नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५७
अभ्यास से उत्पन्न संस्कार पाटव से ही उत्पन्न समझना चाहिए। आचार्य ने
कहा भी है कि—
महाकवीनां पदवीमुपात्तामारुरुक्षताम्।
नासंस्मृत्य पदस्पर्शन्सम्पत्सोपानपद्धतिः ॥
“काव्य निर्माण से उपात्त महाकवियों की पदवी पर आरोहण करने
की भावना रखने वाले व्यक्ति जब तक पदों का स्पर्श नहीं करेंगे तब
तक 'सोपानपद्धति' पर आरोहण का क्रम सम्भव कैसे होगा या सम्पन्न नहीं
होगा।”