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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

४५६ नाट्यशास्त्र
१७७. मात्रावृत्तों की संख्या ज्ञान के लिये बतलाते हैं—'सर्वेषमित्यादि
से । विकल्प के द्वारा पूर्व में जो संख्याभेद किया था उसका उत्तरवर्ती
संख्या के साथ गुणन करने पर जो पिण्डीभूत संख्या हो उसे दिखलाये ।
इनमें समसंख्या के पांच और विषम के चार भेद होते हैं । षष्ठ के दो
तथा द्वितीयार्ध में एक भेद, अष्टम में भी एक ही भेद होगा । इस प्रकार
यहाँ पूर्व अङ्क से उत्तर अङ्क का गुणन करे तथा उससे अन्य अंक का तो इस
प्रकार सोलह भेद हो जाते हैं । जैसे चार का पांच से गुणन करने पर २०
तथा बीस को चार से गुणन करने पर (२० × ४ = ८०) अस्सी होते हैं ।
फिर अस्सी में चार का गुणा करने पर (८० × ४ = ३२०) तीन सौ बीस
हो जाते हैं इसी प्रकार आगे भी ये बढ़कर ३२ लाख ८ हजार २० कुल हो
जाते है इसका संकलन निम्न श्लोक में इस प्रकार है:—
"आर्या शतसहस्राणि ज्ञेया ह्येकान्नविंशतिः ।"
अष्टौ सहस्राणि तथा विशतिश्च प्रमाणतः ॥
१७६. 'काव्यबन्धाः' इत्यादि के द्वारा वृत्तों का उपसंहार करते हुए
अग्रिम अध्याय गत लक्षण, गुण आदि का संकेत किया गया है । यहाँ काव्य
को एक निर्माण वस्तु दिखाया कर यह दिखलाया गया है कि यदि प्रासाद का
निर्माण करना हो तो प्रथम उसमें भूमि की अपेक्षा होगी इसी प्रकार काव्य
के निर्माण में आधारभूत छन्दों की (भूमि की तरह) विधि होती है । यह
काव्य में आधार होने से भित्ति स्थानीय माना जाता है, तब इस भित्ति पर
लक्षणादि की योजना एवं गुणादि का निवेश चित्र कर्म तथा पच्चीकारी
के समान होता है । इसके बाद इस काव्य प्रासाद में झरोखों के समान
दशरूपक का विभाग, प्रयोग के निरूपण के तुल्य काकु, स्वर आदि वाचिक
का स्वरूप कहा जा रहा है । इस वाचिक अभिनय के क्रम में वृत्तों का
विधान यहाँ दिखलाया गया । यद्यपि रूपक निर्माण की वेला में परिपक्व
प्रज्ञा के सहृदय को क्रम प्रतिभास नहीं होता फिर भी अपोद्धार वृद्धि से
उसकी कल्पना की जाती है । प्रबन्धनिर्माण के समय युक्त या उचित
अभ्यास की सम्पत्ति अर्थात् अभिनय के लिये आधार तैयार करना । इसी
को 'क्रम' कहा गया है। इस क्रम का उल्लंघन कर नाटकादि का निर्माण
करने पर बड़ी हानि या प्रमाद या स्वाच्छन्द्य हो जाता है—क्योंकि सभी
रूपक रचयिता जन कालिदास की तरह नहीं होते । इसके अतिरिक्त
इनका प्रतिभा के अंगभूत ज्ञानातिशय को भी पूर्वजन्म में किये गये