नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६५
शालं—साधु निरुक्तमभिहितं वसुवर्मणा ॥
[ भरतरोहक—बलात् हरण करने में प्रमादी होने की केवल ख्याति मात्र
होती है।
राजा—यह क्या कहते हो।
भरतरोहक—सदोष कार्य के रहने पर भी जिसमें दोष कम रहे ऐसे कार्य
का आरम्भ कर दिया जाता है।
वसुवर्मा—स्वामिन्, मैं तो इसमें कोई उल्लेखनीय दोष नहीं देख रहा
हूँ, क्योंकि स्वभावतः कल्याणमयी श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा को बलात् अर्जुन
ने हरण कर लिया तो क्या इससे अर्जुन की निन्दा हुई या अपने तेज की
तरह चमकने वाले हाथियों की निन्दा हो गयी।
शालङ्कायन—अच्छा। वसुवर्मा ने तो यह वैदिक पदों का निरुक्त ही कह
डाला । ]
१७. सिद्धि :—प्रधानानाम् अर्थात् जो स्पृहणीय एवं अतर्कितोपनत या
काकतालीय न्याय से प्राप्त हो ऐसे प्रधान प्रयत्नों का कीर्तन 'सिद्धि' है।
जैसे—कौमुदीमहोत्सव के चतुर्थ अङ्क में मन्त्रगुप्त का वचन—
सङ्गतिश्चिरमचिन्तितपूर्वा निर्वृतप्रणयिनीमिथुनानाम् ।
आधिराज्यमधिरोहति तस्याः षोडशीमपि कलां न मघोनः ॥
[—जिसका पूर्व में चिन्तन नहीं किया था ऐसा इन (दोनों) का या हम
दोनों का यह मिलन है। युग्म या मिथुनों की संगति आनन्ददायी होती है
जिसकी सोलहवीं कला को इन्द्र का परमैश्वर्य भी प्राप्त नहीं कर सकता।]
१८. विशेषण :—जैसे तापसवत्सराज में तृतीय अङ्क में राजा विदूषक
से कहता है कि—
राजा—अयि मूढ,
वृत्तिर्मूलफलादिभिः क्षितितले शय्या जटा धारणं
वासो वल्कलमीदृशं कृतमिदं सामान्यमन्यैरपि ।
संवेगाभिभवे विगूढ़मनसा यन्नानुयाता प्रिया
तन्मिथ्या परिबोधितेन न कृतं स्नेहानुरूपं मया ॥
[ कन्दमूल फल आदि से वृत्ति या निर्वाह, भूमि पर शयन, जटाओं का
धारण तथा वल्कल का वस्त्र रूप में धारण, ऐसा आचरण तो सामान्य जन ने
भी किया है किन्तु संवेगों के दबाने में विमूढ़ मैंने जो प्रिया का अनुनय नहीं
किया यह मैंने अपने मिथ्या ज्ञान के कारण स्नेह के अनुरूप नहीं किया ।]
३० ना० शा० द्वि०