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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६७
मार्ग दर्शक, शोक रूपी ताप को हटाने में चन्दन जैसा शीतल होने से संक्षेप
में इतना ही समझना चाहिये कि मनुष्य के रूप में हित एवं मङ्गल को देने
वाला यह अमात्य एक उत्तम चिन्तामणि ही होता है।
२३. दिष्ट (दृष्ट) :—जैसे मालविकाग्निमित्र में नायिका वर्णन—
वामं सन्धिस्तिमितवलयं न्यस्य हस्तं नितम्बे
कृत्वा श्यामा विटपसदृशं स्रस्तमुक्तं द्वितीयम् ।
पादाङ्गुष्ठालुलितकुसुमे कुट्टिमे पातिताक्षं
नृत्तादस्याः स्थितमतितरां कान्तमृज्वायताक्षम् ॥
[ इस नायिका का वामहस्त वलय सन्धियों में निश्चल होकर नितम्ब पर
स्थापित है तथा दूसरा हाथ श्याम विटप वाली लता के सदृश खुला छोड़
दिया गया है। पैरों के अंगूठे से कुसुम को ठुकराती दृष्टि को फर्श पर टिका
कर रखे हुए यह कान्त, ऋजु तथा विस्तीर्ण नेत्र वाला नृत्त इस समय अतिशय
सुन्दर हो पड़ा है। ]
यह प्रत्यक्ष दृष्ट का उदाहरण है। परोक्ष दृष्ट का उदाहरण जैसे पात-