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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५५
२८. दोधकवृत्तम् — दोधकेन मन्दं मन्दं गीयमानं वृत्तम् दोधकवृत्तम् ।
अर्थात् दूध दुहने की तरह मन्द मन्द जो गाया जाए ऐसा छन्द ।
३४. उपेन्द्रवज्रा — उपेन्द्र का वज्र जिसमें उपमान हो वह । यहाँ मत्वर्थीय
अच् प्रत्यय कर उपेन्द्रवज्रम् पद बना । उपेन्द्रवज्रम् में उपमित समास
है । (नायिका के स्मित एवं कान्ति से) इन्द्रधनुष सदृश वर्णों का
वैचित्र्य (सम्मिश्रण भी) जहाँ हो ऐसी । इन्द्रधनुष में (भी) वर्णों का
वैचित्र्य है तथा नायिका में (स्वयं के) वर्ण की विचित्रता है ही ।
४३. तोटकवृत्तम् = तोटक = छेदक का वृत्त चेष्टित तथा तोटक नामक
वृत्त (छन्द) ।
७४. नान्दीमुखी — नान्दी पाठ के समय बजाए जाने वाले दन्दुभि वाद्य
की तरह जिसका (विस्तीर्ण या बकवासी) मुख हो ऐसी ।।
१२०. यहाँ 'नानावृत्त-समुद्भूवाः' कहने का उद्देश्य (आशय) यह है
कि समवृत्त छन्द के पद्यों के लक्षण की पृथक् पाद में पृथक् कर समता या
विषमता का विद्वान् स्वयं 'ऊह' या तर्कना करें ।
१२१. दो सम = प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ ये दो पाद
सम रहें । प्रथम द्वितीय तथा तृतीय चतुर्थ ये दोनों पाद विषम रहे । यहाँ द्वौ
पद वीप्सागर्भ है अर्थात् दो दो बार कहना इष्ट है ।
१२३. सिद्धम् = अर्थात् लक्षित या जिसका लक्षण किया गया है ।
सार्वपादिकम् = सम्पूर्ण पाद में यह लक्षण रहना चाहिए । छेद = पादों का
विभाग या यति ।
१३७. सगुर्वन्तः = गुरु जिसके अन्त में रहे ऐसा गण अर्थात् सगण
तथा सर्वलघु अर्थात् नगण या त्रिक के अन्त स्थित गुरु वर्ण । प्रथम अक्षर
के पश्चाद्वर्ती चतुर्थ अक्षर से आगे वाला या पूर्व में लघु यकार भी इष्ट
नहीं होता अर्थात् इनका प्रयोग नहीं रहना चाहिए ।
१४४. हतशोभानि = काव्यों में प्रयुक्त नहीं होते, व्यर्थ या शोभाहीन
होने के कारण । अर्थात् पाठ्य काव्यों में गीत का प्रयोग नहीं होता ।
१४५. गीतों में पक्षमानता का अभाव होता है तथा वृत्तों में श्रव्यता
की अपेक्षा नहीं होती । गीत में केवल लय एवं तालों की योजना के लिये
अर्थ-साम्य का विधान होता है, अतएव गीतों में मात्रा एवं वर्णों के नियम
का आश्रय या अनुसरण किया जाता है । अतः गीतों में ही ऐसे वृत्तों की
योजना की जाए तो पाठ्य के उपयुक्त 'वृत्त' न हों ।