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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 668 में से

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४६० नाट्यशास्त्र :
काल प्रवाह से (कारण) भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर के रूप में प्रविष्ट या
समायोजित कर दिये गये। ऐसे सभी लक्षणों का यथा स्थान विवरणादि यहाँ
प्रकाशित किया जा रहा है।
६. भूषण :—जहाँ भरतोक्त उपमा आदि अलंकारों तथा श्लेष आदि
गुणों से कथा-शरीर की रचना समुल्लसित होती हो-वह 'भूषण' है। यहाँ
'चित्रार्थैः' पद के द्वारा-विभावादि रूप सामग्री के प्रत्यायक होने के कारण
उसके उद्योतक अर्थ विशेषों के द्वारा या वक्रोक्ति से कथा शरीर का समुल्लास
किया जाना-सूचित किया गया है। यथा—
रत्नावली नाटिका में प्रथमाङ्क में यौगन्धरायण का निम्न वचन—
'विश्रान्त विग्रह-कथो रतिमाङ्गनस्य चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् ।
पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति ॥ (र० १।८)
[ जिसकी शासन पद्धति में विग्रह की बात नहीं होती, जिन पर प्रजाजन
का अनुराग है, जो सब के चित्त में बसते हैं, जिन्हें वसन्तक अति प्रिय है वही
यह वत्सराज उदयन साक्षात् अशरीरी मदन होकर साथ में रति को लिये
हुए प्रजाजन के चित्त में निवास करने वाले मदन सा महोत्सव को देखने के
लिये यहाँ आ रहा है । ]
यह भूषण की ही अतिशयिता है जिसमें सामान्य बात से काव्य का
पार्थक्य स्पष्टतः दिखलाई देता है। अतः जहाँ गुण एवं अलङ्कारों के द्वारा
कथारूप वक्रोक्ति अतिशयित हो जाती या की जाती हो वहाँ 'भूषण' समझना
चाहिए यह स्पष्ट है।
७. अक्षरसङ्घात :—यहाँ विविध श्लेषमयी उक्तियों से या अक्षरों के
विपर्यासादि से उक्ति प्रत्युक्ति में विचित्रता आये तो 'अक्षर-संघात' है। जैसे
उभयाभिसारिका में—
विट :—भगवति, वैशिकाचलोऽहमभिवादये ।
परिव्राजिका—न वैशिकाचलेन प्रयोजनं न च वैशेषिकाचलेन ।
विट :—अस्यैतत् कारणम् ?
परिव्राजिका—षट्पदार्थबहिष्कृतैः सह सम्भाषणमस्मद्गुरुभिनिरुद्धम् ।
[ विट—भगवति मैं वैशिकाचल आपका अभिवादन करता हूँ।
परिव्राजिका—मुझे न वैशिकाचल से कुछ काम है न वैशेषिकाचल से ।
विट—इसका कारण ।
परिव्राजिका—छः पदार्थों का बहिष्कार करने वालों से संभाषण न
करना हमारे गुरुजी ने बतलाया है । ] इत्यादि ।