर्णवजले सुसश्व यो लीलया ।
दीप्त्या भीमगदां प्रविश्य सहसा निर्व्याजयुद्धप्रियः
तेनाहं जगतां प्रियेण हरिणा मृत्योः प्रतिग्राहितः ॥
[ बल—भीमसेन अब तुम्हे युद्ध में वञ्चित कर स्थिर हो गया है ।
दुर्याे—मुझे भीमसेन ने नहीं ठगा है ।
बल—तब फिर तुम्हें ऐसा किसने कर डाला;
दुर्याे—अच्छा तो सुनिये—जिसने इन्द्र के अभिमान के साथ पारिजात का
हरण किया था, जिसने दिव्य सहस्रों वर्षोंतक समुद्र के जल में लीला पूर्वक
शयन किया, उस संसार के प्रिय एवं निर्व्याज छली श्री कृष्ण ( हरि ) ने
अकस्मात् अपनी दीप्ति द्वारा गदा में प्रवेश कर दुर्योधन को मृत्यु के लिये
प्रतिगृहीत करवा डाला है ]
यहाँ श्रीविष्णु के शयन आदि कार्य ही वाक्यार्थ के साधक है । अन्य
आचार्य—यहाँ अलंकार युक्त पदार्थों को वाक्यार्थ के प्रसाधक मानते हैं ।

४७२ नाट्यशास्त्र

३४. पृच्छा :--शोक, मोह आदि के कारण पराधीन हो जाने से स्वयं
अपने को या दूसरे को सम्बोधित कर प्रश्न करने की-सी दशा में कथन-करना
'पृच्छा' है। अतः जहाँ उत्तर की अपेक्षा न हो वहाँ यह प्रश्न एवं कथन ही
प्रत्यायक है। जैसे रामचरित में हनुमान सीता को देख कर कहते हैं :--
स्थानेऽवसीदसि रघूद्वह किं विधातः अस्यास्त्वयेक्षितमलक्षणमङ्ककेषु ।
अद्यापि जीवसि दशानन हे हनूमन् केयं तवाभिमुखवर्तिरिपोः प्रतीक्षा ॥
[ हे रघुनाथ, आप दुःखी होते हों यह उचित ही है । हे विधाता, तुमने
इस भगवती सीता के अंगों पर कौन से अलक्षण या दुर्लक्षण देखे जिन्हें देख
कर इसके ललाट पर विधिना का ऐसा लेख लिखा था । अरे दशमुख, तुम इस
बेचारी को इतना कष्ट देकर आज भी जी रहे हो । और हे हनुमन्, अपने
सामने शत्रु को पाकर भी तुम अब कैसी या किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो । ]
३५. सारूप्य :--यहाँ कथनादि में आदि पद के द्वारा दर्शन, श्रवण
एवं अनुभवन का उपलक्षण है। यहाँ रूप की विशिष्ट भ्रान्ति से क्षोभ को
उत्पन्न कर देने में ही लक्षण का चमत्कार नहीं। जैसे छलितराम में लक्ष्मण
के द्वारा बाँध कर लाये गये लव ने श्रीराम की यज्ञशाला में स्थित हिरण्मयी
सीता को देख कर कहा—'अये कथमियमम्बा राजद्वारमागता' ( अरे माँ
आज कैसे (सहसा) राजद्वार में आ गयी ! ) और सहसा खड़ा होकर
प्रणाम कर एवं ध्यान से देख कर 'अरे यह तो हिरण्मयी हैं—ऐसा अनुभव कर
देख कर, समीप जाकर फिर दूर हट कर बैठ गया । या वेणीसंहार में दुर्योधन
का वध कर के लौटने वाले भीमसेन को चार्वाक के कथन से भ्रान्त युधिष्ठिर
द्वारा दृढ़ता से पकड़ कर यह कहना—'आशैशावादनुदिनम्' इत्यादि ।
३६. मनोरथ :--जैसे विकटनितम्बा के प्रहसन में विकटनितम्बा
कहती है कि—
अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु ।
मुग्धामजातरजसं कलिकामकाले बालां कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः ॥
[ अरे भौरे, रतिकालीन उपमर्द का सहन करनेवाली दूसरी पुष्प-लताओं
से अपना मन बहलाओ ! तुम इन मुग्धा (नग्निका) एवं अनर्तवा कली वाली
नवमालिका को क्यों व्यर्थ ही कदर्थित कर रहे हो । ]
यहाँ विकटनितम्बा ने स्वयं अपने को ही सुमनोलता के बहाने रखकर यह
कहा है ।
३७. लेश :--जैसे अविमारक के द्वितीय अंक में धात्री नायक को
कहती है :

