नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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मार्दव एवं कठोरता को दिखलाने का कार्य करे, उत्तम चरों के नेत्रों
से लोकानुवृत्त समझे तथा मण्डलों को भी । इस प्रकार प्रयत्न से आत्मा की
रक्षा करे परन्तु युद्धस्थल में आत्मरक्षा की परवाह न करे । ]
२४. विचार :—प्रवृत्त अर्थ का अनुगामी, परोक्ष अर्थ का साधक एवं
अनेक उपाय एवं उपाधियों का दर्शक वाक्य 'विचार' है । यथा मुद्राराक्षस
के पञ्चम अंक में राक्षस का यह कथन :—
साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितं बिभ्रत्सपक्षे स्थितिं
व्यावृत्तञ्च विपक्षतो भवति यत्तत्साधनं सिद्धये ।
यत्साध्यं स्वयमेव तुल्यमुभयोः पक्षे विरुद्धञ्च यत्
तस्याङ्गीकरणेन वादिन इव स्यात् स्वामिनो निग्रहः ॥
[ जो साधन अन्वय से घटित एवं साध्य में निश्चित रहता है, सपक्ष में
जिसकी स्थिति है तथा विपक्ष से जो व्यावृत्त हो तो ऐसा साधन ( ही ) साध्य
की सिद्धि करने में समर्थ होता है । परन्तु जो स्वयं साध्य में अनुकूल एवं
प्रतिकूल होने से तुल्य हो तथा पक्ष के विरुद्ध रहे तो उसको स्वीकार करने से
वादी के निग्रह की तरह स्वामी भी निगृहीत हो जाता है । ]
२६. विपर्यय :—जैसे रावण के प्रति सचिव की यह उक्ति—
सचिव :—उदर्कसिद्धिमिच्छद्भिः सद्भिर्न खलु दृश्यते ।
चतुर्थी चन्द्रलेखेव परस्त्रीफालपट्टिका ॥
[ परिणाम में उत्तम फल की सिद्धि चाहने वाले सज्जन भाद्रपद की
चतुर्थी के चन्द्र की तरह अन्य स्त्री के भाल पट्ट को नहीं देखते हैं ]
रावण :—परस्त्रीकुचकुम्भेषु कुम्भेषु वरदन्तिनाम् ।
निपतन्ति न भीरूणां दृष्टयः शरवृष्टयः ॥
[ भीरुओं की दृष्टि न परस्त्री के कुचों पर पड़ती है और न उत्तम हाथियों
की कुम्भस्थल पर शरवर्षण ही भीरुओं से हो सकता है । ]
२७. भ्रंश :—जैसे वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन कञ्चुकी से
कहता है :—
दुर्योधन —सहभृत्यगणं सबान्धवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम्।
स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात् पाण्डुसुतः सुयोधनम् ॥
कञ्चुकी— ( कर्णौ पिधाय सभयं ) शान्तं पापम् । प्रतिहतममङ्गलम् ।
इति ।
[ दुर्यो—भाई, बन्धु, पुत्र एवं भृत्यों के साथ शीघ्र ही सुयोधन को यह
पाण्डुपुत्र अपनी शक्ति या सेना के द्वारा युद्ध में मार देगा ।