नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयहाँ संशय है। संशयालङ्कार का चमत्कार संशय नामक इस लक्षण
से भिन्न होता है।
१२. दृष्टान्त :-धर्म के अविरोध से सभी जन के मन का आकर्षक
ऐसा वचन जो सकारण तथा निदर्शन युक्त हो 'दृष्टान्त' कहलाता है। जैसे
'धूर्तविट' में 'स्त्रीषु प्रसङ्गो न कर्तव्यः इस विषय में भाव का क्या मत है ?
यह पूछे जाने पर विट-भोः उपदेशमात्रं खल्वेतत् । तमहं न पश्यामि यः स्त्रीषु
प्रसङ्गं न गच्छेत् । श्रूयन्ते हि महेन्द्रादयोऽप्यहल्यासु विकृतिमापन्नाः' इत्यादि
कथन में दृष्टान्त है।
१३. प्राप्ति :-इसका उदाहरण कुन्दमाला के तृतीय अङ्क में बालुका
पर पद चिन्हों को देखकर लक्ष्मण ने राम के प्रति कहा—
विलासभोगेन परिश्रमेण वा स्वभावतो वा निभृतानि मन्थरम् ।
पदानि कस्याश्चिदिमानि सैकते प्रयान्ति तुल्यं कलहंसविभ्रमम् ॥
रामः (निर्वर्ण्य सहर्षम् ) किमुच्यते कस्याश्चिदिति । ननु वक्तव्यं
सीतायाः पदानीति । पश्य—
समानं संस्थानं निभृतललिता सैव रचना
तदेवैतद्रेखा कमलरचितं चारुतिलकम् ।
यथा चेयं दृष्ट्वा हरति हृदयं शोकविधुरं
तथा ह्यस्मिन् देव्या सपदि पदपङ्क्तिर्विनिहिता ॥
[—क्रीड़ा करते हुए, परिश्रम से भागते हुए या स्वभावतः मन्थरता से
बालुका में धंसे हुए ये किसी के पैर कलहंस के विभ्रम की शृङ्गार मयी
चेष्टाओं की समता कर रहे हैं।
राजा राम— ( ध्यान से देखकर प्रसन्न हो ) अरे ये किसी के पैर हैं
ऐसा क्यों कहते हो । अरे भैया, ये तो सीता के ही पैर हैं। देखो--पैरों का
विन्यास समानरूप वाला है, वही निभृत (विनीत ) एवं ललित रचना
है, यही वह रेखा है जिनसे तिलक एवं कमल बड़े ही सुन्दर रूप में बन गये
है। देखने पर यह पदपंक्ति शोक से विधुर विकल हृदय को आकृष्ट कर
रही है। जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ ( सीता ) देवी ने अपने पैरों को
अभी तत्काल ही रखा है। ]
यहाँ प्राप्ति है ।
१४. अभिप्रायः - अभूतपूर्व अर्थात् अद्भुत या असत् अर्थ जो केवल
कल्पित है। अन्य आचार्य अभूतपूर्व पद का अर्थ आस्वाद्य पदार्थ में अपूर्वता