धात्री अय्य, किं चिंतीअदि । [ आर्य, किं चिन्त्यते ? ]
अवि—भवति, शास्त्रं चिन्त्यते ।
धात्री—किं णाम एदं रमणीअं सत्यं चिन्तीअदि । [ किं नामैतत् रमणीयं
शास्त्रं चिन्त्यते । ]
अवि—भवति, योगशास्त्रं चिन्त्यते ।
धात्री—( सस्मितम् ) पडिग्गहिदं मंगलवअणं । ओअ-सत्थं एव भोदु ।
[ प्रतिगृहीतं मङ्गलवचनम् । योगशास्त्रमेव भवतु ]
अवि—को नु खलु वाक्यार्थः । अन्यदप्यभिलाषवशादन्यथा सङ्कल्पयामि ।
इत्यादि ।
[ आर्य, क्या विचार कर रहे हो ? ]
अवि—भवति, मैं शास्त्र की चिन्ता कर रहा हूँ ।
धात्री—यह सुन्दर शास्त्र किस नाम का है।
अवि—भवति, ( इस ) योगशास्त्र की चिन्ता की जा रही है ।
धात्री—मैंने मंगलवचन स्वीकार किया । यह योग का शास्त्र हो जाए ।
अवि—तब वाक्यार्थ क्या रहेगा । और भी अभिलाष के कारण सोचता हूँ
जो अन्यथा संकल्प करना है । इत्यादि ]
अन्य आचार्य जन लेश को लेख पढ़ कर इङ्गितज्ञान को समझ लेना इसका
लक्षण करते हैं ।
३८. क्षोम :—जैसे रत्नावली के तृतीय अंक में सागरिका समझ कर
वासवदत्ता का उपलालन करनेवाले उदयन को वासवदत्ता द्वारा अपने घूंघट
को हटा कर लज्जित कर देने के बाद राजा का यह कथन—
राजा—( अञ्जलिं बद्ध्वा ) प्रिये वासवदत्ते, प्रसीद प्रसीद ।
वास—(अश्रु निपातयन्ती) मा एव्वं भण । अण्णगदाई एदाइ अक्खराणि-
[ मैवं भण । अन्यगतान्येतान्यक्षराणि । ]
विदू—भोदि, महाणुभाआ खु तुमं । खमीअदु दाव एक्को अवराहो
पिअवअस्सस्स । [ भवति, महानुभावा खलु त्वम् । तत् क्षम्यताम् तावदेकोऽ-
पराधो प्रियवयस्यस्य । ]
वास—णं पढमसंगमे विग्धं करंतीए मए जेव्व एदस्स अवरद्धं ण अज्ज-
पुत्तस्स । [ ननु प्रथमसङ्गम एव विघ्नं कुर्वन्त्या मयैवैतस्यापराद्धं नार्यपुत्रस्य ]
[ राजा प्रिये, वासवदत्ते, तुम प्रसन्न हो जाओ ।
वास—(आंसु गिरा कर ) आप ऐसा क्यों कहते हैं । ये अक्षर तो दूसरों
के लिये हैं ।