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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 668 में से

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४७० नाट्यशास्त्र

कर रोकता है तथा—‘प्रिये, तुम प्रसन्न हो जाओ’ इत्यादि कहता है परन्तु इतना
होने पर भी जब वहाँ से देवी निकल कर चली जाती है तो 'अरण्यरोदन व्यर्थ
है' ऐसा समझाने वाले अपने मित्र विदूषक को राजा कहता है कि—‘तुमने
महारानी के क्रोध को नहीं देखा। अतः देवी को प्रसन्न करने के सिवाय अब
अन्य कोई उपाय नहीं दिखलाई देता। इसलिये चलो, भीतर चलें और महारानी
को प्रसन्न करें।
यहाँ विदूषक के द्वारा राजा का अनुवर्तन करना 'दाक्षिण्य' है।
३१. गर्हण :-दोष को गुण कर लेना 'गर्हण' है। अन्य मत से क्रोध
या अभिमान या मात्सर्य से किसी की कुत्सा करना 'गर्हण' होती है। जैसे—
धूर्तविट में—
प्रणष्टा न व्यक्तिर्भवति वचसा सैव मृदुता
न रागो नेत्राब्जे त्यजति न च लज्जा व्यपगता ।
स्मृतिः प्रत्यायाता परिहृषितमद्यापि च मुखं
मदो दोषांस्त्यक्त्वा त्वयि परिणतस्तिष्ठति गुणैः ॥
[ मदिरा पान से होने वाले नशे ( मद ) से वचन की सफाई नहीं नष्ट
हुई किन्तु उसमें अधिक मृदुता आ गयी है, राग आँखों को नहीं छोड़ रहा है,
लज्जा भी दूर नहीं हुई, स्मृति भी लौट आयी और आज भी (अभी भी) मुख
प्रसन्न दीख रहा है। अतः यह मद आप में रहने पर भी अपने दोषों को छोड़
कर गुणों में परिणत होकर स्थित है ( ऐसा प्रतीत हो रहा है । ) ]
इसी प्रकार गुणों के अतिपात में भी 'गर्हण' होता है। जैसे वत्सराज-
चरित्र के द्वितीय अंक में विष्णुत्रात का यह कथन :—
नृपाः प्रभुत्वात् प्रतिषेध-वामा जिह्मो विधिस्तद्वशवर्ति कार्यम् ।
साचिव्यतो नापरमस्ति पुंसां विषाददुःखायशसां निदानम् ॥
[ राजा अपनी प्रभुता के कारण वाम-स्वभाव से प्रतिषेध करने वाले
रहते हैं, विधि भी कुटिल होता है तथा सभी कार्य इसी के वश में रहते हैं।
इसलिये पुरुषों के लिये राजा का मन्त्रित्व करने के अतिरिक्त विषाद, दुःख
एवं अयश के निवारण का अन्य कोई निदान ( ही ) नहीं है । ]
३२. अर्थापत्ति :—जैसे धूर्तविट में—
आदष्टस्फुरिताधरे भवति यो वक्तारविन्दे रसः
प्रीतिर्या च हृतांशुके च जघने काञ्चीप्रभोद्योतिते ।
लक्ष्मीर्या च नखक्षताङ्कुरधरे पीने कपोले स्त्रियो
रक्तं तेन विरज्यते न हृदयं जात्यन्तरेऽपि ध्रुवम् ॥