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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 668 में से

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पृष्ठ 570

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४५९
इसे इस प्रकार समझें कि- गुण तथा अलंकार दोनों ही शब्दार्थ से
सम्बद्ध होते हैं परन्तु लक्षण पूर्णतः कवि व्यापार से संलग्न होता है, क्योंकि
कवि के प्रयत्न से (ही) काव्य में शब्दार्थगत वैचित्र्य का आधान होता है।
यह जिस प्रयत्न से होता है वह समग्र प्रयत्न 'लक्षण' ही है। इसी के कारण
काव्य कविकर्म कहा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे एक उदाहरण
देकर समझाया कि 'पुष्टता' शरीर का गुण है परन्तु जब यही सुन्दरी के
स्तनों में रहे तो वह स्तन का लक्षण बन जाता है और वही कटि में रहे तो
सुन्दरी का कुलक्षण बन जाता है। इसी तरह एक प्रकार से कही जाने वाली
वस्तु उसी क्रम में रसोचित विभाव के रूप में प्रकट हुई तो वह 'लक्षण' है।
इसी कारण गुण एवं अलंकार ऐसे लक्षण से स्वतः भिन्न हो जाते हैं।
इसी प्रकार कवि व्यापार के बल से लौकिक वस्तु का भी काव्य में
अलौकिक स्वभाव में प्रकट होना 'लक्षण' कहलाता है। इसीलिये लक्षणों के
आश्रयण के बिना काव्य में अलङ्कारों को स्थान नहीं मिल सकता। इस
प्रकार अर्थालंकारों के बीजभूत एवं कथा शरीर में विचित्रता (को) प्रदान करने
वाले वक्रोक्ति-रूप सम्पन्न समस्त चमत्कारों का 'लक्षण' शब्द से व्यवहार किया
जाता है। लक्षण गुण एवं अलङ्कारों की अपेक्षा न रख कर स्वयं अपनी ही
महिमा से प्रोद्भासित होते हैं तथा महापुरुष के शरीर में विद्यमान पद्मादि
रेखाओं से सुलक्षण की तरह काव्य में सौन्दर्य का आधान करते हैं। रत्नखचित
आभरण से जैसे नायकादि का सौन्दर्य शोभित नहीं होता वही स्थिति अलंकारों
के बिना की है कि जिससे काव्य की सौन्दर्य शोभा हो सके। गुण भी धैर्यादि
की प्रवृत्ति से द्योतित होकर शोभित होता है। इसी प्रकार (गुण भी) काव्य
गत शब्द तथा अर्थ की रचना के आश्रय में स्थित रहता है। परन्तु जैसे
लक्षणहीन पुरुष सुन्दर शब्द से अभिहित नहीं होते, ठीक उसी तरह प्रौढ़काव्य
अपने कथा शरीर, गुण एवं अलङ्कारों से प्रोज्वक होकर भी नीरसता की स्थिति
में प्राप्त होकर अभिधान के योग्य नहीं होता है (इसका कारण है लक्षण का
न होना)। कथाशरीर से मण्डित (दृश्य) काव्य में लक्षणों का सम्पादन
अवश्य किया जाता है (अल्प प्रसार के कारण) मुक्तकादि खण्डकाव्यों में नहीं।
इसीलिये भरत मुनि ने मुक्तकादि से भेद दिखलाने के लिये ही 'काव्यवन्धास्तु
कर्तव्या' (१६।१७६) कहा भी है। यद्यपि लक्षण असंख्येय हो सकते हैं
किन्तु चमत्कार विशेष से गरिष्ट छत्तीस लक्षणों को ही भरत ने निदर्शित किया
है। मुनि के शिष्य कोहलादि आचार्यों ने जिन अन्य बातों को अतिरिक्त रूप
में कहा भी था उनमें से कुछ अतिरिक्त लक्षण के रूप में प्रसिद्ध हो गये तथा