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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 668 में से

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पृष्ठ 565

षोडश अध्याय
(वृत्तविधान)
१. जैसा कि पिछले अध्याय में बतलाया है कि—'अक्षराणि निवेशयेत्'
इत्यादि। उसी अक्षर-निवेश को श्रव्यता के लिये रसायन बनाने के उद्देश्य
से छन्दों के विभाग को दिखलाने का उपक्रम करते हैं—'छन्दाँस्येवम्'
इत्यादि के द्वारा। इन छन्दों से (जिन्हें पूर्व अध्याय में दिखलाया था)
बने हुए वृत्तों का—जिनका नाट्य में प्रयोग अभीष्ट है—लक्षण बतलाता हूँ।
ये वृत्त कौन है? जिनमें गुरु तथा लघु के नियम के कारण श्रव्यता का
आधान हों ऐसे वृत्तों को। 'वृत्त' पद में अधिकरण में 'क्त' प्रत्यय हुआ है।
[अतः जो सुनने या सुनाने के योग्य हों वे 'वृत्त' होते हैं]
२. अब छः अक्षरों वाले छन्द से आरम्भ कर २६ अक्षरों वाले उत्कृति
पर्यन्त छन्दों का (जो प्रयोग योग्य हों। इस तथ्य को पिछले अध्याय में
दिखलाया जा चुका है अतः अब उसी) का उपक्रम करते हैं। 'गायत्र' =
गायत्र्या एव गायत्रम्। यहाँ 'तेन निर्वृत्तम्' से अण् प्रत्यय किया गया है।
अतः गायत्री से जो सम्पन्न है वह गायत्र है। इस अध्याय में भरतमुनि ने
त्रिक (या तीन गुरु लघु) के अनुसारी कुछ छन्दों के लक्षण कहे हैं तथा
अन्य आचार्यों ने गण के आधार पर लक्षण कहे थे। अतः यहाँ दोनों ही प्रकार
का पाठ विचारार्थ के लिया गया है। (जब कि अर्थ उनका एक ही है)।
[यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि पिङ्गलाचार्य के पूर्व छन्दो लक्षण गुरु,
लघु की गणना के निर्देश पर प्रचलित था, गणों के आधार पर नहीं।
इस प्रकार यहाँ दोनों ही रूप में प्राप्त लक्षण हमारे द्वारा भी पाठान्तर
आदि के साथ संगृहीत कर लिये गये हैं]
१५. सिंहलेखं वृत्तम् = सिंह के नखों से कुरेदने के समान घट रही है
या सिंहलेख वृत्त (छन्द) सी हो गयी है।
२६. मयूरसारणी—मयूरीभिः सारी गतिविशेषो यस्यास्तादृशी। यद्वा
मयूरवद् सारो व्याकोचमस्याः ॥
अर्थात् मयूरी के सदृश गति या मयूर के समान विकसित या फैला
हुआ स्वरूप जिसका रहे ऐसा छन्द।