सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 580

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६९
कञ्चुकी—( कानों को बन्द कर, भय युक्तहोते हुए ) अमंगल शान्त हों,
अनर्थ शान्त हों ।
२८. अनुनय :—जैसे रामाभ्युदय के द्वितीय अङ्क में राम के पराक्रम
की स्तुति करने में व्यग्र मारीच को रावण कहता है—
रावणः—आः प्रतिपक्षपातिन्, क्षुद्र, राक्षसापसद । किं बहुना—
तवैव रुधिराम्बुभिः क्षतकठोरकण्ठस्तुतैः
रिपुस्तुतिभवो मम प्रशममेतु कोपानलः ।
सुरद्विपशिरस्थलीदलन-दष्टमुक्ताफलः
स्वसुः परिभवोचितं पुनरसौ विधास्यत्यसिः ॥
( इति खड्गमाकर्षति तदा उभयोर्मध्ये निपत्य प्रहस्तः )
प्रहस्तः—प्रसीदतु प्रसीदतु महाराजः, नेदमनुरूपं स्वामिनः । देव,
लोकत्रयक्षयोद्धृत्त-प्रकोपाग्रेसरस्य ते ।
ईदृशः चन्द्रहासस्य भृत्येष