नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय
(काव्यलक्षणादि)
१-५. पूर्व अध्याय में छत्तीस लक्षणों से युक्त 'काव्य रचना' की बात
(अध्याय समाप्ति के साथ) कही गयी थी। यहाँ यह प्रश्न है कि गुण,
अलंकार तथा रीति का काव्य में आधान प्रसिद्ध है, किन्तु काव्य में 'लक्षण'
भी होते हैं यह (अति) प्रसिद्ध नहीं। व्यवहारों से तो 'पुरुष' को लक्षण,
गुण एवं अलंकारों से सम्पन्न होना उपयुक्त माना गया है परन्तु पुरुष की
तरह काव्य में लक्षणादि का व्यवहार समुचित नहीं हो सकता। क्योंकि
पुरुष शरीरधारी होता है, अतः शुभाशुभ लक्षण शरीर में होते हैं तथा
अलंकारों से उसकी शोभा बढ़ती है। किन्तु काव्य के निर्माण या अनुभूति
के समय लक्षण की गणना नहीं की जाती। दण्डी ने भी (इसी कारण)
काव्य की शोभा संवर्धक धर्मों को 'अलङ्कार' कहा है तथा गुणों के मध्य
प्रसाद आदि को बतलाते हुए यह सूचित किया कि गुण एवं अलङ्कारों का
विभाग करना कठिन ही है। इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि
गुण चिन्मय आत्मरूप होकर शृङ्गारादि रसों में अवस्थित होने के कारण
शृङ्गार में उन्हें लक्षित करना पड़ता है। जो पद काव्य के शब्द एवं अर्थ
गत शरीर में पृथक् सिद्ध हो वही लक्षण है। प्रकृत में अलंकारों से युक्त
काव्य भी लक्षणों के बिना शोभित नहीं होता। इस प्रकार यह स्पष्ट है
कि गुण, अलंकार तथा लक्षण में भेद निश्चित है। इस भेद का प्रतिपादन
विश्लेषणात्मक पद्धति से न्यस्त प्रक्रिया के द्वारा किया है जिससे कवि प्रतिभा
में भासमान वस्तु भाषा में प्रकट की जाती है तथा उसका काव्य के पाठक
या सहृदय दर्शक को बोध होता है। परन्तु लक्षण एवं अलंकारों में भेद के
प्रतिपादन का उद्देश्य काव्यरचना एवं काव्यगत रस के आस्वादन को
सर्वगम्य या सरल बनाना है।
लक्षण वह अर्थ है जो कविव्यापार की प्रकटीकरण प्रक्रिया से ऐसे
विलक्षण आनन्दप्रद रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वही अर्थ
अपने सामान्य रूप से भिन्न ज्ञात होकर (अपने) विलक्षणरूप में रस का
विधायक अंश बन रसानुभव को उत्पन्न करने में सहायक होता है। लक्षण ही
रसात्मक काव्य को अरसात्मक काव्य से पृथक् या भिन्न बनाता है।