नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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१६. गुणातिपात :—जैसे धूर्तविट में विट का यह कथन—
विटः—
जात्यन्धां सुरतेषु दीनवदनामन्तर्मुखाभाषिणीं
हृष्टस्यापि जनस्य शोकजननीं लज्जापटेनावृताम् ।
निर्व्याजं स्वयमप्यदृष्टजघनां स्त्रीरूपबद्धां पशुं
कर्तव्यं खलु नैव भोः कुलवधूकारां प्रवेष्टुं मनः ॥
यहाँ कुलाङ्गनाओं के योग्य विनय, लज्जा आदि गुणों की विपरीत अर्थ
में योजना करने से 'गुणातिपात' है ।
२०. अतिशय :—जैसे कुरुराज दुर्योधन के लज्जित होने पर धृतराष्ट्र
के प्रति भीष्म की यह उक्ति :—
एतत्ते हृदयं स्पृशामि यदि वा साक्षी तवैवात्मजः
सम्प्रत्येव तु गोग्रहे यदभवत्तत्तावदाकर्ण्यताम् ।
एकः पूर्वमुदायुधैः स बहुभिर्दृष्टस्ततोऽनन्तरं
यावन्तो वयमाहवप्रणयिनस्तावन्त एवार्जुनाः ॥ इति ।
२१. तुल्यतर्क :—जैसे वत्सराज-चरित के अष्टम अंक में राजा का
यह कथन :—
नवार्कभापल्लवितामलोदरे सुगन्धिरेणूत्करकेसरोज्ज्वले ।
रसामृतज्ञो भ्रमरः सरोरुहे किमर्कपुष्पे प्रणयं करिष्यति ॥
[ जिसका निर्मल उदर सूर्य की किरणों से पल्लवित है तथा जो सुगन्धित
रेणुओं के समुदाय एवं केशरों से उज्ज्वल है, ऐसे सरोज के रसामृत का मर्मज्ञ
भ्रमर क्या अर्क पुष्प में प्रणय रखेगा । ]
२२. पदोच्चय :—जैसे वत्सराजचरित के षष्ठ अंक में राजा सचिव की
उत्तमता का वर्णन करते हुये कहते हैं ।
राजा— खड्गो रक्षान्धकारे रविररितिमिरे कार्यभारेषु धुर्यः
दीपो मन्त्रान्धकारे सुरगुरुर्नये सङ्क्रमो व्यापदोधे ।
उत्कण्ठायां सहभागी गतिरनवसरे चन्दनं शोकतापे
सङ्क्षेपान्मानुषाभो हितशिवसुखदो भव्यचिन्तामणिर्मे ॥
[ रक्षा रूप अन्धकार में खड्ग की तरह शक्ति रखने वाले, शत्रु रूप
तिमिर को नष्ट करने में सूर्य, कार्यभार को वहन करने में धुर्य (वृष) हो
धरा को धारण करने में समर्थ, मन्त्रणा के समय आने वाली कठिनाइयों में
दीपक की तरह प्रकाशक, अनीति के आने पर बृहस्पति की तरह विपत्तियों
को दूर करने वाला, उत्कण्ठा के समय साझीदार, अनवसर में गति की तरह