नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 575, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ नाट्यशास्त्र
का अभिमान करते हैं परन्तु यह भावविलक्षणता से शून्य होने पर आचार्य
तौत के मत में अनुपयुक्त है। जैसे तापसवत्सराज के चतुर्थ अंक में साङ्कृत्या-
यनी यौगन्धरायण के उद्योग को देखकर सोच कर चर से कहती है—
दूरमुदीर्णे रिपौ वेषमकिञ्चित् करे च विजिगीषौ ।
भवता तु नयगुणशतैः सोऽयमसूत्रः पटः क्रियते ॥
[ शत्रु अपनी जबरदस्त शक्ति के साथ बडे जोर से उठ खड़ा हुआ है
विजिगिषु महाराज इस समय कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है और आप
सैकड़ो नीतिरूपी उपायों से बिना सूत्र के ही अपना कपड़ा बुन रहे हैं । ]
१५. निदर्शन :—प्रसिद्धानां अर्थात् देवताओं का, परापेक्षा = साध्या-
कांक्षा से व्युदासार्थ = हटाने या दूर करने के लिये। जैसे:—उभयाभि-
सारिका में—
शान्ति याति शनैर्महोषधिवलादाशीविषाणां विषं
शक्यो मोचयितुं मदोत्कटकटादात्मा गजेन्द्राद्वने ।
ग्राहस्यापि मुखान्महार्णवजले मोक्षः कदाचिद् भवेद्
वेशस्त्रीवडवामुखानलगतो नैवोत्थितो दृश्यते ॥
[ औषधियों के प्रभाव से सर्पों का विष शान्त हो जाता है, अरण्य में
प्राप्त मदोन्मत्त हाथी से अपने आपको छुड़ाया जा सकता है, मदोत्कट
ग्राह से भी महासमुद्र में मोक्ष हो सकता है परन्तु वेशस्त्री रूप वडवा की
मुखाग्नि में पड़ा हुआ व्यक्ति कभी नहीं निकला और उसे किसी ने भी
आज तक उठते हुए नहीं देखा ! ]
इसी कारण इसका दृष्टान्त से स्वतः भेद हो जाता है।
१६. निरुक्तः —पूर्वोक्तार्थ = पूर्व में जो किसी बाह्य अर्थ का सम्बन्धी
कोई अर्थ कह दिया गया है उसकी प्रसिद्धि के लिये अनवद्य भाव का वाचक
जो शब्द कहा जाए वह निरुक्त है। अतः इससे अन्यथा करने पर अर्थ
निरर्थक हो ही जाएगा। जैसे वत्सराजचरित के प्रथम अंक में भरतरोहक
राजा से कहता है—
भरतरोहकः—प्रसह्य हरणे केवलं प्रमादिताख्यातिः ।
राजा—किमेतत् !
भरतरोहकः—सदोषेषु कार्येषु यदल्पदोषं तत् प्रारब्धव्यम् ।
वसुवर्मा—स्वामिन्, तत्राप्यहं वाच्यदोषं न पश्यामि । कुतः—
नीता बलात् प्रकृति भद्रतरा सुभद्रा यद्वासुभद्रभगिनी कपिकेतनेन ।
देवस्य तेन समभूद्वचनीयता किं तेजःप्रकाशयशसां यदुदन्तिनां वा ॥